तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
१४२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
१४२ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
विज्ञानं यज्ञं तनुते । विज्ञान- | विज्ञान यज्ञका विस्तार करता
विज्ञानमयो- वान्हि यज्ञं तनोति | है अर्थात् विज्ञानवान् पुरुष ही
पासनम् श्रद्धादिपूर्वकम् । | श्रद्धादिपूर्वक यज्ञका अनुष्ठान करता
अतो विज्ञानस्य कर्तृत्वं तनुत | है। अतः यज्ञानुष्ठानमें विज्ञानका
कर्तृत्व है और तनुते—इसका भाव
इति कर्माणि च तनुते । यस्मा- | यह है कि वही कर्मोंका भी
द्विज्ञानकर्तृकं सर्वं तस्माद्युक्तं | विस्तार करता है। इस प्रकार
क्योंकि सब कुछ विज्ञानका ही
विज्ञानमय आत्मा ब्रह्मेति । | किया हुआ है इसलिये 'विज्ञानमय
आत्मा ब्रह्म है' ऐसा कहना ठीक
किं च विज्ञानं ब्रह्म सर्वे देवा | ही है। यही नहीं, इन्द्रादि सम्पूर्ण
इन्द्रादयो ज्येष्ठं प्रथमजत्वात्सर्व- | देवगण विज्ञानब्रह्मकी, जो सबसे
पहले उत्पन्न होनेवाला होनेसे
प्रवृत्तीनां वा तत्पूर्वकत्वात्प्रथमजं | ज्येष्ठ है अथवा समस्त वृत्तियाँ
विज्ञानपूर्वक होनेके कारण जो
विज्ञानं ब्रह्मोपासते ध्यायन्ति | प्रथमोत्पन्न है, उस विज्ञानरूप ब्रह्मकी
तस्मिन्विज्ञानमये ब्रह्मण्यभि- | उपासना अर्थात् ध्यान करते हैं।
तात्पर्य यह है कि वे उस विज्ञानमय
मानं कृत्वोपासत इत्यर्थः । | ब्रह्ममें अभिमान करके उसकी
.उपासना करते हैं। अतः वे उस
तस्मात्ते महतो ब्रह्मण उपा- | महद्ब्रह्मकी उपासना करनेसे ज्ञान
सनाज्ज्ञानैश्वर्यवन्तो भवन्ति । | और ऐश्वर्यसम्पन्न होते हैं।
तच्च विज्ञानं ब्रह्म चेद्यदि वेद | उस विज्ञानरूप ब्रह्मको यदि
विजानाति न केवलं वेदैव तस्मा- | जान ले—केवल जान ही न ले बल्कि
द्ब्रह्मणश्चेन्न प्रमाद्यति बाह्येष्वेवा- | यदि उससे प्रमाद भी न करे; बाह्य
अनात्म पदार्थोंमें आत्मबुद्धि की
नात्मस्वात्मभावितत्वात्प्राप्तं वि- | हुई है, उसके कारण विज्ञानमय
ज्ञानमये ब्रह्मण्यात्मभावनायाः | ब्रह्ममें की हुई आत्मभावनासे प्रमाद
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
अनु० ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ १४३
प्रमदनं तन्निवृत्त्यर्थमुच्यते तस्मा- | होना सम्भव है; उसकी निवृत्तिके
च्चेन्न प्रमाद्यतीति, अन्नमयादिष्वा- | लिये कहते हैं—'यदि उससे प्रमाद
त्मभावं हित्वा केवले विज्ञान- | न करे' इत्यादि । तात्पर्य यह है
मये ब्रह्मण्यात्मत्वं भावयन्नास्ते | कि यदि अन्नमय आदिमें आत्मभाव-
चेदित्यर्थः । | को छोड़कर केवल विज्ञानमय ब्रह्ममें
ततः किं स्यादित्युच्यते— | ही आत्मत्वकी भावना करके स्थित
[विज्ञानब्रह्मो-पासनफलम्] शरीरे पाप्मनो हित्वा । शरीराभि- | रहे—
माननिमित्ता हि सर्वे पाप्मानः | तो क्या होगा ? इसपर कहते
तेषां च विज्ञानमये ब्रह्मण्यात्माभि- | हैं—शरीरके पापोंको त्यागकर,
मानान्निमित्तापाये हानमुपपद्यते, | सम्पूर्ण पाप शरीराभिमानके कारण
छत्रापाय इवच्छायापायः । | ही होनेवाले हैं; विज्ञानमय ब्रह्ममें
तस्माच्छरीराभिमाननिमित्तान् | आत्मत्वका अभिमान करनेसे निमित्त-
सर्वान्पाप्मनः शरीरप्रभवाञ्शरीर | का क्षय हो जानेपर उनका भी
एव हित्वा विज्ञानमयब्रह्मस्वरू- | क्षय होना उचित ही है, जिस
पापन्नस्तत्स्थान्सर्वान्कामान्विज्ञा- | प्रकार कि छातेके हटा लिये जानेपर
नमयेनैवात्मना समश्नुते सम्य- | छायाकी भी निवृत्ति हो जाती है ।
ग्भुङ्क्त इत्यर्थः । | अतः शरीराभिमानके कारण होने-
तस्य पूर्वस्य मनोमयस्यात्मैष | वाले शरीरजनित सम्पूर्ण पापोंको
[आनन्दमयस्य कार्यात्मत्वस्थापनम्] एव शरीरे मनोमये भवः शारीरः। कः ? | शरीरहीमें त्यागकर विज्ञानमय ब्रह्म-
य एष विज्ञानमयः । तस्माद्वा | स्वरूपको प्राप्त हुआ साधक उसमें
स्थित सारे भोगोंको विज्ञानमय
स्वरूपसे ही सम्यक्प्रकारसे प्राप्त
कर लेता है अर्थात् उनका पूर्णतया
उपभोग करता है ।
उस पूर्वकथित मनोमयका शारीर—
मनोमय शरीरमें रहनेवाला आत्मा
भी यही है । कौन ? यह जो
विज्ञानमय है । 'तस्माद्वा एतस्मात्'