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सर्वकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

पृष्ठ 149, कुल 261 में से

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पृष्ठ 149

अनु० ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ १४३
प्रमदनं तन्निवृत्त्यर्थमुच्यते तस्मा- | होना सम्भव है; उसकी निवृत्तिके
च्चेन्न प्रमाद्यतीति, अन्नमयादिष्वा- | लिये कहते हैं—'यदि उससे प्रमाद
त्मभावं हित्वा केवले विज्ञान- | न करे' इत्यादि । तात्पर्य यह है
मये ब्रह्मण्यात्मत्वं भावयन्नास्ते | कि यदि अन्नमय आदिमें आत्मभाव-
चेदित्यर्थः । | को छोड़कर केवल विज्ञानमय ब्रह्ममें
ततः किं स्यादित्युच्यते— | ही आत्मत्वकी भावना करके स्थित
[विज्ञानब्रह्मो-पासनफलम्] शरीरे पाप्मनो हित्वा । शरीराभि- | रहे—
माननिमित्ता हि सर्वे पाप्मानः | तो क्या होगा ? इसपर कहते
तेषां च विज्ञानमये ब्रह्मण्यात्माभि- | हैं—शरीरके पापोंको त्यागकर,
मानान्निमित्तापाये हानमुपपद्यते, | सम्पूर्ण पाप शरीराभिमानके कारण
छत्रापाय इवच्छायापायः । | ही होनेवाले हैं; विज्ञानमय ब्रह्ममें
तस्माच्छरीराभिमाननिमित्तान् | आत्मत्वका अभिमान करनेसे निमित्त-
सर्वान्पाप्मनः शरीरप्रभवाञ्शरीर | का क्षय हो जानेपर उनका भी
एव हित्वा विज्ञानमयब्रह्मस्वरू- | क्षय होना उचित ही है, जिस
पापन्नस्तत्स्थान्सर्वान्कामान्विज्ञा- | प्रकार कि छातेके हटा लिये जानेपर
नमयेनैवात्मना समश्नुते सम्य- | छायाकी भी निवृत्ति हो जाती है ।
ग्भुङ्क्त इत्यर्थः । | अतः शरीराभिमानके कारण होने-
तस्य पूर्वस्य मनोमयस्यात्मैष | वाले शरीरजनित सम्पूर्ण पापोंको
[आनन्दमयस्य कार्यात्मत्वस्थापनम्] एव शरीरे मनोमये भवः शारीरः। कः ? | शरीरहीमें त्यागकर विज्ञानमय ब्रह्म-
य एष विज्ञानमयः । तस्माद्वा | स्वरूपको प्राप्त हुआ साधक उसमें
स्थित सारे भोगोंको विज्ञानमय
स्वरूपसे ही सम्यक्प्रकारसे प्राप्त
कर लेता है अर्थात् उनका पूर्णतया
उपभोग करता है ।
उस पूर्वकथित मनोमयका शारीर—
मनोमय शरीरमें रहनेवाला आत्मा
भी यही है । कौन ? यह जो
विज्ञानमय है । 'तस्माद्वा एतस्मात्'