श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
by महर्षि वेदव्यास
८१- विविध मासोंमें किये जानेवाले पशुपशविमोचक लिङ्ग-व्रतका विधान तथा उसका माहात्म्य
| ३१२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| विशोध्य तेषां देवानां पशुत्वं परमेश्वरः।<br>व्रतं पाशुपतं चैव स्वयं देवो महेश्वरः॥ ५५<br>उपदिश्य मुनीनां च सहास्ते चाम्बया भवः।<br>तदाप्रभृति ते देवाः सर्वे पाशुपताः स्मृताः॥ ५६<br>पशूनां च पतिर्यस्मात्तेषां साक्षाद्धि देवताः।<br>तस्मात्पाशुपताः प्रोक्तास्तपेस्तेपुश्च ते पुनः॥ ५७<br>ततो द्वादशवर्षान्ते मुक्तपाशाः सुरोत्तमाः।<br>ययुर्यथागतं सर्वे ब्रह्मणा सह विष्णुना॥ ५८<br>एतद्वः कथितं सर्वं पितामहमुखाच्छ्रुतम्।<br>पुरा सनत्कुमारेण तस्माद् व्यासेन धीमता॥ ५९<br>यः श्रावयेच्छुचिर्विप्राञ्छृणुयाद्वा शुचिर्नरः।<br>स देहभेदमासाद्य पशुपाशैः प्रमुच्यते॥ ६० | मुनियोंके पशुत्वभावका शोधनकर उन्हें पाशुपतव्रतका स्वयं उपदेश करके उमाके साथ बैठ गये। तभीसे वे सब देवता पाशुपत कहे जाने लगे। वे शिव उन पशुओंके साक्षात् पति हैं, अतः देवता पाशुपत कहे गये हैं। इसके बाद उन सबने पुनः तपस्या की। तदनन्तर बारह वर्षके अन्तमें सभी श्रेष्ठ देवता पशुपाशसे मुक्त हो गये और जैसे आये थे, वैसे ही ब्रह्मा तथा विष्णुके साथ वापस लौट गये॥ ५४–५८॥<br><br>[हे मुनियो!] मैंने आप लोगोंसे यह सब कह दिया; पूर्वकालमें इसे सनत्कुमारने ब्रह्माजीके मुखसे तथा बुद्धिमान् व्यासजीने उन [सनत्कुमार]-से सुना था। जो मनुष्य शुद्ध होकर इसे ब्राह्मणोंको सुनाता है अथवा शुद्ध होकर [स्वयं] सुनता है, वह दूसरा शरीर प्राप्त करके पशुपाशोंसे मुक्त हो जाता है॥ ५९-६०॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे पाशुपतव्रतमाहात्म्यं नामाशीतितमोऽध्यायः॥ ८०॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'पाशुपतव्रतमाहात्म्य' नामक अस्सीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ८०॥
इक्यासीवाँ अध्याय
विविध मासोंमें किये जानेवाले पशुपाशविमोचक लिङ्गव्रतका विधान तथा उसका माहात्म्य
| ऋषय ऊचुः<br>व्रतमेतत्त्वया प्रोक्तं पशुपाशविमोक्षणम्।<br>व्रतं पाशुपतं लैङ्गं पुरा देवैरनुष्ठितम्॥ १<br>वक्तुमर्हसि चास्माकं यथापूर्वं त्वया श्रुतम्।<br><br>सूत उवाच<br>पुरा सनत्कुमारेण पृष्टः शैलादिरादरात्॥ २<br>नन्दी प्राह वचस्तस्मै प्रवदामि समासतः।<br>देवैर्दैत्यैस्तथा सिद्धैर्गन्धर्वैः सिद्धचारणैः॥ ३<br>मुनिभिश्च महाभागैरनुष्ठितमनुत्तमम्।<br>व्रतं द्वादशलिङ्गाख्यं पशुपाशविमोक्षणम्॥ ४<br>भोगदं योगदं चैव कामदं मुक्तिदं शुभम्।<br>अवियोगकरं पुण्यं भक्तानां भयनाशनम्॥ ५<br>षडङ्गसहितान् वेदान् मथित्वा तेन निर्मितम्।<br>सर्वदानोत्तमं पुण्यमश्वमेधायुताधिकम्॥ ६ | ऋषिगण बोले— [हे सूतजी!] आपने पशुपाशसे मुक्त करनेवाले इस व्रतको बता दिया; पूर्वकालमें देवताओंने लिङ्गसम्बन्धी पाशुपतव्रतका अनुष्ठान किया था, अतः आपने पहले [इसके विषयमें] जैसा भी श्रवण किया था, उसे हम लोगोंको बताइये॥ १ १/२॥<br><br>सूतजी बोले— [हे ऋषियो!] पूर्वकालमें सनत्कुमारने [इस सम्बन्धमें] शिलादपुत्र नन्दीसे आदरपूर्वक पूछा था; तब नन्दीने उनसे जो बात कही थी, वही मैं भी आप लोगोंको संक्षेपमें बताता हूँ—देवताओं, दैत्यों, सिद्धों, गन्धर्वों, चारणों तथा महाभाग्यवान् मुनियोंने पशुपाशसे मुक्त करनेवाले इस अत्युत्तम द्वादश लिङ्ग नामक व्रतको किया था। यह भोग (सुख) प्रदान करनेवाला, योग देनेवाला, मनोरथ पूर्ण करनेवाला, मुक्ति देनेवाला, शिवसे सदा अवियोग करानेवाला, पुण्य देनेवाला, भक्तोंके भयका नाश करनेवाला, छः अंगोंसहित वेदोंका मंथन करके उन [शिव]-के द्वारा निर्मित, समस्त |