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श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
by महर्षि वेदव्यास
DevanagariHindipublished833 pages
४७- जम्बूद्वीपके अधिपति प्रियव्रतके पुत्र महाराज आग्नीध्रका वंशवर्णन तथा आग्नीध्रके शिवभक्त नौ पुत्रोंका अजनाभवर्ष (भारतवर्ष), किम्पुरुषवर्ष आदि नौ वर्षों (देशों)-का स्वामी बनना
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| २०६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| जीमूतस्य च जीमूतो रोहितस्य च रोहितः।<br>वैद्युतो वैद्युतस्यापि मानसस्य च मानसः॥ ४०<br>सुप्रभः सुप्रभस्यापि सप्त वै देशलाञ्छकाः।<br>प्लक्षद्वीपे तु वक्ष्यामि जम्बूद्वीपादनन्तरम्॥ ४१<br>सप्त मेधातिथेः पुत्राः प्लक्षद्वीपेश्वराः नृपाः।<br>ज्येष्ठः शान्तभयस्तेषां सप्तवर्षाणि तानि वै॥ ४२<br>तस्माच्छान्तभयाच्चैव शिशिरस्तु सुखोदयः।<br>आनन्दश्च शिवश्चैव क्षेमकश्च ध्रुवस्तथा॥ ४३<br>तानि तेषां तु नामानि सप्तवर्षाणि भागशः।<br>निवेशितानि तैस्तानि पूर्वं स्वायम्भुवेऽन्तरे॥ ४४<br>मेधातिथेस्तु पुत्रैस्तैः प्लक्षद्वीपनिवासिभिः।<br>वर्णाश्रमाचारयुताः प्रजास्तत्र निवेशिताः॥ ४५<br>प्लक्षद्वीपादिवर्षेषु शाकद्वीपान्तिकेषु वै।<br>ज्ञेयः पञ्चसु धर्मो वै वर्णाश्रमविभागशः॥ ४६<br>सुखमायुः स्वरूपं च बलं धर्मो द्विजोत्तमाः।<br>पञ्चस्वेतेषु द्वीपेषु सर्वसाधारणं स्मृतम्॥ ४७<br>रुद्रार्चनरता नित्यं महेश्वरपरायणाः।<br>अन्ये च पुष्करद्वीपे प्रजाताश्च प्रजेश्वराः॥ ४८<br>प्रजापतेश्च रुद्रस्य भावामृतसुखोत्कटाः॥ ४९ | हारित, जीमूतके देशको जीमूत, रोहितके देशको रोहित, वैद्युतके देशको वैद्युत, मानसके देशको मानस और सुप्रभके देशको सुप्रभ कहा गया है। इस प्रकार राजाओंके नामसे सात देश हैं॥ ३८-४०^{१}/२॥<br>अब मैं जम्बूद्वीपके बाहर स्थित प्लक्षद्वीपका वर्णन करूँगा। प्लक्षद्वीपके राजा मेधातिथिके सात पुत्र थे, वे सब प्लक्षद्वीपमें [अलग-अलग देशोंके] शासक नरेश हुए। उनमें शान्तभय ज्येष्ठ थे। उस द्वीपमें सात देश हैं। उस शान्तभयके बाद शिशिर, सुखोदय, आनन्द, शिव, क्षेमक और ध्रुव—ये अन्य पुत्रोंके नाम थे। स्वायम्भुव मन्वन्तरमें उनके नामोंसे द्वीपके भागानुसार सात वर्ष (देश) बसाये गये॥ ४१-४४॥<br>मेधातिथिके प्लक्षद्वीपनिवासी उन पुत्रोंद्वारा वर्णाश्रम-धर्मसे सम्पन्न प्रजाएँ वहाँ बसायी गयीं। प्लक्षद्वीप तथा शाकद्वीप आदि पाँचों द्वीपोंमें वर्ण एवं आश्रमके धर्मोंका सम्यक् पालन होता था। हे श्रेष्ठ द्विजो! इन पाँचों द्वीपोंमें सुख, आयु, स्वरूप, बल तथा धर्म सबके लिये समान बताया गया है। सभी लोग सदा रुद्रके अर्चनमें लीन रहते हैं तथा महेश्वरमें भक्ति रखते हैं। पुष्कर-द्वीपमें अन्य जो प्रजाएँ एवं राजा हैं, वे सब प्रजापालक रुद्रके श्रद्धारूपी अमृतपानके सुखकी प्रबल इच्छा रखते हैं॥ ४५-४९॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे भुवनकोशे द्वीपद्वीपेश्वरकथनं नाम षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४६ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'भुवनकोशमें द्वीपद्वीपेश्वरकथन' नामक छियालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४६ ॥
सैंतालीसवाँ अध्याय
जम्बूद्वीपके अधिपति प्रियव्रतके पुत्र महाराज आग्नीध्रका वंशवर्णन तथा आग्नीध्रके शिवभक्त नौ पुत्रोंका अजनाभवर्ष (भारतवर्ष), किम्पुरुषवर्ष आदि नौ वर्षों (देशों)-का स्वामी बनना
| सूत उवाच<br>आग्नीध्रं ज्येष्ठदायादं काम्यपुत्रं महाबलम्।<br>प्रियव्रतोऽभ्यषिञ्चद्वै जम्बूद्वीपेश्वरं नृपः॥ १<br>सोऽतीव भवभक्तश्च तपस्वी तरुणः सदा।<br>भवार्चनरतः श्रीमान् गोमान् धीमान् द्विजर्षभाः॥ २ | सूतजी बोले—राजा प्रियव्रतने अपने ज्येष्ठ उत्तराधिकारी महाबली प्रिय पुत्र आग्नीध्रको जम्बूद्वीपके राजाके रूपमें अभिषिक्त किया॥ १॥<br>हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! वह महान् शिवभक्त, तपस्वी, तरुण, सदा शिवपूजनमें रत रहनेवाला, ऐश्वर्यसम्पन्न, |
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अध्याय ४७] जम्बूद्वीपके अधिपति प्रियव्रतके पुत्र महाराज आग्नीध्रका वंशवर्णन २०७
| अनेक गायोंका स्वामी तथा बुद्धिमान् था॥ २॥ | |
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| तस्य पुत्रा बभूवुस्ते प्रजापतिसमा नव।<br>सर्वे माहेश्वराश्चैव महादेवपरायणाः॥ ३ | उसके प्रजापतिके समान नौ पुत्र हुए। वे सभी शिवभक्त तथा शिवपरायण थे॥ ३॥ |
| ज्येष्ठो नाभिरिति ख्यातस्तस्य किम्पुरुषोऽनुजः।<br>हरिवर्षस्तृतीयस्तु चतुर्थो वै त्विलावृतः॥ ४<br>रम्यस्तु पञ्चमस्तत्र हिरण्मन् षष्ठ उच्यते।<br>कुरुस्तु सप्तमस्तेषां भद्राश्वस्त्वष्टमः स्मृतः॥ ५<br>नवमः केतुमालस्तु तेषां देशान्निबोधत। | उनमें ज्येष्ठ पुत्र नाभि नामसे प्रसिद्ध था। उसके छोटे भाईका नाम किम्पुरुष था। तीसरा पुत्र हरिवर्ष तथा चौथा पुत्र इलावृत था। रम्य पाँचवाँ पुत्र था। हिरण्मन् छठा पुत्र कहा जाता है। कुरु उनमें सातवाँ था और भद्राश्व आठवाँ पुत्र कहा गया है। नौवाँ केतुमाल था। अब उनके देशोंके विषयमें सुनिये॥ ४-५ १/२॥ |
| नाभेस्तु दक्षिणं वर्षं हेमाख्यं तु पिता ददौ॥ ६<br>हेमकूटं तु यद्वर्षं ददौ किम्पुरुषाय सः।<br>नैषधं यत्स्मृतं वर्षं हरये तत्पिता ददौ॥ ७ | पिताने [ज्येष्ठ पुत्र] नाभिको दक्षिणमें स्थित हेम नामक वर्ष (देश) प्रदान किया। उन्होंने हेमकूट नामक जो वर्ष था, उसे किम्पुरुषको दिया। नैषध नामक जो वर्ष कहा गया है, उसे पिताने हरिको दे दिया॥ ६-७॥ |
| इलावृताय प्रददौ मेरूर्यत्र तु मध्यमः।<br>नीलाचलाश्रितं वर्षं रम्याय प्रददौ पिता॥ ८<br>श्वेतं यदुत्तरं तस्मात्पित्रा दत्तं हिरण्मते।<br>यदुत्तरं शृङ्गवर्षं पिता तत्कुरवे ददौ॥ ९<br>वर्षं माल्यवतं चापि भद्राश्वस्य न्यवेदयत्।<br>गन्धमादनवर्षं तु केतुमालाय दत्तवान्॥ १० | पिताने मेरु पर्वतसे आवृत मध्य देश इलावृतको दिया और नीलाचल नामक वर्ष रम्यको दिया। पिताने हिरण्मन्को उत्तरमें स्थित श्वेत नामक वर्ष दिया और उत्तरमें जो शृंगवर्ष है, उसे उन्होंने कुरु नामक पुत्रको दिया। इसी प्रकार उन्होंने भद्राश्वको माल्यवान्वर्ष दिया और केतुमालको गन्धमादनवर्ष दिया॥ ८-१०॥ |
| इत्येतानि महान्तीह नव वर्षाणि भागशः।<br>आग्नीध्रस्तेषु वर्षेषु पुत्रांस्तानभिषिच्य वै॥ ११<br>यथाक्रमं स धर्मात्मा ततस्तु तपसि स्थितः।<br>तपसा भावितश्चैव स्वाध्यायनिरतस्त्वभूत्॥ १२<br>स्वाध्यायनिरतः पश्चाच्छिवध्यानरतस्त्वभूत्। | विभागके अनुसार ये नौ महान् वर्ष हैं। धर्मात्मा राजा आग्नीध्र उन वर्षोंमें अपने उन पुत्रोंको [राजपदपर] क्रमानुसार अभिषिक्त करके तपस्यामें रत हो गये। तपसे अपनेको शुद्ध करनेके अनन्तर वे स्वाध्यायमें संलग्न हो गये और स्वाध्यायमें रत रहनेवाले वे बादमें शिवके ध्यानमें निमग्न हो गये॥ ११-१२ १/२॥ |
| यानि किम्पुरुषाद्यानि वर्षाण्यष्टौ शुभानि च॥ १३<br>तेषां स्वभावतः सिद्धिः सुखप्राया ह्ययत्नतः।<br>विपर्ययो न तेष्वस्ति जरामृत्युभयं न च॥ १४<br>धर्माधर्मौ न तेष्वास्तां नोत्तमाधममध्यमाः।<br>न तेष्वस्ति युगावस्था क्षेत्रेष्वष्टसु सर्वतः॥ १५ | किम्पुरुष आदि जो आठ शुभ वर्ष थे, उनमें स्वभावतः बिना प्रयत्नके ही सुखमय सिद्धि थी। उनमें [किसी प्रकारका] विपरीत भाव नहीं था और [प्रजाओंमें] बुढ़ापे तथा मृत्युका भय नहीं था। उनमें न धर्म था न अधर्म और उत्तम, मध्यम तथा अधम—ये भाव नहीं थे। उन आठों क्षेत्रोंमें हर प्रकारसे युगकी अवस्था नहीं थी॥ १३-१५॥ |
| रुद्रक्षेत्रे मृताश्चैव जङ्गमाः स्थावरास्तथा।<br>भक्ताः प्रासङ्गिकाश्चापि तेषु क्षेत्रेषु यान्ति ते॥ १६<br>तेषां हिताय रुद्रेण चाष्टक्षेत्रं विनिर्मितम्।<br>तत्र तेषां महादेवः सान्निध्यं कुरुते सदा॥ १७ | रुद्रक्षेत्रमें जो भी स्थावर, जंगम, भक्त अथवा अस्थायी आगन्तुक प्राणी मृत होते हैं, वे उन्हीं क्षेत्रोंमें जाते हैं। रुद्रने उनके कल्याणके लिये ही आठों क्षेत्रोंका निर्माण किया है। वहाँपर महादेव सदा उनका सान्निध्य |