स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज
About this granth
This volume presents the Spanda Karika of Kashmir Shaivism through its four classical commentaries. Its title page says the Hindi exposition, named 'Sarojini', draws on Bhatta Kallata's Spanda Karika Vritti, Kshemaraja's Spanda Nirnaya, Utpala's Spanda Pradipika and Ramakantha's Spanda Karika Vivriti. The commentator is Dr. Shyamakant Dwivedi 'Anand', and the book was first published in 2004 by Chaukhamba Surbharati Prakashan, Varanasi, as number 370 of its series.
Kshemaraja, a disciple of Abhinavagupta, read the verses in the light of Pratyabhijna philosophy. After an introduction to Spanda thought, the karikas follow section by section: the first on the nature of spanda and the pulse of consciousness, the second on the rise of innate knowledge, with notes on nadis, bindu and nada.
Running to about 519 pages, it lets a reader compare several commentators on the same verse in one place.
प्रथमः निष्यन्दः २४५
लिए अनुभूयमान नहीं है क्योंकि ये दुःखादिमूलक हैं अतः प्रबुद्ध व्यक्ति इससे मुक्त
होकर उपदेश की शक्ति के कारण आत्मस्वरूप के विवेचन में सक्षम प्रज्ञातिशय द्वारा
स्पन्द तत्त्व का अनुभव करते हैं ।१
मायाशक्ति द्वारा उद्भावित भेदावभास की शक्ति से उल्लसित (भेद भरी)
अनेकताओं द्वारा अनन्त ज्ञान एवं क्रियाओं द्वारा व्यवधीयमान के समान यह 'प्रतिष्ठित
स्पन्द' प्रबुद्ध साधकों को भी उपलब्धि गोचर नहीं । यद्यपि यह भी सत्य है कि समस्त
प्राणी समस्त अवस्थाओं में, नित्योदित प्रतिष्ठित स्पन्द प्रकाश से परिस्फुरित समापत्ति
का, उन्मेष करने में समर्थ है किन्तु माया शक्ति से उद्भावित भेदावभासजन्य नानात्व के
उल्लास से व्यवधीयमान प्रतिष्ठित स्पन्द उपलब्ध नहीं हो पाता ।२
जागृति अवस्था में स्पन्दतत्त्व की अनुभूति—
अत्यधिक क्रुद्ध या अत्यधिक हर्षित होने पर या अकस्मात् दौड़ पड़ने पर और
किंकर्तव्यविमूढ़ होने (मैं क्या करूँ?' की स्थिति में अवस्थित होने) पर जब व्यक्ति के
अन्तःकरण में शक्तिप्रत्यस्तमित दशा का उन्मेष होता है तब उस क्षणिक एकाग्रता की
अवस्था में स्पन्द तत्त्व का स्पष्टतः उदय होता है और इसकी अनुभूति गुरूपदेश से प्राप्त
होता है ।
भट्टकल्लट स्पन्दसर्वस्व में कहते हैं—
‘तस्य च स्पन्दतत्त्वस्य अतिक्रुद्धे प्रहृष्टे धावमाने च किं करोमि, इत्येवं चिन्ताविष्टे
यदा शक्तिप्रत्यस्तमयः, तदा स्पन्दतत्त्वस्य स्फुट एवोदयो गुरूपदेशात् अधिगन्तव्यः ॥’३
सहसा क्रोध की चरम सीमा पर पहुँचा हुआ या हर्ष की पराकाष्ठा पर पहुँचा हुआ
या किसी तर्कशून्य कारणों से—‘मैं क्या करूँ?’—इस प्रकार की किंकर्तव्यविमूढ़ता की
अवस्था में पड़ा हुआ या अकस्मात दौड़ पड़ने के लिए विवश व्यक्ति जिस विशिष्टा-
वस्था में प्रविष्ट हो जाता है उसी में प्रतिष्ठित स्पन्द तत्त्व की उपलब्धि हो जाती है ।
शक्तिप्रत्यस्तमित दशा—दैनिक जीवन में कभी कभी ऐसे विशिष्ट क्षण आते हैं
जब कि मनोभावों के रूप में प्रवाहित विशिष्ट स्पन्द-प्रवाह किसी विशिष्ट स्थिति के आ
जाने से अकस्मात् तत्काल रुक जाते हैं । बाह्य प्रसृत स्पन्द-प्रवाहों का यह गति-निरोध या
यह गतिनिरोधात्मक अवस्था को ही 'वृत्तिक्षयावस्था' 'निस्तिमितबुद्धिदशा' या 'शक्तिप्रत्य-
स्तमित दशा' कहते हैं । ‘शक्तिप्रत्यस्तमितदशा' के क्षणों में शक्ति की प्रवह्मानता अवरुद्ध
नहीं होती प्रत्युत् बाह्योन्मुख प्रवाह अकस्मात् अपने मार्ग की दिशा परिवर्तित करके
क्षणभर के लिए अन्तर्मुखी हो जाता है और विद्युत के समान तीव्र गति से गतिमान होकर
सामान्य स्पन्द से एकाकार होकर फिर विशेष स्पन्द रूप से प्रवाहित हो जाता है ।
जागृतावस्था में सामान्य स्पन्दतत्त्व की अनुभूति 'शक्तिप्रत्यस्तमित' क्षणों में ही
१-२. रामकण्ठाचार्य : ‘स्पन्दकारिकाविवृति' ।
३. भट्टकल्लट : ‘स्पन्दसर्वस्व' ।
२४६ स्पन्दकारिका
संभव है। क्योंकि इन विशिष्ट क्षणों में विशेष स्पन्दों का क्षोभ पूर्णतः शान्त हो जाता है।
जब किसी व्यक्ति के मन में क्रोध, हर्ष, भय या अन्य कोई विशिष्ट मनःस्थिति
उत्पन्न होती है तब वह मन की अन्य वृत्तियों को तिरोहित करती है। वर्तमान मनोभाव
जितनी ही तीव्रता के साथ उभरते हैं उतनी ही तीव्रता से पुराने मनोभावों को तिरोहित कर
देते हैं। किसी (भय, क्रोध, काम, लोभ, आदि) मनोभाव पर तत्काल उत्पन्न तीव्रतम मनो-
भाव जितनी तीव्रता से आक्रमण करता है उतनी ही तीव्रता से पूर्ववर्ती मनोभाव तत्काल
नष्ट होता है और नया तत्काल (पूर्वमनोभाव विस्मृत करके) उत्पन्न होता है। जितनी
तीव्रता से उभर आने वाला भाव उभर आता है उतनी ही तीव्रगति से उकसा पूर्ववर्ती
मनोभाव डूब जाता है। इन दोनों भावों के अप्रत्याशित अन्त एवं आरंभ के मध्य में जो
(मध्य में) एक बहिर्मुखी विशेष वृत्ति उदित है—यह अकस्मात् उत्पन्न होने वाली क्षणिक
मनोवृत्ति निर्विकल्प, स्तब्ध एवं भयानक मनोवेग के रूप में उदित होती है।
'विज्ञानभैरव' (११९) में कहा गया है—
क्षुधाद्यन्ते भये शोके गह्वरे वारणद्रुते ।
कुतूहले क्षुधाद्यन्ते ब्रह्मसत्तामयी दशा ॥
यह क्षण एक निर्विकल्प क्षण है और इसमें विद्युत की तीव्रतम कौंध की भाँति
एक मनोभाव उदित होकर नष्ट हो जाता है यथा सिंह को देखकर उत्पन्न भय ॥
इस क्षण के उदित होने पर सुख, दुःख, मूढ़ता आदि अन्तःकरणावृत्तियाँ नष्ट हो
जाती हैं और इस नवोत्पन्न विशिष्ट क्षण में मात्र सामान्य स्पन्द तत्त्व अस्तित्व में रहता
है। मनोभावों को उन्मज्जन एवं निमज्जन की यह क्रिया अविराम गति से चलती रहती
है किन्तु जब यह उदित होती है तो उसका व्यक्ति को मान भी नहीं रह जाता। क्योंकि
अत्यन्त सूक्ष्म होने के कारण बुद्धि इसे पकड़ नहीं पाती।
यही क्षण शक्तिपात के समय भी उदित होता है। गुरु अपनी शक्तिपात-सामर्थ्य
द्वारा इन मध्यवर्ती संधिक्षणों एवं तन्निहित स्पन्द तत्त्व की अनुभूति अपने शिष्यों को
करवा देते हैं। शक्तिपात की दृढ़ता से बहिर्मुखी स्पन्द प्रवाह को योगी कूर्मांगसंकोचवत्
अपने भीतर समेटकर (अन्तर्मुखी होकर) इस विशिष्ट एवं एकाग्रतानिष्ठ क्षण पर स्थिर
रहने की क्षमता प्राप्त कर लेता है।
प्रस्तुत कारिका में—क्रोध, हर्ष एवं मूढ़ता से—सुख, दुःख एवं मोह युक्त
अन्तःकरण की वृत्तियों को ग्रहण करके ज्ञानेन्द्रियों की जागृतावस्था एवं दौड़ने की क्रिया
द्वारा समस्त बाह्यवर्ती कर्मेन्द्रियवृत्तियों का ग्रहण किया गया है और यह संकेतित किया
गया है कि—जागृतावस्था में भी स्पन्द तत्त्व समान रूप से उपलब्ध होता है।
जागृति की अवस्था में भी स्पन्द तत्त्व का साक्षात्कार—
प्रबुद्ध साधकों को गुरु अपने विशेषानुग्रह के द्वारा जाग्रत अवस्था में भी स्पन्द
शक्ति की अनुभूति करा देते हैं। बार-बार अभ्यास करने पर वे उसे स्थिरता (एकाग्रता में
स्थिरता) प्राप्त कर लेते हैं।
प्रथमः निष्यन्दः २४७
मूढ़ एवं प्रबुद्ध साधकों की अवस्था की तुलना (योगमार्गीय साधना का अवलम्बन)—
यामवस्थां समालम्ब्य यदऽयं मम वक्ष्यति ।
तदवश्यं करिष्येऽहमिति सङ्कल्प्य तिष्ठति ॥ २३ ॥
तामाश्रित्योर्ध्वमार्गेण सोमसूर्यावुभावपि ।
सौषुम्णेऽध्वन्यस्तमितो हित्वा ब्रह्माण्डगोचरम् ॥ २४ ॥
तदा तस्मिन् महाव्योम्नि प्रलीनशशिभास्करे ।
सौषुप्तपदवन्मूढः प्रबुद्धः स्यादनावृतः ॥ २५ ॥
कोई सेवक या शिष्य—'यह (मेरा स्वामी या शास्ता) मुझसे (जो कोई भी कार्य
करने हेतु) कहेगा उसे मैं अवश्य करूँगा'—इस प्रकार सङ्कल्पबद्ध होकर, जिस अवस्था
(वृत्ति प्रत्यस्तमित अवस्था) का अवलम्बन ग्रहण करके स्थित रहता है ॥ २३ ॥
(उस साधक की) उसी अवस्था का अवलम्बन ग्रहण करके उसके चन्द्रमा एवं
सूर्य शरीर-मार्ग (ब्रह्माण्डगोचर) का त्याग करके ऊर्ध्व मार्ग द्वारा सुषुम्णा-मार्ग में (प्रवेश
करके) उसी में लयीभूत हो जाते हैं ॥ २४ ॥
तब उस 'महाव्योम (चिदाकाश) में चन्द्रमा एवं सूर्य के लीन हो जाने पर प्रबुद्ध
योगी तो अनावृतस्वरूप वाला होकर अवस्थित होता है किन्तु मूढ़ (मुह्यमान) (उस
अवस्था में भी) सुषुप्ति पद जैसी प्रगाढ़ तमावस्था में पड़ा रहता है ॥ २५ ॥
- सरोजिनी *
सूर्य और चन्द्रमा, ऊर्ध्वपथ के द्वारा इस सांसारिक पदार्थ को पीछे छोड़ते हुए,
सुषुम्ना के मार्ग में स्थित हो जाते हैं किन्तु यह तभी संभव हो पाता है जबकि योगी उस
अवस्था में दृढ़ अवस्थान करते हुए निम्न दृढ़ सङ्कल्प लेता है—१
मैं निश्चित रूप से एवं आवश्यक रूप से वह सभी कहूँगा जो कि यह यथार्थसत्ता
मुझसे कहेगी । तब उस महाव्योम जहाँ चन्द्र एवं सोम लुप्त हो चुके हैं वह योगी जो कि
सुषुप्ति की भाँति कार्य करता है, निश्चय ही जड़ है तथा वह उसमें आच्छादित तत्त्व
अवश्यमेव प्रकाशित हो उठता है ।
योगी सङ्कल्प करता है एवं दृढ़निश्चय करता है कि मुझे समस्त बहिर्भाव का त्याग
कर देना चाहिए तथा वह आवश्यक रूप से ऐसा कर भी देता है या उसे उसके प्रति
अपने को पूर्णतया समर्पित कर देना चाहिए जो कि उसका शङ्कर से अभिन्न स्वभाव
कहता है ।२
यह मेरा जो शङ्करात्मा स्वभाव है वह जो मुझसे कहेगा और जो चिदानन्दघन,
अनुभूतपूर्व स्वरूप मुझसे कहेगा विमर्शन करेगा उसे मैं अवश्य करूँगा और बहिर्मुखता
का त्याग करके तत्प्रवण ही हो जाऊँगा—ऐसा सङ्कल्प करके जिन क्रोधादि अवस्थाओं
१-२. स्पन्दनिर्णय ।
२४८ स्पन्दकारिका
में अनुभूतचरी, चिदानन्दघन स्पन्दात्मिका अवस्था का अवलम्बन ग्रहण करके स्थित
होता है और विकल्पों का शमन करके अविकल्प अवस्था का अवचिल रूप में आश्रय
लेता है और ऐसा करके जो योगी प्राणापान दोनों को हृदयभूमि में एकसाथ मिलाकर
सौषुम्न मार्ग में स्थित ब्रह्मनाड़ी में ऊर्ध्वमार्ग वाले उदान पथ से शमित करके एवं
ब्रह्माधिष्ठित लोक का त्याग करके और ऊर्ध्व कपाटान्त देह व्याप्ति का त्याग करके और
तब सूर्य और चन्द्रमा को लय करने वाले महा व्योम में (निःशेषवेद्योपशम रूप
परमाकाश में) स्थित होने पर भी गुणनिष्यन्द से व्यामोहित होकर सौषुप्तवत् हो जाता
है—शून्यादिभूमि में अवस्थित हो जाता है—वह योगी पूर्णतया अनभिव्यक्तस्वभाव वाला
होकर मूढ़ कहलाता है क्योंकि जिसका स्वस्वभाव सम्यक् रूप से अभिव्यक्त नहीं होता
वह स्वप्न आदि के द्वारा मुह्यमान होकर अप्रबुद्ध ही रहता है।१ किन्तु जो वहाँ पर भी
अपने प्रयत्न-कौशल से उद्यन्तूताशक्ति द्वारा क्षण मात्र भी शिथिल नहीं होता वह तमोगुण
से अनभिभूत होने के कारण चिदा-काशमय होने के द्वारा ही अवस्थित होकर ‘प्रबुद्ध’
कहलाता है। अतः अनवरत प्रयास से योगी ही होना चाहिए ॥२ ‘सौषुम्ण अध्व’ का
महत्व क्या है? ‘सुषुम्णा’ वाहिनि प्राणेसिद्धयत्येव मनोन्मनी’ = ‘मनोन्मनी’ का उदय ॥
अब इसी स्पन्दतत्त्व के जीवन में उदय होने के लिए उपाय का निर्देश करते हुए ग्रन्थकार
कहता है—‘यामवस्थां ... ब्रह्माण्डगोचरम् ॥’
‘ये हमारे गुरुदेव हैं’ ‘ज्ञानाग्रगण्य हैं और ये अनिर्वचनीय सद्वस्तु का भी निर्वचन
कर सकते हैं। इनकी आज्ञा का कोई अतिक्रमण नहीं कर सकता। ये जो कुछ भी मुझसे
कहेंगे मैं अवश्य करूँगा—यह दृढ़ संकल्प धारण करके साधक जब उन्मुखतारूप वृत्ति
का आलम्बन लेकर स्थिर हो जाता है तब उसकी उस अवस्था में ऊर्ध्वमार्ग से विषुवत
प्रवाह के द्वारा सोम, सूर्य, अपान प्राण, मन, सुषुम्णा के मार्ग में (जो कि पराशक्ति का
मार्ग है—मध्यम नाड़ी है)—विलीन हो जाते हैं। पता नहीं गुरुदेव क्या आज्ञा देंगे?—
यह कुतूहल वासनाओं को पीस डालता है। उस समय साधक ब्रह्माण्ड स्थित शरीर-
विषय का परित्याग करके ‘देहाहंभाव’ से मुक्त हो जाता है। कहा भी गया है कि—देह में
अहं प्रत्यय का द्वीप भग्न हो गया। अनन्त संवित् रूप निर्मल समुद्र से एकता हो गयी।
इन्द्रियसम्मूह अन्तर्मुख हो गया। बस तुम एक अद्वितीय विश्वात्मा हो ॥’—३
‘जाते देहप्रत्ययद्वीपभंगे प्राप्तैकत्वे निर्मले बोधसिन्धौ।
अध्यावर्त्यैवेन्द्रियग्राममन्तर्विश्वात्मा त्वं नित्यमेकोऽवभासि ॥’
ऐसी अवस्था में ‘महाव्योम’ अर्थात् परचिदाकाश में सूर्य एवं चन्द्रमा, ज्ञान और
क्रिया—दोनों शान्त हो जाते हैं। स्वभाव में अभिव्यक्ति नहीं होती। स्वप्न, जाग्रत आदि
के दृश्यों से मोह नहीं होता। वह प्रबुद्ध और अनिरुद्ध हो जाता है, मानो सुषुप्ति हो।
किन्तु उस समय वह प्रबुद्ध और आवरणरहित ही होता है।४
‘रहस्यस्तोत्र’ में कहा गया है—बड़े-बड़े आकाशगामी सिद्धपुरुष भी, जिन्होंने
१-२. स्पन्दनिर्णय। ३-४. उत्पलदेव—‘स्पन्दप्रदीपिका’।
प्रथमः निष्यन्दः २४९
अपनी आत्मसंवित् में सूर्य-सोम अर्थात् ज्ञान-क्रिया को लीन कर लिया है, व्योममार्ग का
अतिक्रमण कर चुके हैं और अपनी दृष्टि में भावना का अञ्जन लगाए हुए हैं उनमें भी
किसी-किसी को तुम्हारे स्वरूप का दर्शन होता है—
‘स्वात्मनि स्तिमितसोमभास्करं व्योममार्गमभिवर्त्यतस्थुषः ।
भावनाञ्जितदृशोऽपि खेचराः केचिदेव तव धामदर्शिनः ॥’
निरञ्जन तत्त्व के उदय में प्राण एवं अपान की प्रशान्ति को ही आत्मदर्शन की
युक्ति बतलाया गया है ।१
‘भोगमोक्षप्रदीपिका’ में कहा गया है—हृदय में सोम-सूर्य के संचार से काम
सिद्धि होती है और उनकी शान्ति से निरञ्जन तत्त्व की । यही शास्त्र का सर्वस्व है । इसी
अवस्था में सहज मन्त्र का उदय होता है—
‘कामाख्ये विषतत्तवे निरञ्जनाह्ने क्रमाच्च सिद्धिः स्यात् ।
सूर्ये सोमे हृदयात्तयोः शमाच्चेति शास्त्रसर्वस्वम् ॥’
‘बौद्धायनसंहिता’ में कहा गया है कि—चन्द्रमा शान्त हो जाय और सूर्य का
उदय न हो, उस समय समस्त देवताओं (इन्द्रियों) का विलय और सभी मन्त्रों का उदय
होता है— शान्ते चंद्रे त्वमात्राख्ये यावन्नोच्चरते रविः ।
उदयः सर्वमन्त्राणां विलयश्च दिवौकसाम् ॥
‘मालिनीविजय’ में कहा गया है—जिस अवस्था में जीव अन्याधार—विनिर्मुक्त
होकर स्वरूप में लीन हो जाता है, वही सम्पूर्ण मन्त्रों की उत्पत्ति का क्षेत्र (स्थान)
होता है ।’२
इसके अतिरिक्त भी कहा गया है कि—जब पुरुष का चित्त धर्म एवं अधर्म के
संधिस्यल में निरुद्ध हो जाता है तब वह जो बोलता है वही मन्त्र हो जाता है । स्वर-
वर्ण-मातृका से निर्मित मन्त्र ही मन्त्र नहीं होते—
यत्राधारविनिर्मुक्तो जीवो लयमवाप्स्यति ।
तत् स्थानं सर्वमन्त्राणामुत्पत्तिक्षेत्रमिष्यते ॥
धर्माधर्मान्तरे चित्तं निरुद्धं यत्तदा तु सः ।
यद्वक्ति स भवेन्मन्त्रः किं पुनर्मातृकोत्थितः ॥
तां = उस । (अर्थात् ‘यामवस्थां’ द्वारा उपलक्षित एवं वाक्य-निर्दिष्ट अवस्था में)
उस दशा को । सुषुम्णा = कालभोक्त्री = ‘भोक्त्री सुषुम्णा कालस्य’ (हठ०प्र०४।१७)।
आश्रित्य = (प्राप्त करके) आश्रय लेकर ।
चन्द्रसूर्यौ = पुरुष के चन्द्रसूर्य (मन एवं प्राण) दोनों ही—
अस्तमितः = विलीन हो जाते हैं । क्या करके विलीन हो जाते हैं? ‘ब्रह्माण्डं
शरीर स एव स्वप्रसराधिकरणं, तं हित्वा’ (त्यक्त्वा) अर्थात् संवेद्यता के अभाव के कारण
१-२. उत्पलदेव—‘स्पन्दप्रदीपिका’ ।
२५० स्पन्दकारिका
(के द्वारा) उसका अतिक्रमण करके किस मार्ग से विलीन होता है? ऊर्ध्वमार्ग द्वारा
विलीन होता है अर्थात् सर्वातिरिक्त अलौकिकमार्ग से विलीन होता है।
चन्द्र = 'मनःप्रसररूपा ज्ञानशक्ति'। यह द्विपकारा है—(१) 'इदं हेयम्' (२) 'इदं
उपादेयम्' (यह त्याज्य है और यह ग्राह्य है) ॥
आलम्बनीय निजी विषय को न पाकर (अतिक्रमण करके) उस अवस्था में
मध्यमार्ग प्राप्त करके उसका स्वकारण ही लीन हो जाता है। 'सूर्य'—'प्राणप्रसररूपा
क्रियाशक्ति'। यह प्राणप्रसरणरूपा क्रियाशक्ति जो कि नाड़ी-मण्डल में संचार करती है
और सामान्य प्राणरूपता प्राप्त करके लोकातिरिक्त मार्ग से अपने पद में लीन हो जाती
है। 'सुषुम्णा' ७२ हजार नाड़ियों में श्रेष्ठतम है, शेष निरर्थक हैं—'शेषास्त्वनिरर्थकाः'
(ह०प्र०) 'सौषुम्नेऽध्वन्यस्तमित'—सुषुम्णा मार्ग में अस्तमित । सुषुम्णा = 'मध्यमा
नाड़ी' १ शरीर के मध्य में स्थित सुषुम्णा नामक मध्य नाड़ी मार्ग में, अर्थात् परा पारमेश्वरी
शक्ति के प्रवहणमार्ग में, प्रशमित ज्ञेय कार्यों में संवर्द्धित उपराग के परित्याग के द्वारा
परशक्ति के रूप की प्राप्ति होती है। सुषुम्णा कालभोक्त्री है शांभवी शक्ति है—
'सुषुम्णा शांभवी शक्तिः' = 'भोक्त्री सुषुम्णा कालस्य' ।
उस कौन सी दशा का आश्रय ग्रहण करके? 'यामवस्था समालम्ब्य'—सम्यक्
रूप से परित्यक्त समस्त वस्तुओं की व्यापृति के स्तिमित होने से समस्तशक्तिसम्पन्नता
का आलम्बन लेकर पुरुष स्थित होता है। क्या करके? आलम्बन लेकर । समालम्बन
क्रियापूर्वक क्रियान्तरनिष्ठ वाक्य के रूप में कारिकाकार कहते हैं—'इति संकल्प्य' ॥ —
इस प्रकार का संकल्प करके ।
किस प्रकार? 'यदयं मम् वक्ष्यति तदवश्य करिष्येऽहम्'—मुझसे जो कुछ भी
कहेंगे उसे मैं अवश्य करूँगा।' क्योंकि आज्ञा के अतिक्रमण से तत्काल मृत्यु आदि
संभावित रहती है।
अयं यद (यदयं) वस्तु = यह जो वस्तु । मम मुझसे (मेरा)। कर्तव्य के रूप में।
वक्ष्यति = कहेंगे (जल्पिष्यति) तदवश्यं = उसे अवश्य । सर्वात्मना सभी अन्य कार्यों का
परित्याग करके मैं—करिष्ये = संपादित करूँगा।—यही दोनों की वाक्यार्थ संगति है।
किसी कारण से अवश्यमेव करणीय कार्यों को करने हेतु आदेशित वाणी से
कार्यितव्य वस्तु-विवक्षा से आक्षिप्त पुरुष द्वारा उन वचनों को सुनने से समस्त वृत्तियों
के निर्लीन होने से साधकसंविदात्मक तुरीयावस्था अवश्य प्राप्त कर लेता है—'संवित्
तुरीयां दशाम् अवश्यमेवाविशति ।।' परिणामस्वरूप वह उसके प्रत्यवमर्श के अभ्यास से
परम तत्त्व को प्राप्त कर लेता है—'संवित् तुरीयां दशाम् अवश्यमेवाविशति, तत्प्रत्यव-
मर्शाभ्यासात् परतत्त्वोपलब्धिः ॥' २
१. इयं तु मध्यमा नाड़ी दृढाभ्यासेन योगिनाम् ।
आसनप्राणायाममुद्राभिः सरला भवेत् ॥ (ह०यो०प्र०)
२. रामकण्ठाचार्य : 'स्पन्दकारिकाविवृति' ।
प्रथमः निष्यन्दः २५१
यहाँ 'ब्रह्माण्डगोचर' शब्द द्वारा शरीराकाश के चन्द्र-सूर्य शब्दों के अर्थात् मन
एवं प्राण के प्रसरण का प्रतिपादन किया गया है ।
उपदेश का प्रयोजन—इस उपदेश का प्रयोजन यह है कि—इस उपदेश द्वारा
प्रत्यभिज्ञापित तुरीय दशा के प्रत्यवमर्शाभ्यास की काष्ठा पर आरूढ़ प्रबुद्ध साधक को,
समस्त बाह्याभ्यन्तर की अध्वा को अतिक्रान्त करके परमपद में विश्रान्ति प्राप्त होती है—
'प्रत्यभिज्ञापित तुरीय दशा प्रत्यवमर्शाभ्यासकाष्ठाधिरोहिणः प्रबुद्धस्य निखिल
बाह्याभ्यन्तराध्वातिक्रान्तपरमपदविश्रान्तिलाभः इति ॥'
कहा भी गया है—'यां स्पन्दरूपामवस्थाम्' ॥१
योगशास्त्र में सोम सूर्य (शशिभास्करे) के अनेक अर्थ बताए गए हैं—
(१) सोम = अपान । सूर्य = प्राणवायु ॥२
(२) सोम = चन्द्रनाड़ी, । सूर्य = सूर्य नाड़ी = (चन्द्रस्वर एवं सूर्यस्वर)
(वामनाड़ी) (दक्षिण नाड़ी) नासापुट में प्रवाहित
श्वास-प्रवाह ।
(३) 'ठ' 'ह' ।
(४) सोम = इड़ा नाड़ी । सूर्य = पिंगला नाड़ी श्वास-प्रवाह ।
(५) सोम = वामनासापुट प्रवाहित प्राण । सूर्य = दक्षिणनासापुट प्रवाहित प्राण ॥
(६) अधोप्रदेश में स्थित वायु 'सूर्य' = हृदयस्थ वायु ॥
१. नाड़ी २. नाड़ियों में प्रवाहित श्वास—प्राणापान आदि को सूर्य-चन्द्र (ह + ठ)
कहा गया है । ('हश्च ठश्च सूर्यचन्द्रौ') 'प्राणापानयोग' सूर्यचन्द्रयोग, 'गङ्गा यमुना संयोग'
आदि इन्हीं दो तत्त्वों के साधनापरक अभिधानान्तर हैं । जब तक साधक 'सूर्य' एवं
'चन्द्रमा' (पिंगला नाड़ी एवं इड़ा नाड़ी) की दासता में रहता है अर्थात् जब तक उसके
प्राण इड़ा एवं पिंगला में प्रवाहित होते रहते हैं तब तक वह बन्धन, माया, अज्ञान,
अविद्या एवं संसरण-चक्र में पड़ा रहता है किन्तु जैसे ही उसका प्राण-संचार इन दोनों
मार्गों का त्याग करके तृतीय मार्ग—सुषुम्णा नाड़ी मार्ग में होने लगता है वह ऊर्ध्वधाम
की यात्रा करने एवं आत्मबल का संस्पर्श पाने के कारण मुक्त हो जाता है ।
प्रस्तुत कारिका में योगशास्त्रीय नाड़ीगत साधना को आत्मीकृत करने का उपदेश
दिया गया है । शास्त्रों में 'प्राणापानसमायोग' को ब्रह्माद्वैत के प्रकाशन का साधन
माना गया है—
१. रामकण्ठाचार्य : 'स्पन्दकारिकाविवृति' ।
२. सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गोरक्षनाथ)—
सुषुम्णा को मध्यमा नाड़ी भी कहते हैं—द्वयं तु मध्यमा नाड़ी ।
हकारः कथितः सूर्यष्ठकारश्चन्द्र उच्यते ।
सूर्यचन्द्रमसोर्योग़ाद्धठयोगो निगद्यते ॥
२५२ स्पन्दकारिका
'प्राणापानसमायोगाच्छब्दतत्त्वसमाश्रयात् ।
विज्ञानतत्त्वं सापेक्षात् ब्रह्माद्वैतं प्रकाशते ॥'
गीता में 'प्राणापान' (सूर्य-चन्द्र) को प्राणायाम के प्रसंग में इस प्रकार निरूपित
किया गया है— 'अपाने जुह्वति प्राणं प्राणापाने तथापरे ॥
प्राणापानगतीरुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः ॥'
प्राणापान की गति रोककर या समान करके योगी सुषुम्णा नाड़ी में प्राणों का
संचार करके परमपद प्राप्त करते हैं ।
'हठयोगप्रदीपिका' में कहा गया है कि प्राणापान, नादबिन्दु की एकता से योग
की संसिद्धि प्राप्त होती है—
'प्राणापानौ नादबिन्दूमूलबन्धेन चैकताम् ।
गत्वा योगस्य संसिद्धिं यच्छतो नाम संशयः ॥ (३।६४)
योग पद्धति के अनुसार—इड़ा पिंगला में वायुसंचार रोककर इसे सुषुम्णा
(मध्यमा) में प्रवाहित करके इसे ब्रह्मरंध्र में रोकना चाहिए—
'ज्ञात्वा सुषुम्नासद्भेदं कृत्वा वायु च मध्यगम् ।
स्थित्वा सदैव सुस्थाने ब्रह्मरंध्रे निरोधयेत् ॥ (ह० ४।१६)
शाक्तभूमिका में प्रविष्टोन्मुखी योगियों की स्थितियों का विवेचन—
स्पन्दसूत्रकार ने मूढ़ एवं प्रबुद्ध योगियों की साधनावर्ती अनुभूतियों के अन्तर का
विवेचन करते हुए कहा है कि—
'यह स्पन्दस्वरूपात्मिका चिद्रूपा शक्ति मुझे जिस प्रकार की स्वरूपविमर्शानात्मिका
अनुभूति प्रदान करेगी मैं उस पर आरूढ़ रहूँगा'—इस प्रकार संकल्प लेकर जिस प्रकार
की वृत्तिप्रत्यस्तमितावस्था का आश्रय ग्रहण करके अवस्थित रहता है ।
(जिस अवस्था का आलम्बन ग्रहण करके यह मुझसे जो कहेगी उसे मैं अवश्य
करूँगा—इस प्रकार का संकल्प ग्रहण करके ही योगी (अग्रवर्ती साधना के लिए) स्थित
रहता है ।)
भट्टकल्लट की व्याख्या—जिस स्पन्दस्वरूपा अवस्था को ग्रहण करके 'यह
मुझसे जो कुछ भी कहेगी उसे मैं अवश्य करूँगा'—इस प्रकार के अध्यवसाय पूर्वक जो
योगी स्पन्दतत्त्व में अधिष्ठित होकर—
'यां स्पन्दस्वरूपरूपामवस्थामवलम्ब्य' 'यत्किंचित् अयं मम वक्ष्यति, तत् अवश्यं
करिष्यामि'—इत्यध्यवसायेन स्पन्दतत्त्वमधिष्ठाय यो वर्तते ॥'
उसका आश्रय ग्रहण करके सोम एवं सूर्य (प्राणापान) दोनों शरीर छोड़कर ऊर्ध्व
मार्ग से सुषुम्ना मार्ग में लय हो जाते हैं ।
भट्टकल्लट की व्याख्या—उस पुरुष की उस अवस्था का आश्रय ग्रहण करके,
सोम और सूर्य दोनों को सुषुम्ना मार्ग में अर्थात् मध्यनाड़ी में स्तमित करके तथा
प्रथमः निष्यन्दः २५३
'ब्रह्माण्डगोचर' (शरीमार्ग) का त्याग करके योगी गण—'तस्य तामवस्थामाश्रित्य पुरुषस्य
सोमसूर्यौ द्वावपि सौषुम्ने अध्वनि मध्यनाड्यभिधाने अस्तमयं कुरुतः ब्रह्माण्डगोचरं शरीर-
मार्गं परित्यज्य योगिनः ॥'
'उस समय उस महाव्योम में शशि-भास्कर (प्राणापान) के प्रलीन हो जाने पर भी
मूढ़ साधक उस अवस्था में भी सुषुप्तिपद के समान प्रगाढ़ अंधकार में पड़ा रहता है
किन्तु प्रबुद्ध भूमिका पर अवस्थित योगी की चिन्मात्र आत्म संवित् की अनुभूति पर कोई
भी आवरण नहीं रहता ॥'
भट्टकल्लट की व्याख्या—उस महाव्योम में सूर्य-चन्द्र के अस्त हो जाने के
उपरान्त भी जिसके स्वभाव (आत्मा) की अभिव्यक्ति नहीं होती वह स्वप्न आदि के
मुह्यमान अप्रबुद्ध योगी (आत्माभिव्यक्ति के ऊपर पड़े आवरण द्वारा) मोहावृत (निरुद्ध)
रहता है किन्तु प्रबुद्ध योगी की आत्माभिव्यक्ति के ऊपर ऐसा कोई आवरण नहीं रहता—
'तस्मिन् महाव्योम्नि प्रत्यस्तमित शशिभास्करे यस्य स्वस्वभावाभिव्यक्तिः न सम्यक् वृत्ता
स स्वप्नादिना मुह्यमानोऽप्रबुद्धो निरुद्धः स्यात्, प्रबुद्धः पुनरावृत एव भवति ॥'
सौषुम्ण अध्व = 'सुषुम्णा' को ही 'पश्चिम पथ' भी कहा गया है। योगपद्धति यह
है कि प्राण संचार इड़ा-पिंगला से रोककर सुषुम्णा में प्रवाहित किया जाता है—'इडां च
पिंगला बद्ध्वा वाहयेत्पश्चिमे पथि ॥' (३।७४) ऊपर 'चन्द्रमा' है और नीचे 'सूर्य' है—
'ऊर्ध्वनाभेरधस्तात्तोरुध्वं भानुरधः शशी' विपरीतकरणी मुद्रा में सूर्य ऊपर चन्द्र नीचे से
जाता है ।
शरीर में ७२ हजार नाड़ियाँ हैं । उनमें १४ तथा १४ में ३ नाड़ियाँ प्रमुख हैं
और उनमें भी 'सुषुम्णा' नाड़ी सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है । इसीलिए योगी स्वात्माराम
मुनीन्द्र ने 'कुण्डलिनी' एवं 'मनोन्मनी' के साथ सुषुम्णा की भी वन्दना की है—
सुषुम्नायै कुण्डलिन्यै सुधायै चन्द्रजन्मने ।
मनोन्मन्यै नमस्तुभ्यं महाशक्त्यै चिदात्मने ॥ (हठयोगप्रदीपिका ४।६४)
स्वात्माराम मुनीन्द्र कहते हैं कि जब तक प्राण 'मध्यमार्ग' (सुषुम्णा नाड़ी) में
प्रवेश नहीं करता तब तक ज्ञान की बात करना केवल दम्भ एवं मिथ्या प्रलाप है—
'यावन्नैव प्रविशति चरन् मारुतो मध्यमार्गे ।
तावज्ज्ञानं वदति तदिद दम्भ मिथ्या प्रलापः ॥ (हठयोगप्र० ४।११४)
'अमृतसिद्धि' में भी यही बात कही गई है—
'यावद्धि मार्गतो वायुर्निश्चलो नैव मध्यगः ।
असिद्धं तं विजानीयाद्वायुं कर्मवशानुगम् ॥'
योग का सर्वोच्च सोपान 'असंप्रज्ञात समाधि' है । सुषुम्णा उसका भी साधन है
क्योंकि प्राणों के सुषुम्णा नाड़ी में प्रवेश करने पर मनोन्मनीरूप असंप्रज्ञात समाधि की भी
प्राप्ति होती है—
'सुषुम्नावाहिनि प्राणे सिद्ध्यत्येव मनोन्मनी ।' (४।२०)
२५४ स्पन्दकारिका
सुषुम्ना में प्राणसंचार एवं 'मनोन्मनी' का उदय—चित्त के अस्तित्व के दो
घटक हैं—(१) 'वासना' (२) 'प्राण' । इनमें से एक के भी नष्ट हो जाने पर दूसरा
स्वयमेव नष्ट हो जाता है—
'हेतुद्वयं तु चित्तस्य वासना च समीरणः ।
तयोर्विनष्ट एकस्मिंस्तौ द्वावपि विनश्यतः ॥ (हठयोगप्रदीपिका ४।२२)
'द्वे बीजे राम! चित्तस्य प्राणस्पन्दनवासने ।
एकस्मिंश्च तयोर्नष्टे क्षिप्रं द्वे अपि नश्यतः ॥' (योगवासिष्ठ)
'मध्यमार्गे सुषुम्नायां चरन् गच्छन् मारुतः प्राणवायुः यावत् यावत्कालपर्यन्तं न
प्रविशति प्रकर्षेण ब्रह्मरंध्रपर्यन्तं नं विशति ब्रह्मरंध्रं गतस्य स्थैर्यंति ब्रह्मरंध्रं गत्वा न स्थिरो
भवति ॥ सुषुम्नायामसंचरन् वायुरसिद्ध इत्युच्यते । ('ज्योत्स्ना' ह०प्र०)
योग-विधान के अनुसार नाड़ी चक्र का विशोधन करके प्राण-संयम करने से
सुषुम्णा के प्रवेशद्वार का भेदन करके प्राण उसके मुख में प्रवेश कर जाता है और
सुषुम्णा में प्राण के प्रवेश से मन में स्थिरता का उदय हो जाता है । मन का यही
सुस्थिरीभाव या सुस्थिरावस्था 'मनोन्मनी' (असंप्रज्ञात समाधि) कहलाती है—
(१) विधिवत्प्राणसंयामैर्नाडीचक्रविशोधिते ।
सुषुम्नावदनं भित्त्वा सुखाद्विशति मारुतः ॥ (२।४१)
(२) मारुते मध्यसंचारे मनःस्थैर्यं प्रजायते ।
यो मनः सुस्थिरीभावः सैवावस्था मनोन्मनी । (२।४२)
अभ्यस्त (प्राणायाम से नियंत्रित) वायु जठराग्नि के साथ कुण्डली-बोधन के साथ
सुषुम्णा में प्रवेश कर जाता है—
'वायुः परिचितो यस्मादग्निना सह कुण्डलीम् ।
बोधयित्वा सुषुम्नायां प्रविशेदनिरोधतः ॥ (हठयोग प्र०४।१९)
सुषुम्णा और कालभक्षण—जब प्राणवायु सुषुम्णा में प्रवाहित होने लगता है तब
मन, देश, काल एवं वस्तु के परिच्छेद से शून्य ब्रह्म में प्रविष्ट हो जाता है और तब
चित्तवृत्ति के निरोध का ज्ञाता योगी प्रारब्धसहित संपूर्ण कर्मों को निर्मूल कर देता है—
'सुषुम्नावाहिनि प्राणे शून्ये विशति मानसे
तदा सर्वाणि कर्माणि निर्मूलयति योगवित् ॥'
सुषुम्ना में प्राण-प्रवाह से 'अमरोली', 'वज्रोली' एवं 'सहजोली' भी उदित हो
उठती हैं— चित्ते समत्वमापन्ने वायौ व्रजति मध्यमे ।
तदाऽमरोली वज्रोली सहजोली प्रजायते ॥ (हठयोग प्र० ४।१४)
सोमसूर्य रात्रिदिवसात्मक काल के धारक हैं किन्तु सुषुम्णा काल की भोक्त्री है—
'सूर्याचन्द्रमसौ धत्तः कालं रात्रिंदिवात्मकम् ।
भोक्त्री सुषुम्ना कालस्य गुह्यमेतदुदाहृतम् ॥' (ह०प्र०)
प्रथमः निष्यन्दः २५५
सुषुम्णा और कुण्डलिनी—सुषुम्णा के समानार्थक एवं पर्याय—स्वात्माराम
मुनीन्द्र ने 'हठयोगप्रदीपिका' में सुषुम्णा नाड़ी के निम्न पर्याय बताए हैं—
'सुषुम्ना शून्यपदवी ब्रह्मरंध्रं महापथः ।
श्मशानं शांभवी मध्यमार्गश्चेत्येकवाचकाः' ॥ ४ ॥
यह सच्चिदानन्द ब्रह्म की प्राप्ति का द्वार है और कुण्डलिनी इसी सुषुम्णा के द्वार
को रोककर सो रही है—
(१) 'कुण्डलीबोधनेनैव षट्चक्रभेदादिकं भवति तस्मात् सर्वप्रयत्नेन सर्वेण प्रयत्नेन
ब्रह्मसच्चिदानन्दलक्षणं तस्य द्वारं प्राप्त्युपायः सुषुम्ना तस्या मुखेऽग्रभागे मुखेन सुषुम्नाद्वारं
पिधाय सुप्तामीश्वरीं कुण्डलीं प्रबोधयितुं प्रकर्षेण बोधयितुं मुद्राणां ... समावृत्ति
समाचरेत् ।। (ज्योत्स्नाः ३।४-५) ।
सुषुम्णा और प्राणापत ऐक्य—(२) 'अपानवायुम् ऊर्ध्वं प्रोत्सारयन् मूलबन्धं-
कृत्वा सुषुम्नामार्गेण प्राणमूर्ध्वं नयन् पूरितं पूरकेण अन्तर्धारितं प्राणं न्यञ्चन्नीचैरधोऽञ्चन्
गमयन् । प्राणापानयोरैक्यं कृत्वा । नरः पुमानमतुलं बोधं निरुपमज्ञानं शक्तिप्रभावा-
च्छक्तिराधारशक्तिः कुण्डलिनी तस्याः प्रभावात्सामर्थ्यादुपैति प्राप्नोति ।
(३) 'प्राणापानयोरैक्ये कुण्डलिनीबोधो भवति ।'
सुषुम्णा एवं चित्तस्थैर्य मुक्ति—(४) 'कुण्डलिनी बोधे सुषुम्नामार्गेण प्राणो ब्रह्म-
रंध्रं गच्छति । तत्र गते चित्तस्थैर्यं भवति । चित्तस्थैर्ये संयमादात्मसाक्षात्कारो भवति ।।'
(हठयोगप्रदीपिका 'ज्योत्स्ना' १।४८) ।
पद्मासन लगाकर सुषुम्णा मार्ग से प्राण को मस्तक में ले जाने वाला योगी मुक्त
है— 'पद्मासने स्थितो योगी नाडीद्वारेण पूरितम् ।
मारुतं धारयेद्यस्तु स मुक्तो नात्र संशयः ।।' (१।४९)
(५) मारुते प्राणवायौ मध्ये सुषुम्नामध्ये संचारः सम्यक् चरणं गमनं मूर्धपर्यन्तं
यस्य स मध्य संचारस्तस्मिन् सति मनसः स्थैर्यं ध्येयाकारवृत्तिप्रवाहो जायते प्रादुर्भवति ।
यो मनसः सुस्थिरीभावः सुष्ठु स्थिरीभवनं सैव मनोन्मन्यवस्था ।।' (ज्योत्स्नाः २।४२)
सुषुम्णा एवं उन्मनी—'महावेध' के अभ्यास से भी इड़ा-पिंगला के मार्गों को
छोड़कर वायु मध्यममार्ग (सुषुम्णामार्ग) में प्रवेश कर जाती है—
पुटद्वयमतिक्रम्य वायुः स्फुरति मध्यगः ।। (३।२७)
ऐसा करने से तीनों नाड़ियों (इड़ा-पिंगला-सुषुम्णा) का वायु अभिन्न हो जाता है
और मोक्ष का कारण बनता है—'सोमसूर्याग्नि संबन्धो जायते चामृताय वै ।।' (३।२८)
ऐसी अवस्था में इड़ा—पिंगला में प्राणसंचार का अभाव होने से 'मृतावस्था' उत्पन्न हो
जाती है—'मृतावस्था समुत्पन्ना' (३।२८) ।
'मध्यमा नाड़ी' को सरल करने के उपाय निम्न है—(१) आसन (२) प्राणायाम
(३) मुद्रा—'इयं मध्यमा नाड़ी सुषुम्ना योगिना दृढ़ाभ्यासेनासनं स्वस्तिकादि प्राणसंयमः
प्राणायामः मुद्रा महामुद्रादिका तैः सरला भवेत् ।'
२५६ स्पन्दकारिका
'इयं तु मध्यमा नाडी दृढाभ्यासेन योगिनाम् ।
आसनप्राणसंयाममुद्राभिः सरला भवेत् ॥ (३।१२४ ह०प्र०)
ध्यातव्य बिन्दु—स्पन्द एवं प्रत्यभिज्ञाशास्त्र में योग की साधना का आत्मीकरण
इसलिए किया गया क्योंकि इन योगियों ने अनुभव किया न तो मात्र 'ज्ञान' से और न तो
मात्र 'योग' से । 'परमार्थ' 'परमपद' 'उन्मनी' 'सहजावस्था' 'प्रत्यभिज्ञा' 'शाक्तभूमिका'
प्राप्त की जा सकती है अतः उन्होंने दोनों का आत्मीकरण किया । कारण सुस्पष्ट है—
'विना युद्धेन वीर्येण कथं जयमवाप्नुयात् ।
तथा योगेन रहितं ज्ञानं मोक्षाय नो भवेत् ॥ ('योगबीज')
स्पन्द एवं प्रत्यभिज्ञा का योग हठयोग नहीं राजयोग है । राजयोग का
स्वरूप निम्नाङ्कित है—वृत्त्यन्तरनिरोधपूर्वकात्मगोचरधारावाहिकनिर्विकल्पवृत्ति राजयोगः ।
(ज्योत्स्ना ३.१२६) ।
सहजविद्योदय निष्यन्द
'सा विद्या या विमुक्तये, ज्ञानान्न ऋते मुक्तिः' के अनुसार 'विद्या' एवं 'ज्ञान' दोनों
मोक्ष के साधन हैं । योगियों ने ज्ञान का स्वरूप पृथक् रीति से परिभाषित किया है ।
यदि विद्या को 'ज्ञान' का पर्याय मान लिया जाय तो 'ज्ञान' का निम्न अर्थ विद्या का
पर्याय माना जाना चाहिए । ज्ञान क्या है?
ज्ञानं कुतो मनसि संभवतीह तावत्, प्राणोऽपि जीवति मनो म्रियते न यावत् ।
प्राणो मनो द्वयमिदं विलयं नयेद्या, मोक्षं स गच्छति नरः न कथंचिदन्यः ॥
—हठयोग प्र०
आचार्य भट्टकल्लट ने अपनी 'स्पन्दकारिकावृत्ति' ('स्पन्दसर्वस्व') के द्वितीय
निष्यन्द का नामकरण—'सहजविद्योदय' किया है ।
स्वरूपस्पन्द निष्यन्द में तो रचनाकार ने यह प्रमाणित किया कि—
(१) विश्व के कण-कण में चैतन्यस्वरूपा स्पन्दशक्ति अनुस्यूत है ।
(२) साधक विकल्पों को संस्कृत करके स्वसंवेदन को विशुद्ध बनाकर अपने
हृत्पद्म में शाक्त भूमिका की अनुभूति एवं विश्वात्मभाव को अधिगत करके पशुभाव से
मुक्त होकर विश्वात्मैक्य की अनुभूति करते हैं ।
सहजविद्योदय निष्यन्द में रचनाकार यह प्रतिपादित करता है कि विकल्पसंस्कार
की पद्धति का अनवरत अभ्यास प्रबुद्ध योगियों को शुद्धविकल्पात्मक, अहंविमर्शात्मक,
निर्मलशुद्धविद्यास्वरूप 'सहजविद्या' की अनुभूति प्रदान करता है । 'सहजविद्या'
अहंविमर्श स्वरूप का साक्षात्कार कराती है और यह शुद्ध विकल्पात्मिका है । इसके द्वारा
स्वस्वरूप का साक्षात्कार भी होता है । योगी को मन्त्रवीर्य की अनुभूति होती है तथा वह
प्रबुद्धावस्था से सुप्रबुद्धावस्था में प्रवेश करता है ।
'सहज' शब्द दो शब्दों से निर्मित हुआ है—'सह' + 'ज' = जन्म के साथ-साथ
प्रथमः निष्यन्दः २५७
उदित । 'सहज' स्वाविर्भूत, सरल, अकृत्रिम, स्वयंभू, स्वाभाविक, आदि अर्थों का
द्योतक है । 'हठयोगप्रदीपिका' की टीका 'ज्योत्स्ना' में सहज शब्द का अर्थ—'स्वाभा-
विक ध्येयाकार वृत्तिप्रवाह' किया गया है और इस 'सहजतत्त्व' के बिना ज्ञान को
'दंभमिथ्याप्रलाप' भी कहा गया है । 'हठयोगप्रदीपिका' में कहा गया है 'ज्ञान' योगसाधना
सापेक्ष है क्योंकि—
(१) 'यावन्नैव प्रविशति चरन् मारुतो मध्यमार्गे
यावद्विन्दुर्न भवति दृढः प्राणवातप्रबन्धात् ।
यावद्ध्याने सहज सदृशं जायते नैव तत्त्वं
तावज्ज्ञानं वदति तदिदं दंभमिथ्याप्रलापः ॥' (ह०प्र०)
(२) योगियों की 'सहजावस्था'—
उत्पन्नशक्तिबोधस्य त्यक्तनिःशेषकर्मणः ।
योगिनः सहजावस्था स्वयमेव प्रजायते ॥ (ह०प्र०)
(३) 'ज्योत्स्ना' में 'सहजावस्था' का स्वस्वरूप—
'जातः कुण्डलीबोधो यस्य तस्य परिहृतानि समग्राणि कर्माणि येन तस्य योगिनः
आसनेन कायिकव्यापारे त्यक्ते प्राणेन्द्रियेषु व्यापारस्तिष्ठति । प्रत्याहार-धारणा-ध्यान-
संप्रज्ञात समाधिभिर्मानसिक व्यापारे व्यक्ते बुद्धौ व्यापारस्तिष्ठति । असंगो ह्ययं पुरुषः
शुद्धः पुरुषः सत्वगुणात्मिका परिणामिनी बुद्धिरिति परवैराग्येण दीर्घकालसंप्रज्ञाताभ्यासेनैव
बुद्धिव्यापारे परित्यक्ते निर्विकारस्वरूपावस्थितिर्भवति । सैव सहजावस्था'
दुर्लभो विषयत्यागो दुर्लभं तत्त्वदर्शनम् ।
दुर्लभा सहजावस्था सद्गुरोः करुणां विना ॥ (ह०योग०)
('तत्त्वदर्शनमात्माऽपरोक्षानुभवः दुर्लभं, सहजावस्था
विकल्प-संस्कार-आचार्य अभिनवगुप्त 'तन्त्रालोक') (आ०४) में कहते हैं कि—
(१) परमेश्वर के 'स्व' भाव में प्रवेशेच्छा विकल्पों के संस्कार से ही निष्पादित
होती है ।
(२) साधक को सर्वप्रथम विकल्पों का संस्कार करके सद्विकल्प-गणपति बनना
चाहिए । एतदर्थ उसे सर्वप्रथम-शास्त्र-स्वाध्याय, चिन्तन एवं मनन करना चाहिए । →
पुष्टि, तुष्टि की प्राप्ति, स्वात्म कुसुम का प्रस्फुटन 'प्रविविक्षुर्विकल्पस्य कुर्यात्संस्कार-
मञ्जसा ॥' (तन्त्रालोक ४।२)
(३) संस्कृत विकल्प → संस्कृत विकल्प → संस्कृत विकल्प → संस्कृत विकल्प
विकल्पः संस्कृतः सूते विकल्पं स्यात्मसंस्कृतम् ।
स्वतुल्यं सोऽपि सोऽप्यन्यं सोप्यन्नं सदृशात्मकम् ॥ (४।३)
(४) संस्कार-शुद्ध विकल्प → स्वात्म संस्कृत शुद्धविकल्प ।
अस्फुट संस्कृत विकल्प → स्फुट संस्कृत विकल्प—
'भ्रश्यदस्फुटत्व' 'भाव्यमान स्फुटीभाव' → निर्विकल्प भाव ।
स्पं० १७
२५८ स्पन्दकारिका
विकल्प-संस्कार की चार अवस्थायें—(तन्त्रालोक)
अस्फुट विकल्प | भविष्यत् स्फुटत्व (भविष्य में स्फुटता की प्रक्रिया होती है ।) | प्रस्फुटता का प्रवर्तन | पूर्णाप्रस्फुटन (कली, मुकुल, विकसदवस्थ सुमन कुसुम की भाँति)
विकल्प शीघ्र विकसित नहीं होते । अतः अन्तराल में अनेक अवस्थायें आती हैं—
(१) अस्फुट—स्फुटताभावी के मध्य-‘भ्रश्यदस्फुटत्व’ अवस्था
(२) ईषत्प्रस्फुटत्व के बाद अंकुरित प्रस्फुटत्व अवस्था
(३) आसूत्रित स्फुटत्व, उद्गच्छत्स्फुटत्व आदि अनेक अवस्था
विकल्पों की संस्कार-प्रक्रिया का क्रमिक विकास—स्फुटतम वैकल्पिक तद्रूपतामयी
एक संवित् शक्ति का उल्लास $\rightarrow$ ‘स्व’ रूप की प्राप्ति $\rightarrow$ सङ्कोच का कलङ्क नष्ट ।
(४) पारमार्थिक विकल्प भी हेय हैं—
परमार्थविकल्पेऽपि नावलीयेत पण्डितः ।
को हि भेदो विकल्पस्य शुभे वाप्यथ वाशुभे ॥
विकल्प चाहे शुभ हों या अशुभ—विकल्प तो विकल्प ही हैं $\rightarrow$ निर्विकल्पात्मक भाव ही श्रेयस्कर है—
(५) विकल्प संविद के संस्कार से और अविकल्प संविद रूप में क्रमशः स्फुरित होने से स्वात्म में ही ज्ञान, क्रियात्मक संविद्रूप भैरवीय तेज का विमर्श होने लगता है ।
इस विमर्श में ‘मैं स्वयं भैरव शिव हूँ’ यह महानुभूति उदित होती है । अस्फुटत्व $\rightarrow$ स्फुटतमावस्था = शांभव समावेश की आनन्द भूमि यही है । यही है प्रस्फुटित विमर्श भूमि का आवेश—
अतश्च भैरवीयं यत्तेजः संवित्स्वभावकम् ।
भूयो भूयो विमृशतां जायते तत्स्फुटात्मता ।। (तन्त्रा० ४।७)
विकल्पों का संस्कार करते-करते अपने संवेदन को निर्मल बनाया जाता है और अपने हृदय में शाक्तभूमिका की अनुभूति करके पशुत्व से मुक्त होकर विश्वात्मभाव प्राप्त किया जाता है ।
विकल्प-संस्कार का निरन्तर अभ्यास $\rightarrow$ (प्रबुद्ध योगियों के हृदय में) ‘सहज विद्या’ (विशुद्ध विकल्प या अहंविमर्शात्मक स्वरूप की अनुभूति) $\rightarrow$ शुद्ध विद्या का प्रकाश स्वरूप का साक्षात्कार एवं मन्त्र वीर्य की अनुभूति—प्रबुद्ध से सुप्रबुद्धावस्था में प्रवेश ।।
बौद्ध दर्शन में सहज तत्त्व का स्वरूप—(१) वज्रयानी सिद्धों एवं मत्स्येन्द्र के
प्रथमः निष्यन्दः २५९
योगिनी कौल मार्ग में 'सहज' = पुरुष तत्त्व + शक्ति तत्त्व का समागम प्रज्ञा + उपाय,
(यो० कौ० में—शिव + शक्ति) का समागम !! (२) 'कौलज्ञाननिर्णय' में— 'सहज' =
'कुरुते देहमध्ये तु सा शक्तिः सहजा प्रिये ।।' (सहज शक्ति को शरीरस्थ करके वहीं
उपलब्ध करना चाहिए ।) 'सहज' = सहज ज्ञान सहज स्वभाव आदि ।
नाथपंथ में 'सहज' के प्रयोगों की दिशायें—(१) 'सहज' = परम तत्त्व (२)
'सहज' = परमज्ञान, परम स्वभाव, (३) 'सहज' = परमपद, परमसुख, (४) 'सहज'
= सहज जीवन पद्धति । (५) शरीर के भीतर शक्ति से संगम प्राप्त करने की योग पद्धति ।
विकल्प—घट पट आदि से लेकर शून्य पर्यन्त सभी पदार्थ 'विकल्प' है । अहं
परामर्श के भेद—शुद्ध अहं परामर्श ।। मायीय अहं परामर्श ।।
जब मितात्मा विश्व से अभिन्नतयावस्थित सविन्मात्र में या विश्व से असंस्पृष्ट
स्वच्छ आत्मा में अवस्थित रहता है तब उसे शुद्ध अहं परामर्श कहते हैं । जब की मायीय
(अशुद्धपरामर्श) वेद्यस्वरूप देह, बुद्धि, प्राण, शून्य आदि को अपना आलम्बन बनाता
है—उन्हीं को अपना स्वरूप मान बैठता है तब इसे अशुद्ध परामर्श कहते हैं । इसी भेद
दशा की प्रतीति ही 'विकल्प' है । इसी की शुद्धि से सहजविद्या का उदय होता है ।
कारिकाकार ने जिस सद्विद्या (सहज विद्या) का प्रतिपादन किया है एतत्संबन्ध में
अभिनवगुप्त 'तन्त्रालोक' (३।१०) में कहते हैं कि (१) भावों के प्रतिघाती भाव
मायात्मक होते हैं किन्तु (२) अप्रतिघाती भाव तो सद्विद्यामय होते हैं । मायात्मक भाव
स्थूल एवं भेदप्रधान होते हैं ।
भावानां यत्प्रतीघाति वपुर्मायात्मकं हि तत् ।
तेषामेवास्ति सद्विद्यामयं त्वप्रतिघातकम् ।। (३।१०)१
सद्विद्यामय भाव ज्ञान शक्तिस्वभाव होते हैं—'तत्सद्विद्यामयं ज्ञानशक्तिस्वभावम् ।।
(विवेक पृ० ३२९) ।। मायात्मकपदार्थप्रतिबिम्बरूप एवं ज्ञानात्मकभाव उनके ग्राहक
होते हैं ।२
प्रत्यभिज्ञा एवं स्पन्द शास्त्र के जो छत्तीस तत्त्व हैं उनमें 'ईश्वर तत्त्व' से निम्न
स्तर पर किन्तु मायातत्त्व के स्तर से उच्चतर स्तर पर एवं दोनों के अन्तराल में
'शुद्धविद्यातत्त्व' अवस्थित है—
(१) 'विश्वं पश्चात्यन्निदन्तया निखिलमीश्वरो जातः ।
सा भवति शुद्धविद्या येदन्ताहन्तयोरभेदमतिः ।।' ३
(२) 'ईश्वरो' बहिरुन्मेषो, निमेषोऽन्तः सदाशिवः ।
सामानाधिकरण्यं च, सद्विद्याहमिदं धियोः ।।' (ईश्वरप्रत्यभिज्ञा ३।३)४
(३) 'तस्यैश्वर्यस्वभावस्य पशुभावे प्रकाशिका ।
विद्याशक्तिस्तिरोधानकरी मायाभिधा पुनः ।।' (ईश्वरप्रत्यभिज्ञा ३।७७)५
१. तन्त्रालोक । २. विवेक ।
३. षट्त्रिंशत्तत्वसंदोह । ४-५. ईश्वरप्रत्यभिज्ञा ।
२६० स्पन्दकारिका
(४) 'उन्मेषनिमेषौ बहिरन्तः स्थिती ऐवैश्वर सदाशिवौ बाह्याभ्यन्तरयोर्वेद्यवेदकयो-
रेकचिन्मात्र विश्रान्तेर्भेदात्सामानाधिकरण्येनेदं विश्वमहमिति विश्वात्मनो मतिः
शुद्धविद्या' —प्रत्यभिज्ञाकारिकावृत्ति ।१
इस स्वरूप वाली 'शुद्धविद्या' जो एक तत्त्व है वह इस प्रसंग में ग्राह्य नहीं है ।
शुद्ध विद्या इस प्रसंग की 'सहज विद्या' नहीं है ।
यहाँ 'शुद्धविद्या' पद उस शुद्धविमर्श को द्योतित करता है जिसके उदित होते ही
योगी के अन्तःकरण में सर्वज्ञता, सर्वकर्तृत्व आदि माहेश्वर षडात्मक स्वधर्म प्रकाशित हो
उठते हैं ।
विद्या शब्द का व्युत्पत्यात्मक अर्थ—
'विद्या' पद लाभवाचक 'विद्लृ' धातु एवं विचारमूलक 'विद्' धातु एवं ज्ञानार्थक
'विद्' धातु से व्युत्पन्न हुआ है ।
सहज विद्या—(१) विद्लृ (लाभ)—'विद्या'
(२) विद् (ज्ञान)—'विद्या'
(३) विद् (विचार)—'विद्या'
(१) लाभद्योतक 'विद् लृ' धातु = 'विद्या' । इस अर्थ में 'विद्या' पद 'विमर्श'
की उस उच्चतमावस्था का सूचक है जिसका विकास होने पर योगी माहेश्वर शक्तियों
(सर्वज्ञता, सर्वकर्तृत्व आदि) को या शिव धर्मों को सहज रूप से अधिगत कर लेता है ।
(२) विचार-द्योतक विद् धातु = 'विद्या' = इस अर्थ में 'विद्या' पद विमर्श
की उस उच्चतमावस्था को द्योतित करती है जिसका विकास होने के बाद योगी—'मैं
अनादि हूँ' स्वातन्त्र्य, स्वात्मविमर्श, शिवत्व मेरा स्वभाव है'—का ज्ञान या अनुभव
होने लगता है ।
(३) ज्ञान द्योतक विद् धातु = 'विद्या' । मैं स्वयं शक्तियों का स्वामी शिव हूँ ।
'विश्व' मेरा स्पन्दन है । यही उन्मनन भी है ।
'सहज अभ्यास', 'सहज जप', 'सहज ज्ञान', 'सहजयोग, 'सहज विद्या' आदि का
उदय संभव है । 'हठयोगप्रदीपिका' में कहा गया है कि—'सहजावस्था' योग की एक
उच्चावस्था है । इसके निम्न लक्षण हैं—
(१) इस अवस्था में समस्त कार्य कलाप अकृत्रिम रूप से निष्पादित होते हैं ।
(२) इसमें कुण्डलिनी उद्बुद्ध रहती है ।
(३) इसमें समस्त सायास कार्यों का त्याग कर दिया जाता है ।
(४) यह स्वयमेव उत्पन्न होती है—स्वयंभू स्थिति है—
'उत्पन्नशक्तिबोधस्य त्यक्तनिःशेषकर्मणः ।
योगिनः सहजावस्था स्वयमेव प्रजायते ॥ (उपदेश ४।११)
१. प्रत्यभिज्ञाकारिकावृत्ति ।
प्रथमः निष्यन्दः २६१
(५) 'सहजावस्था' अत्यन्त दुर्लभ है—
दुर्लभो विषयत्यागो दुर्लभं तत्त्वदर्शनम्।
दुर्लभा सहजावस्था सद्गुरोः करुणां विना॥ (हठ० प्र० ४।९)
'सहजविद्या' सहज ज्ञान (यौगिक ज्ञान) को आत्मीकृत (क्रोडीकृत) करके चलता
है और यौगिक विद्या या यौगिक ज्ञान योग की दृष्टि में इस प्रकार है—
ज्ञानं कुतो मनसि संभवतीह तावत्,
प्राणोऽपि जीवति मनो म्रियते न यावत्।
प्राणो मनो द्वयमिदं विलयं नयेद्यो,
मोक्षं स गच्छति नरो न कथंचिदन्यः॥ (४।१५)
जब तक 'सहज सदृश तत्त्व' का ध्यान में उदय नहीं होता तब तक 'ज्ञान' दंभ
एवं मिथ्या प्रलाप मात्र है—
यावद्ध्याने सहजसदृशं जायते नैव तत्त्वम्।
तावज्ज्ञानं वदति तददिं दंभ मिथ्याप्रलापः॥ (ह० प्र० ४।११४)
योगियों ने 'राजयोग', 'समाधि', 'उन्मनी', 'मनोन्मनी', 'तत्त्व', 'अमरत्व',
'लय', 'शून्याशून्य', 'परं पद', 'अद्वैत', 'निरालम्ब', 'निरञ्जन', 'अमनस्क', 'तुर्या',
'जीवन्मुक्ति' एवं 'सहजा' सभी को समानार्थक माना है—
राजयोगः समाधिश्च उन्मनी च मनोन्मनी।
अमरत्वं लयस्तत्त्वं शून्याशून्यं परं पदम्।
अमनस्कं तथाद्वैतं निरालम्बं निरञ्जनम्।
जीवन्मुक्तिश्च सहजा तुर्या चेत्येकवाचकाः॥
—स्वात्माराम मुनीन्द्र (हठयोगप्रदीपिका ४।३-४)
[५] द्वितीयो निष्यन्दः
सहजविद्योदयनिष्यन्दः
स्पन्दस्वरूप आत्मबल-प्राप्त मन्त्रों की शक्तियों में वृद्धि—
तदाक्रम्य बलं मन्त्राः सर्वज्ञबलशालिनः ।
प्रवर्तन्तेऽधिकाराय करणानीव देहिनः ॥ २६ ॥
उस स्पन्दस्वरूप आत्मबल के साथ तद्रूपता प्राप्त करने से समस्त मन्त्र सर्वज्ञता
आदि (षड्विध) शांभव बलों को प्राप्त कर लेते हैं और (वे मन्त्र) मांत्रिक साधक के
अभीष्टों को उसी प्रकार सिद्ध कर देते हैं यथा शरीरधारी प्राणियों की इन्द्रियाँ (अपने
अभीष्टों को सिद्ध कर देती हैं) ॥ २६ ॥
- सरोजिनी *
तत् + बलं = उस स्पन्दरूपात्मक आत्मबल ॥
'सर्वज्ञबलशालिनः मन्त्राः तद् बलं आक्रम्य देहिनाम् करणानीव अधिकाराय
प्रवर्तन्ते ॥'
तत् = वह । स्पन्द तत्त्वात्मक बल, प्राणरूप वीर्य । स्पन्दरूप 'आत्मबल'
आक्रम्य = ('अभेदेन आश्रयतया अवष्टभ्य') ॥ (On catching hold of that
strength) बलं = प्राणरूप वीर्य ॥ (Life vitality) निरावरण चिद्रूप (कल्लट) तद्
बलं = वह शक्ति (That strength) आक्रम्य = अधिष्ठाय = (कल्लट) 'स्पन्द-
तत्त्वात्मक' : स्पन्द तत्त्व से युक्त ॥१ तत् = उस (बल को) 'तदाक्रम्य' = तत् +
आक्रम्य ॥ (कल्लट)
सर्वज्ञता = सर्वज्ञता (सर्वकर्तृत्व, सर्वव्यापकत्व, सर्वज्ञातृत्व, पूर्णतृप्तित्व आदि)
सब कुछ जानने की क्षमता ॥
सर्वज्ञता, सर्वकर्तृत्व, सर्वव्यापकत्व, सर्वशक्तिमत्ता आदि गुणों से समृद्ध 'मन्त्र'
स्पन्दात्मक शक्ति या प्राण रूप वीर्य को, (सम्यक् अभेदापत्ति के साथ) प्राप्त करके
प्राणियों को अधिकार सम्पन्न बनाने हेतु उसी प्रकार प्रवर्तित होते हैं जिस प्रकार इन्द्रियाँ
प्राणियों को ऐन्द्रिय विषय प्राप्त कराने हेतु प्रवर्तित होती हैं ।२
१. क्षेमराज : स्पन्दनिर्णय । २. स्पन्दनिर्णय ।
द्वितीयः निष्यन्दः २६३
मान्त्रीशक्ति के प्रकटीकरण की विधि एवं जाग्रत मन्त्रों की अचिन्त्य शक्ति
आचार्य क्षेमराज ने 'स्पन्दनिर्णय' में इस श्लोक को द्वितीय अध्याय के प्रथम श्लोक के
रूप में प्रस्तुत किया है और सात श्लोकों में समाप्त कर दिया है । यह 'सहजविद्योदय
निष्यन्द' का प्रथम श्लोक है ।१
प्रस्तुत श्लोक में 'मन्त्र शक्ति' का निरूपण किया गया है और उसके प्रथमोदय पर
प्रकाश डाला गया है । 'मन्त्र' उस बल को प्राप्त करके सर्वज्ञत्व की शक्ति से आवेष्टित
हो उठते हैं (Get endued with the power of omniscience) और अपने कार्यों
का संपादन उसी प्रकार करते हैं जिस प्रकार सशरीरी व्यक्ति की इन्द्रियाँ किया करती हैं ।
ये 'मन्त्र' अपने आराधकों के चित्त के साथ लयीभूत हो जाते हैं (Get absorbed) वे
शान्तरूप एवं अशुद्धियों से रहित होकर आराधकों के चित्त में लीन हो जाते हैं अतः ये
मन्त्र शिव की यथार्थ शक्ति प्राप्त किये हुए होते हैं ।२
'अनन्त', 'व्योमव्यापी' आदि मन्त्र सर्वज्ञत्वादि सामर्थ्य आदि के द्वारा प्राणियों के
अधिकार के लिए प्रवर्तित होते हैं । जिस प्रकार प्राणियों की इन्द्रियाँ अपने बल के द्वारा
ऐन्द्रिय विषयों के प्रकाशन का कार्य करती हैं ठीक उसी प्रकार 'मन्त्र' भी साधकों के
लिए कार्य संपादित करते हैं और ये सृष्टि-संहार-तिरोधान-एवं अनुग्रह आदि कार्य
निष्पादित करते हैं ।
उस शक्ति (स्पन्दात्मक शक्ति) को प्राप्त करके ये पवित्र मन्त्र (यथा अनन्त,
व्योमव्यापी आदि मन्त्र) सर्वज्ञता आदि की शक्ति प्राप्त कर लेते हैं तथा सृष्टि-स्थिति-
संहार-तिरोधान एवं अनुग्रह आदि देव कार्यों को निष्पादित करते हैं । ('तत् स्पन्द-
तत्त्वात्मकं बलं प्राणरूपं वीर्यमाक्रम्य अभेदेन आश्रयतया अवष्टभ्य भगवन्तोऽनन्तव्योम-
व्याप्यादयो मन्त्राः सर्वज्ञबलेन जृंभमाणा देहिनां प्रवर्तन्ते—सृष्टिसंहारतिरोधानअनुग्रहादि
कुर्वन्ति ।।')३
मन्त्र-विज्ञान और उसका विधान—
मन्त्र में चार बातें मुख्य होती हैं—(१) 'बीज' (२) 'पिण्ड' (३) 'पद' (४)
'नाम' । उनका धर्म है—(१) मनन एवं (२) त्राण । उनका बल है—निरावरण चित्
का उल्लास (पराशक्ति) उसी शक्ति को लेकर 'मन्त्र' सहज नादशक्ति से उद्बोधित होकर
प्रदीप्त होते हैं उनमें सर्वज्ञता आदि का बल आ जाता है । जब सिद्धमन्त्री उनका प्रयोग
करता है तब वे—(१) 'अनुग्रह' और (२) 'निग्रह' करने में समर्थ होते हैं ।
जिस प्रकार एक शरीरधारी अपने कर-चरणों का प्रयोग करता है ठीक उसी प्रकार
एक सिद्धमन्त्री मन्त्रों का प्रयोग करता है । आत्मा के परत्व का अवबोध होने के कारण
मन्त्रज्ञ इच्छा मात्र से मन्त्रों का यथेष्ट प्रयोग कर सकता है ।
'त्रिकसार' नामक ग्रन्थ में कहा गया है कि—वर्णातीत निराकार परम तत्त्व का
बोध हो जाने पर 'मन्त्र' मन्त्राधिपों के साथ किंकर हो जाते हैं अर्थात् वशीभूत हो जाते हैं ।
१-३. स्पन्दनिर्णय ।
२६४ स्पन्दकारिका
‘विदिते तु परे तत्त्वे वर्णातीते ह्यविग्रहे ।
किंकरत्वं तु गच्छन्ति मन्त्रा मन्त्राधिपैः सह ॥’
यदि ऐसा नहीं है तो बड़े प्रयत्न से प्रयोग करने पर भी कठपुतली के समान
निष्फल चेष्ट ही रहते हैं क्योंकि सत्यसंकल्पचिच्छक्ति के बल का स्पर्श न होने के कारण
वे केवल वर्ण-मात्रा अर्थात् मात्र जड़ अक्षर ही बने रहते हैं—‘त्रिकसार' में यही कहा
गया है—
हंसपारमेश्वर नामक ग्रन्थ में कहा गया है कि—केवल वर्णरूप 'मन्त्र' पशुभाव
में स्थित है। सुषुम्नामार्ग से उच्चारण करने पर वे 'पशुपति' हो जाते हैं। वस्तुतः शाक्त
मार्ग में ही मन्त्रों की सफलता है।
‘पशुभावे स्थिता मन्त्राः केवला वर्णरूपिणः ।
सौषुम्णेऽध्वन्युच्चरिताः पतित्वं प्राप्नुवन्ति ते ॥’
वस्तुतः शाक्त मार्ग में ही मन्त्र साकल्य प्रदान करते हैं—‘ऐष शाक्तो मार्गोऽत्र च
मन्त्राणां साकल्यम्' ।
तत्त्वरक्षा-विधान में कहा गया है—आत्म संवित् अथवा परम पद में मन्त्र का
प्रयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि वह शक्ति और क्रिया से रहित है शक्ति के विषय में
ही मन्त्र का प्रयोग करना चाहिए। वही जप सफल होता है अन्य नहीं—
‘अशक्तत्वान्निष्क्रियत्वान्न पुंसि न परे पदे ।
शक्तौ नियोजयेन्मन्त्रं जपस्तु सफलो भवेत् ॥’
श्रीवैहायसी नामक ग्रन्थ में भी कहा गया है—
संधिस्थल में नादोर्ध्वध्वनि से बोधित 'जप' करना चाहिए यथा सूत्र में मणि
ग्रथित होते हैं। ठीक इसी प्रकार शक्ति के ताने-बाने से निर्मित मन्त्राक्षरों का ध्यान करना
चाहिए। वह शक्ति परम व्योम में रहती है और परमामृत से समृद्ध है। उक्त रीति से
'जप' करने पर 'मन्त्र' अपने स्वरूप को प्रकट कर देता है अपने को आच्छादित नहीं
रखता—
‘विषुवत्कं जपं कुर्यान्नादोर्ध्वध्वनिबोधितम् ।
मन्त्राक्षराणि मणिवच्छक्तौ प्रोतानि भावयेत् ॥
तामेव च परे व्योम्नि परमामृतबृंहिताम् ॥’
श्रीकालपरा नामक ग्रन्थ में भी कहा गया है—शब्द नादात्मक हैं अतः उसके
साथ प्रत्यय, संवित् संलग्न रहकर बढ़ाती रहती है। मन्त्र बोध के स्वरूप में स्थित
संवित् अभिन्न है अतः वह आत्मबोध भी करा देती है—
‘शब्दो नादात्मकस्तस्मात् प्रत्येनोपबृंहितः ।
मन्त्रबोधस्वरूपस्थमभिन्नो बोधयत्यपि ॥’
संकर्षणसूत्र में भी इसी भाव को इस प्रकार व्यक्त किया गया है—चिद्रूपता
स्वात्मैकनिष्ठ है। भाव और अभाव उसकी दशायें हैं—परिष्कार हैं। वह स्वसंवेदन