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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

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DevanagariHindipublished519 pages

Page 347 of 519

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Page 347

२४६ स्पन्दकारिका
संभव है। क्योंकि इन विशिष्ट क्षणों में विशेष स्पन्दों का क्षोभ पूर्णतः शान्त हो जाता है।
जब किसी व्यक्ति के मन में क्रोध, हर्ष, भय या अन्य कोई विशिष्ट मनःस्थिति
उत्पन्न होती है तब वह मन की अन्य वृत्तियों को तिरोहित करती है। वर्तमान मनोभाव
जितनी ही तीव्रता के साथ उभरते हैं उतनी ही तीव्रता से पुराने मनोभावों को तिरोहित कर
देते हैं। किसी (भय, क्रोध, काम, लोभ, आदि) मनोभाव पर तत्काल उत्पन्न तीव्रतम मनो-
भाव जितनी तीव्रता से आक्रमण करता है उतनी ही तीव्रता से पूर्ववर्ती मनोभाव तत्काल
नष्ट होता है और नया तत्काल (पूर्वमनोभाव विस्मृत करके) उत्पन्न होता है। जितनी
तीव्रता से उभर आने वाला भाव उभर आता है उतनी ही तीव्रगति से उकसा पूर्ववर्ती
मनोभाव डूब जाता है। इन दोनों भावों के अप्रत्याशित अन्त एवं आरंभ के मध्य में जो
(मध्य में) एक बहिर्मुखी विशेष वृत्ति उदित है—यह अकस्मात् उत्पन्न होने वाली क्षणिक
मनोवृत्ति निर्विकल्प, स्तब्ध एवं भयानक मनोवेग के रूप में उदित होती है।
'विज्ञानभैरव' (११९) में कहा गया है—
क्षुधाद्यन्ते भये शोके गह्वरे वारणद्रुते ।
कुतूहले क्षुधाद्यन्ते ब्रह्मसत्तामयी दशा ॥
यह क्षण एक निर्विकल्प क्षण है और इसमें विद्युत की तीव्रतम कौंध की भाँति
एक मनोभाव उदित होकर नष्ट हो जाता है यथा सिंह को देखकर उत्पन्न भय ॥
इस क्षण के उदित होने पर सुख, दुःख, मूढ़ता आदि अन्तःकरणावृत्तियाँ नष्ट हो
जाती हैं और इस नवोत्पन्न विशिष्ट क्षण में मात्र सामान्य स्पन्द तत्त्व अस्तित्व में रहता
है। मनोभावों को उन्मज्जन एवं निमज्जन की यह क्रिया अविराम गति से चलती रहती
है किन्तु जब यह उदित होती है तो उसका व्यक्ति को मान भी नहीं रह जाता। क्योंकि
अत्यन्त सूक्ष्म होने के कारण बुद्धि इसे पकड़ नहीं पाती।
यही क्षण शक्तिपात के समय भी उदित होता है। गुरु अपनी शक्तिपात-सामर्थ्य
द्वारा इन मध्यवर्ती संधिक्षणों एवं तन्निहित स्पन्द तत्त्व की अनुभूति अपने शिष्यों को
करवा देते हैं। शक्तिपात की दृढ़ता से बहिर्मुखी स्पन्द प्रवाह को योगी कूर्मांगसंकोचवत्
अपने भीतर समेटकर (अन्तर्मुखी होकर) इस विशिष्ट एवं एकाग्रतानिष्ठ क्षण पर स्थिर
रहने की क्षमता प्राप्त कर लेता है।
प्रस्तुत कारिका में—क्रोध, हर्ष एवं मूढ़ता से—सुख, दुःख एवं मोह युक्त
अन्तःकरण की वृत्तियों को ग्रहण करके ज्ञानेन्द्रियों की जागृतावस्था एवं दौड़ने की क्रिया
द्वारा समस्त बाह्यवर्ती कर्मेन्द्रियवृत्तियों का ग्रहण किया गया है और यह संकेतित किया
गया है कि—जागृतावस्था में भी स्पन्द तत्त्व समान रूप से उपलब्ध होता है।
जागृति की अवस्था में भी स्पन्द तत्त्व का साक्षात्कार—
प्रबुद्ध साधकों को गुरु अपने विशेषानुग्रह के द्वारा जाग्रत अवस्था में भी स्पन्द
शक्ति की अनुभूति करा देते हैं। बार-बार अभ्यास करने पर वे उसे स्थिरता (एकाग्रता में
स्थिरता) प्राप्त कर लेते हैं।