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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

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DevanagariHindipublished519 pages

Page 359 of 519

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Page 359

२५८ स्पन्दकारिका
विकल्प-संस्कार की चार अवस्थायें—(तन्त्रालोक)
अस्फुट विकल्प | भविष्यत् स्फुटत्व (भविष्य में स्फुटता की प्रक्रिया होती है ।) | प्रस्फुटता का प्रवर्तन | पूर्णाप्रस्फुटन (कली, मुकुल, विकसदवस्थ सुमन कुसुम की भाँति)
विकल्प शीघ्र विकसित नहीं होते । अतः अन्तराल में अनेक अवस्थायें आती हैं—
(१) अस्फुट—स्फुटताभावी के मध्य-‘भ्रश्यदस्फुटत्व’ अवस्था
(२) ईषत्प्रस्फुटत्व के बाद अंकुरित प्रस्फुटत्व अवस्था
(३) आसूत्रित स्फुटत्व, उद्गच्छत्स्फुटत्व आदि अनेक अवस्था
विकल्पों की संस्कार-प्रक्रिया का क्रमिक विकास—स्फुटतम वैकल्पिक तद्रूपतामयी
एक संवित् शक्ति का उल्लास $\rightarrow$ ‘स्व’ रूप की प्राप्ति $\rightarrow$ सङ्कोच का कलङ्क नष्ट ।
(४) पारमार्थिक विकल्प भी हेय हैं—
परमार्थविकल्पेऽपि नावलीयेत पण्डितः ।
को हि भेदो विकल्पस्य शुभे वाप्यथ वाशुभे ॥
विकल्प चाहे शुभ हों या अशुभ—विकल्प तो विकल्प ही हैं $\rightarrow$ निर्विकल्पात्मक भाव ही श्रेयस्कर है—
(५) विकल्प संविद के संस्कार से और अविकल्प संविद रूप में क्रमशः स्फुरित होने से स्वात्म में ही ज्ञान, क्रियात्मक संविद्रूप भैरवीय तेज का विमर्श होने लगता है ।
इस विमर्श में ‘मैं स्वयं भैरव शिव हूँ’ यह महानुभूति उदित होती है । अस्फुटत्व $\rightarrow$ स्फुटतमावस्था = शांभव समावेश की आनन्द भूमि यही है । यही है प्रस्फुटित विमर्श भूमि का आवेश—
अतश्च भैरवीयं यत्तेजः संवित्स्वभावकम् ।
भूयो भूयो विमृशतां जायते तत्स्फुटात्मता ।। (तन्त्रा० ४।७)
विकल्पों का संस्कार करते-करते अपने संवेदन को निर्मल बनाया जाता है और अपने हृदय में शाक्तभूमिका की अनुभूति करके पशुत्व से मुक्त होकर विश्वात्मभाव प्राप्त किया जाता है ।
विकल्प-संस्कार का निरन्तर अभ्यास $\rightarrow$ (प्रबुद्ध योगियों के हृदय में) ‘सहज विद्या’ (विशुद्ध विकल्प या अहंविमर्शात्मक स्वरूप की अनुभूति) $\rightarrow$ शुद्ध विद्या का प्रकाश स्वरूप का साक्षात्कार एवं मन्त्र वीर्य की अनुभूति—प्रबुद्ध से सुप्रबुद्धावस्था में प्रवेश ।।
बौद्ध दर्शन में सहज तत्त्व का स्वरूप—(१) वज्रयानी सिद्धों एवं मत्स्येन्द्र के