स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज
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Read in contextप्रथमः निष्यन्दः २४९
अपनी आत्मसंवित् में सूर्य-सोम अर्थात् ज्ञान-क्रिया को लीन कर लिया है, व्योममार्ग का
अतिक्रमण कर चुके हैं और अपनी दृष्टि में भावना का अञ्जन लगाए हुए हैं उनमें भी
किसी-किसी को तुम्हारे स्वरूप का दर्शन होता है—
‘स्वात्मनि स्तिमितसोमभास्करं व्योममार्गमभिवर्त्यतस्थुषः ।
भावनाञ्जितदृशोऽपि खेचराः केचिदेव तव धामदर्शिनः ॥’
निरञ्जन तत्त्व के उदय में प्राण एवं अपान की प्रशान्ति को ही आत्मदर्शन की
युक्ति बतलाया गया है ।१
‘भोगमोक्षप्रदीपिका’ में कहा गया है—हृदय में सोम-सूर्य के संचार से काम
सिद्धि होती है और उनकी शान्ति से निरञ्जन तत्त्व की । यही शास्त्र का सर्वस्व है । इसी
अवस्था में सहज मन्त्र का उदय होता है—
‘कामाख्ये विषतत्तवे निरञ्जनाह्ने क्रमाच्च सिद्धिः स्यात् ।
सूर्ये सोमे हृदयात्तयोः शमाच्चेति शास्त्रसर्वस्वम् ॥’
‘बौद्धायनसंहिता’ में कहा गया है कि—चन्द्रमा शान्त हो जाय और सूर्य का
उदय न हो, उस समय समस्त देवताओं (इन्द्रियों) का विलय और सभी मन्त्रों का उदय
होता है— शान्ते चंद्रे त्वमात्राख्ये यावन्नोच्चरते रविः ।
उदयः सर्वमन्त्राणां विलयश्च दिवौकसाम् ॥
‘मालिनीविजय’ में कहा गया है—जिस अवस्था में जीव अन्याधार—विनिर्मुक्त
होकर स्वरूप में लीन हो जाता है, वही सम्पूर्ण मन्त्रों की उत्पत्ति का क्षेत्र (स्थान)
होता है ।’२
इसके अतिरिक्त भी कहा गया है कि—जब पुरुष का चित्त धर्म एवं अधर्म के
संधिस्यल में निरुद्ध हो जाता है तब वह जो बोलता है वही मन्त्र हो जाता है । स्वर-
वर्ण-मातृका से निर्मित मन्त्र ही मन्त्र नहीं होते—
यत्राधारविनिर्मुक्तो जीवो लयमवाप्स्यति ।
तत् स्थानं सर्वमन्त्राणामुत्पत्तिक्षेत्रमिष्यते ॥
धर्माधर्मान्तरे चित्तं निरुद्धं यत्तदा तु सः ।
यद्वक्ति स भवेन्मन्त्रः किं पुनर्मातृकोत्थितः ॥
तां = उस । (अर्थात् ‘यामवस्थां’ द्वारा उपलक्षित एवं वाक्य-निर्दिष्ट अवस्था में)
उस दशा को । सुषुम्णा = कालभोक्त्री = ‘भोक्त्री सुषुम्णा कालस्य’ (हठ०प्र०४।१७)।
आश्रित्य = (प्राप्त करके) आश्रय लेकर ।
चन्द्रसूर्यौ = पुरुष के चन्द्रसूर्य (मन एवं प्राण) दोनों ही—
अस्तमितः = विलीन हो जाते हैं । क्या करके विलीन हो जाते हैं? ‘ब्रह्माण्डं
शरीर स एव स्वप्रसराधिकरणं, तं हित्वा’ (त्यक्त्वा) अर्थात् संवेद्यता के अभाव के कारण
१-२. उत्पलदेव—‘स्पन्दप्रदीपिका’ ।