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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

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DevanagariHindipublished519 pages

Page 363 of 519

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Page 363

[५] द्वितीयो निष्यन्दः
सहजविद्योदयनिष्यन्दः
स्पन्दस्वरूप आत्मबल-प्राप्त मन्त्रों की शक्तियों में वृद्धि—
तदाक्रम्य बलं मन्त्राः सर्वज्ञबलशालिनः ।
प्रवर्तन्तेऽधिकाराय करणानीव देहिनः ॥ २६ ॥
उस स्पन्दस्वरूप आत्मबल के साथ तद्रूपता प्राप्त करने से समस्त मन्त्र सर्वज्ञता
आदि (षड्विध) शांभव बलों को प्राप्त कर लेते हैं और (वे मन्त्र) मांत्रिक साधक के
अभीष्टों को उसी प्रकार सिद्ध कर देते हैं यथा शरीरधारी प्राणियों की इन्द्रियाँ (अपने
अभीष्टों को सिद्ध कर देती हैं) ॥ २६ ॥

  • सरोजिनी *
    तत् + बलं = उस स्पन्दरूपात्मक आत्मबल ॥
    'सर्वज्ञबलशालिनः मन्त्राः तद् बलं आक्रम्य देहिनाम् करणानीव अधिकाराय
    प्रवर्तन्ते ॥'
    तत् = वह । स्पन्द तत्त्वात्मक बल, प्राणरूप वीर्य । स्पन्दरूप 'आत्मबल'
    आक्रम्य = ('अभेदेन आश्रयतया अवष्टभ्य') ॥ (On catching hold of that
    strength) बलं = प्राणरूप वीर्य ॥ (Life vitality) निरावरण चिद्रूप (कल्लट) तद्
    बलं = वह शक्ति (That strength) आक्रम्य = अधिष्ठाय = (कल्लट) 'स्पन्द-
    तत्त्वात्मक' : स्पन्द तत्त्व से युक्त ॥१ तत् = उस (बल को) 'तदाक्रम्य' = तत् +
    आक्रम्य ॥ (कल्लट)
    सर्वज्ञता = सर्वज्ञता (सर्वकर्तृत्व, सर्वव्यापकत्व, सर्वज्ञातृत्व, पूर्णतृप्तित्व आदि)
    सब कुछ जानने की क्षमता ॥
    सर्वज्ञता, सर्वकर्तृत्व, सर्वव्यापकत्व, सर्वशक्तिमत्ता आदि गुणों से समृद्ध 'मन्त्र'
    स्पन्दात्मक शक्ति या प्राण रूप वीर्य को, (सम्यक् अभेदापत्ति के साथ) प्राप्त करके
    प्राणियों को अधिकार सम्पन्न बनाने हेतु उसी प्रकार प्रवर्तित होते हैं जिस प्रकार इन्द्रियाँ
    प्राणियों को ऐन्द्रिय विषय प्राप्त कराने हेतु प्रवर्तित होती हैं ।२
    १. क्षेमराज : स्पन्दनिर्णय । २. स्पन्दनिर्णय ।