स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज
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Read in contextप्रथमः निष्यन्दः २५१
यहाँ 'ब्रह्माण्डगोचर' शब्द द्वारा शरीराकाश के चन्द्र-सूर्य शब्दों के अर्थात् मन
एवं प्राण के प्रसरण का प्रतिपादन किया गया है ।
उपदेश का प्रयोजन—इस उपदेश का प्रयोजन यह है कि—इस उपदेश द्वारा
प्रत्यभिज्ञापित तुरीय दशा के प्रत्यवमर्शाभ्यास की काष्ठा पर आरूढ़ प्रबुद्ध साधक को,
समस्त बाह्याभ्यन्तर की अध्वा को अतिक्रान्त करके परमपद में विश्रान्ति प्राप्त होती है—
'प्रत्यभिज्ञापित तुरीय दशा प्रत्यवमर्शाभ्यासकाष्ठाधिरोहिणः प्रबुद्धस्य निखिल
बाह्याभ्यन्तराध्वातिक्रान्तपरमपदविश्रान्तिलाभः इति ॥'
कहा भी गया है—'यां स्पन्दरूपामवस्थाम्' ॥१
योगशास्त्र में सोम सूर्य (शशिभास्करे) के अनेक अर्थ बताए गए हैं—
(१) सोम = अपान । सूर्य = प्राणवायु ॥२
(२) सोम = चन्द्रनाड़ी, । सूर्य = सूर्य नाड़ी = (चन्द्रस्वर एवं सूर्यस्वर)
(वामनाड़ी) (दक्षिण नाड़ी) नासापुट में प्रवाहित
श्वास-प्रवाह ।
(३) 'ठ' 'ह' ।
(४) सोम = इड़ा नाड़ी । सूर्य = पिंगला नाड़ी श्वास-प्रवाह ।
(५) सोम = वामनासापुट प्रवाहित प्राण । सूर्य = दक्षिणनासापुट प्रवाहित प्राण ॥
(६) अधोप्रदेश में स्थित वायु 'सूर्य' = हृदयस्थ वायु ॥
१. नाड़ी २. नाड़ियों में प्रवाहित श्वास—प्राणापान आदि को सूर्य-चन्द्र (ह + ठ)
कहा गया है । ('हश्च ठश्च सूर्यचन्द्रौ') 'प्राणापानयोग' सूर्यचन्द्रयोग, 'गङ्गा यमुना संयोग'
आदि इन्हीं दो तत्त्वों के साधनापरक अभिधानान्तर हैं । जब तक साधक 'सूर्य' एवं
'चन्द्रमा' (पिंगला नाड़ी एवं इड़ा नाड़ी) की दासता में रहता है अर्थात् जब तक उसके
प्राण इड़ा एवं पिंगला में प्रवाहित होते रहते हैं तब तक वह बन्धन, माया, अज्ञान,
अविद्या एवं संसरण-चक्र में पड़ा रहता है किन्तु जैसे ही उसका प्राण-संचार इन दोनों
मार्गों का त्याग करके तृतीय मार्ग—सुषुम्णा नाड़ी मार्ग में होने लगता है वह ऊर्ध्वधाम
की यात्रा करने एवं आत्मबल का संस्पर्श पाने के कारण मुक्त हो जाता है ।
प्रस्तुत कारिका में योगशास्त्रीय नाड़ीगत साधना को आत्मीकृत करने का उपदेश
दिया गया है । शास्त्रों में 'प्राणापानसमायोग' को ब्रह्माद्वैत के प्रकाशन का साधन
माना गया है—
१. रामकण्ठाचार्य : 'स्पन्दकारिकाविवृति' ।
२. सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गोरक्षनाथ)—
सुषुम्णा को मध्यमा नाड़ी भी कहते हैं—द्वयं तु मध्यमा नाड़ी ।
हकारः कथितः सूर्यष्ठकारश्चन्द्र उच्यते ।
सूर्यचन्द्रमसोर्योग़ाद्धठयोगो निगद्यते ॥