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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

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DevanagariHindipublished519 pages

Page 353 of 519

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Page 353

२५२ स्पन्दकारिका
'प्राणापानसमायोगाच्छब्दतत्त्वसमाश्रयात् ।
विज्ञानतत्त्वं सापेक्षात् ब्रह्माद्वैतं प्रकाशते ॥'
गीता में 'प्राणापान' (सूर्य-चन्द्र) को प्राणायाम के प्रसंग में इस प्रकार निरूपित
किया गया है— 'अपाने जुह्वति प्राणं प्राणापाने तथापरे ॥
प्राणापानगतीरुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः ॥'
प्राणापान की गति रोककर या समान करके योगी सुषुम्णा नाड़ी में प्राणों का
संचार करके परमपद प्राप्त करते हैं ।
'हठयोगप्रदीपिका' में कहा गया है कि प्राणापान, नादबिन्दु की एकता से योग
की संसिद्धि प्राप्त होती है—
'प्राणापानौ नादबिन्दूमूलबन्धेन चैकताम् ।
गत्वा योगस्य संसिद्धिं यच्छतो नाम संशयः ॥ (३।६४)
योग पद्धति के अनुसार—इड़ा पिंगला में वायुसंचार रोककर इसे सुषुम्णा
(मध्यमा) में प्रवाहित करके इसे ब्रह्मरंध्र में रोकना चाहिए—
'ज्ञात्वा सुषुम्नासद्भेदं कृत्वा वायु च मध्यगम् ।
स्थित्वा सदैव सुस्थाने ब्रह्मरंध्रे निरोधयेत् ॥ (ह० ४।१६)
शाक्तभूमिका में प्रविष्टोन्मुखी योगियों की स्थितियों का विवेचन—
स्पन्दसूत्रकार ने मूढ़ एवं प्रबुद्ध योगियों की साधनावर्ती अनुभूतियों के अन्तर का
विवेचन करते हुए कहा है कि—
'यह स्पन्दस्वरूपात्मिका चिद्रूपा शक्ति मुझे जिस प्रकार की स्वरूपविमर्शानात्मिका
अनुभूति प्रदान करेगी मैं उस पर आरूढ़ रहूँगा'—इस प्रकार संकल्प लेकर जिस प्रकार
की वृत्तिप्रत्यस्तमितावस्था का आश्रय ग्रहण करके अवस्थित रहता है ।
(जिस अवस्था का आलम्बन ग्रहण करके यह मुझसे जो कहेगी उसे मैं अवश्य
करूँगा—इस प्रकार का संकल्प ग्रहण करके ही योगी (अग्रवर्ती साधना के लिए) स्थित
रहता है ।)
भट्टकल्लट की व्याख्या—जिस स्पन्दस्वरूपा अवस्था को ग्रहण करके 'यह
मुझसे जो कुछ भी कहेगी उसे मैं अवश्य करूँगा'—इस प्रकार के अध्यवसाय पूर्वक जो
योगी स्पन्दतत्त्व में अधिष्ठित होकर—
'यां स्पन्दस्वरूपरूपामवस्थामवलम्ब्य' 'यत्किंचित् अयं मम वक्ष्यति, तत् अवश्यं
करिष्यामि'—इत्यध्यवसायेन स्पन्दतत्त्वमधिष्ठाय यो वर्तते ॥'
उसका आश्रय ग्रहण करके सोम एवं सूर्य (प्राणापान) दोनों शरीर छोड़कर ऊर्ध्व
मार्ग से सुषुम्ना मार्ग में लय हो जाते हैं ।
भट्टकल्लट की व्याख्या—उस पुरुष की उस अवस्था का आश्रय ग्रहण करके,
सोम और सूर्य दोनों को सुषुम्ना मार्ग में अर्थात् मध्यनाड़ी में स्तमित करके तथा