Skip to content
SarvaKosh
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished519 pages

Page 361 of 519

Read in context
Page 361

२६० स्पन्दकारिका
(४) 'उन्मेषनिमेषौ बहिरन्तः स्थिती ऐवैश्वर सदाशिवौ बाह्याभ्यन्तरयोर्वेद्यवेदकयो-
रेकचिन्मात्र विश्रान्तेर्भेदात्सामानाधिकरण्येनेदं विश्वमहमिति विश्वात्मनो मतिः
शुद्धविद्या' —प्रत्यभिज्ञाकारिकावृत्ति ।१
इस स्वरूप वाली 'शुद्धविद्या' जो एक तत्त्व है वह इस प्रसंग में ग्राह्य नहीं है ।
शुद्ध विद्या इस प्रसंग की 'सहज विद्या' नहीं है ।
यहाँ 'शुद्धविद्या' पद उस शुद्धविमर्श को द्योतित करता है जिसके उदित होते ही
योगी के अन्तःकरण में सर्वज्ञता, सर्वकर्तृत्व आदि माहेश्वर षडात्मक स्वधर्म प्रकाशित हो
उठते हैं ।
विद्या शब्द का व्युत्पत्यात्मक अर्थ—
'विद्या' पद लाभवाचक 'विद्लृ' धातु एवं विचारमूलक 'विद्' धातु एवं ज्ञानार्थक
'विद्' धातु से व्युत्पन्न हुआ है ।
सहज विद्या—(१) विद्लृ (लाभ)—'विद्या'
(२) विद् (ज्ञान)—'विद्या'
(३) विद् (विचार)—'विद्या'
(१) लाभद्योतक 'विद् लृ' धातु = 'विद्या' । इस अर्थ में 'विद्या' पद 'विमर्श'
की उस उच्चतमावस्था का सूचक है जिसका विकास होने पर योगी माहेश्वर शक्तियों
(सर्वज्ञता, सर्वकर्तृत्व आदि) को या शिव धर्मों को सहज रूप से अधिगत कर लेता है ।
(२) विचार-द्योतक विद् धातु = 'विद्या' = इस अर्थ में 'विद्या' पद विमर्श
की उस उच्चतमावस्था को द्योतित करती है जिसका विकास होने के बाद योगी—'मैं
अनादि हूँ' स्वातन्त्र्य, स्वात्मविमर्श, शिवत्व मेरा स्वभाव है'—का ज्ञान या अनुभव
होने लगता है ।
(३) ज्ञान द्योतक विद् धातु = 'विद्या' । मैं स्वयं शक्तियों का स्वामी शिव हूँ ।
'विश्व' मेरा स्पन्दन है । यही उन्मनन भी है ।
'सहज अभ्यास', 'सहज जप', 'सहज ज्ञान', 'सहजयोग, 'सहज विद्या' आदि का
उदय संभव है । 'हठयोगप्रदीपिका' में कहा गया है कि—'सहजावस्था' योग की एक
उच्चावस्था है । इसके निम्न लक्षण हैं—
(१) इस अवस्था में समस्त कार्य कलाप अकृत्रिम रूप से निष्पादित होते हैं ।
(२) इसमें कुण्डलिनी उद्बुद्ध रहती है ।
(३) इसमें समस्त सायास कार्यों का त्याग कर दिया जाता है ।
(४) यह स्वयमेव उत्पन्न होती है—स्वयंभू स्थिति है—
'उत्पन्नशक्तिबोधस्य त्यक्तनिःशेषकर्मणः ।
योगिनः सहजावस्था स्वयमेव प्रजायते ॥ (उपदेश ४।११)
१. प्रत्यभिज्ञाकारिकावृत्ति ।