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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

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DevanagariHindipublished519 pages

Page 364 of 519

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Page 364

द्वितीयः निष्यन्दः २६३
मान्त्रीशक्ति के प्रकटीकरण की विधि एवं जाग्रत मन्त्रों की अचिन्त्य शक्ति
आचार्य क्षेमराज ने 'स्पन्दनिर्णय' में इस श्लोक को द्वितीय अध्याय के प्रथम श्लोक के
रूप में प्रस्तुत किया है और सात श्लोकों में समाप्त कर दिया है । यह 'सहजविद्योदय
निष्यन्द' का प्रथम श्लोक है ।१
प्रस्तुत श्लोक में 'मन्त्र शक्ति' का निरूपण किया गया है और उसके प्रथमोदय पर
प्रकाश डाला गया है । 'मन्त्र' उस बल को प्राप्त करके सर्वज्ञत्व की शक्ति से आवेष्टित
हो उठते हैं (Get endued with the power of omniscience) और अपने कार्यों
का संपादन उसी प्रकार करते हैं जिस प्रकार सशरीरी व्यक्ति की इन्द्रियाँ किया करती हैं ।
ये 'मन्त्र' अपने आराधकों के चित्त के साथ लयीभूत हो जाते हैं (Get absorbed) वे
शान्तरूप एवं अशुद्धियों से रहित होकर आराधकों के चित्त में लीन हो जाते हैं अतः ये
मन्त्र शिव की यथार्थ शक्ति प्राप्त किये हुए होते हैं ।२
'अनन्त', 'व्योमव्यापी' आदि मन्त्र सर्वज्ञत्वादि सामर्थ्य आदि के द्वारा प्राणियों के
अधिकार के लिए प्रवर्तित होते हैं । जिस प्रकार प्राणियों की इन्द्रियाँ अपने बल के द्वारा
ऐन्द्रिय विषयों के प्रकाशन का कार्य करती हैं ठीक उसी प्रकार 'मन्त्र' भी साधकों के
लिए कार्य संपादित करते हैं और ये सृष्टि-संहार-तिरोधान-एवं अनुग्रह आदि कार्य
निष्पादित करते हैं ।
उस शक्ति (स्पन्दात्मक शक्ति) को प्राप्त करके ये पवित्र मन्त्र (यथा अनन्त,
व्योमव्यापी आदि मन्त्र) सर्वज्ञता आदि की शक्ति प्राप्त कर लेते हैं तथा सृष्टि-स्थिति-
संहार-तिरोधान एवं अनुग्रह आदि देव कार्यों को निष्पादित करते हैं । ('तत् स्पन्द-
तत्त्वात्मकं बलं प्राणरूपं वीर्यमाक्रम्य अभेदेन आश्रयतया अवष्टभ्य भगवन्तोऽनन्तव्योम-
व्याप्यादयो मन्त्राः सर्वज्ञबलेन जृंभमाणा देहिनां प्रवर्तन्ते—सृष्टिसंहारतिरोधानअनुग्रहादि
कुर्वन्ति ।।')३
मन्त्र-विज्ञान और उसका विधान—
मन्त्र में चार बातें मुख्य होती हैं—(१) 'बीज' (२) 'पिण्ड' (३) 'पद' (४)
'नाम' । उनका धर्म है—(१) मनन एवं (२) त्राण । उनका बल है—निरावरण चित्
का उल्लास (पराशक्ति) उसी शक्ति को लेकर 'मन्त्र' सहज नादशक्ति से उद्बोधित होकर
प्रदीप्त होते हैं उनमें सर्वज्ञता आदि का बल आ जाता है । जब सिद्धमन्त्री उनका प्रयोग
करता है तब वे—(१) 'अनुग्रह' और (२) 'निग्रह' करने में समर्थ होते हैं ।
जिस प्रकार एक शरीरधारी अपने कर-चरणों का प्रयोग करता है ठीक उसी प्रकार
एक सिद्धमन्त्री मन्त्रों का प्रयोग करता है । आत्मा के परत्व का अवबोध होने के कारण
मन्त्रज्ञ इच्छा मात्र से मन्त्रों का यथेष्ट प्रयोग कर सकता है ।
'त्रिकसार' नामक ग्रन्थ में कहा गया है कि—वर्णातीत निराकार परम तत्त्व का
बोध हो जाने पर 'मन्त्र' मन्त्राधिपों के साथ किंकर हो जाते हैं अर्थात् वशीभूत हो जाते हैं ।
१-३. स्पन्दनिर्णय ।