स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज
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लिए अनुभूयमान नहीं है क्योंकि ये दुःखादिमूलक हैं अतः प्रबुद्ध व्यक्ति इससे मुक्त
होकर उपदेश की शक्ति के कारण आत्मस्वरूप के विवेचन में सक्षम प्रज्ञातिशय द्वारा
स्पन्द तत्त्व का अनुभव करते हैं ।१
मायाशक्ति द्वारा उद्भावित भेदावभास की शक्ति से उल्लसित (भेद भरी)
अनेकताओं द्वारा अनन्त ज्ञान एवं क्रियाओं द्वारा व्यवधीयमान के समान यह 'प्रतिष्ठित
स्पन्द' प्रबुद्ध साधकों को भी उपलब्धि गोचर नहीं । यद्यपि यह भी सत्य है कि समस्त
प्राणी समस्त अवस्थाओं में, नित्योदित प्रतिष्ठित स्पन्द प्रकाश से परिस्फुरित समापत्ति
का, उन्मेष करने में समर्थ है किन्तु माया शक्ति से उद्भावित भेदावभासजन्य नानात्व के
उल्लास से व्यवधीयमान प्रतिष्ठित स्पन्द उपलब्ध नहीं हो पाता ।२
जागृति अवस्था में स्पन्दतत्त्व की अनुभूति—
अत्यधिक क्रुद्ध या अत्यधिक हर्षित होने पर या अकस्मात् दौड़ पड़ने पर और
किंकर्तव्यविमूढ़ होने (मैं क्या करूँ?' की स्थिति में अवस्थित होने) पर जब व्यक्ति के
अन्तःकरण में शक्तिप्रत्यस्तमित दशा का उन्मेष होता है तब उस क्षणिक एकाग्रता की
अवस्था में स्पन्द तत्त्व का स्पष्टतः उदय होता है और इसकी अनुभूति गुरूपदेश से प्राप्त
होता है ।
भट्टकल्लट स्पन्दसर्वस्व में कहते हैं—
‘तस्य च स्पन्दतत्त्वस्य अतिक्रुद्धे प्रहृष्टे धावमाने च किं करोमि, इत्येवं चिन्ताविष्टे
यदा शक्तिप्रत्यस्तमयः, तदा स्पन्दतत्त्वस्य स्फुट एवोदयो गुरूपदेशात् अधिगन्तव्यः ॥’३
सहसा क्रोध की चरम सीमा पर पहुँचा हुआ या हर्ष की पराकाष्ठा पर पहुँचा हुआ
या किसी तर्कशून्य कारणों से—‘मैं क्या करूँ?’—इस प्रकार की किंकर्तव्यविमूढ़ता की
अवस्था में पड़ा हुआ या अकस्मात दौड़ पड़ने के लिए विवश व्यक्ति जिस विशिष्टा-
वस्था में प्रविष्ट हो जाता है उसी में प्रतिष्ठित स्पन्द तत्त्व की उपलब्धि हो जाती है ।
शक्तिप्रत्यस्तमित दशा—दैनिक जीवन में कभी कभी ऐसे विशिष्ट क्षण आते हैं
जब कि मनोभावों के रूप में प्रवाहित विशिष्ट स्पन्द-प्रवाह किसी विशिष्ट स्थिति के आ
जाने से अकस्मात् तत्काल रुक जाते हैं । बाह्य प्रसृत स्पन्द-प्रवाहों का यह गति-निरोध या
यह गतिनिरोधात्मक अवस्था को ही 'वृत्तिक्षयावस्था' 'निस्तिमितबुद्धिदशा' या 'शक्तिप्रत्य-
स्तमित दशा' कहते हैं । ‘शक्तिप्रत्यस्तमितदशा' के क्षणों में शक्ति की प्रवह्मानता अवरुद्ध
नहीं होती प्रत्युत् बाह्योन्मुख प्रवाह अकस्मात् अपने मार्ग की दिशा परिवर्तित करके
क्षणभर के लिए अन्तर्मुखी हो जाता है और विद्युत के समान तीव्र गति से गतिमान होकर
सामान्य स्पन्द से एकाकार होकर फिर विशेष स्पन्द रूप से प्रवाहित हो जाता है ।
जागृतावस्था में सामान्य स्पन्दतत्त्व की अनुभूति 'शक्तिप्रत्यस्तमित' क्षणों में ही
१-२. रामकण्ठाचार्य : ‘स्पन्दकारिकाविवृति' ।
३. भट्टकल्लट : ‘स्पन्दसर्वस्व' ।