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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

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DevanagariHindipublished519 pages

Page 351 of 519

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Page 351

२५० स्पन्दकारिका
(के द्वारा) उसका अतिक्रमण करके किस मार्ग से विलीन होता है? ऊर्ध्वमार्ग द्वारा
विलीन होता है अर्थात् सर्वातिरिक्त अलौकिकमार्ग से विलीन होता है।
चन्द्र = 'मनःप्रसररूपा ज्ञानशक्ति'। यह द्विपकारा है—(१) 'इदं हेयम्' (२) 'इदं
उपादेयम्' (यह त्याज्य है और यह ग्राह्य है) ॥
आलम्बनीय निजी विषय को न पाकर (अतिक्रमण करके) उस अवस्था में
मध्यमार्ग प्राप्त करके उसका स्वकारण ही लीन हो जाता है। 'सूर्य'—'प्राणप्रसररूपा
क्रियाशक्ति'। यह प्राणप्रसरणरूपा क्रियाशक्ति जो कि नाड़ी-मण्डल में संचार करती है
और सामान्य प्राणरूपता प्राप्त करके लोकातिरिक्त मार्ग से अपने पद में लीन हो जाती
है। 'सुषुम्णा' ७२ हजार नाड़ियों में श्रेष्ठतम है, शेष निरर्थक हैं—'शेषास्त्वनिरर्थकाः'
(ह०प्र०) 'सौषुम्नेऽध्वन्यस्तमित'—सुषुम्णा मार्ग में अस्तमित । सुषुम्णा = 'मध्यमा
नाड़ी' १ शरीर के मध्य में स्थित सुषुम्णा नामक मध्य नाड़ी मार्ग में, अर्थात् परा पारमेश्वरी
शक्ति के प्रवहणमार्ग में, प्रशमित ज्ञेय कार्यों में संवर्द्धित उपराग के परित्याग के द्वारा
परशक्ति के रूप की प्राप्ति होती है। सुषुम्णा कालभोक्त्री है शांभवी शक्ति है—
'सुषुम्णा शांभवी शक्तिः' = 'भोक्त्री सुषुम्णा कालस्य' ।
उस कौन सी दशा का आश्रय ग्रहण करके? 'यामवस्था समालम्ब्य'—सम्यक्
रूप से परित्यक्त समस्त वस्तुओं की व्यापृति के स्तिमित होने से समस्तशक्तिसम्पन्नता
का आलम्बन लेकर पुरुष स्थित होता है। क्या करके? आलम्बन लेकर । समालम्बन
क्रियापूर्वक क्रियान्तरनिष्ठ वाक्य के रूप में कारिकाकार कहते हैं—'इति संकल्प्य' ॥ —
इस प्रकार का संकल्प करके ।
किस प्रकार? 'यदयं मम् वक्ष्यति तदवश्य करिष्येऽहम्'—मुझसे जो कुछ भी
कहेंगे उसे मैं अवश्य करूँगा।' क्योंकि आज्ञा के अतिक्रमण से तत्काल मृत्यु आदि
संभावित रहती है।
अयं यद (यदयं) वस्तु = यह जो वस्तु । मम मुझसे (मेरा)। कर्तव्य के रूप में।
वक्ष्यति = कहेंगे (जल्पिष्यति) तदवश्यं = उसे अवश्य । सर्वात्मना सभी अन्य कार्यों का
परित्याग करके मैं—करिष्ये = संपादित करूँगा।—यही दोनों की वाक्यार्थ संगति है।
किसी कारण से अवश्यमेव करणीय कार्यों को करने हेतु आदेशित वाणी से
कार्यितव्य वस्तु-विवक्षा से आक्षिप्त पुरुष द्वारा उन वचनों को सुनने से समस्त वृत्तियों
के निर्लीन होने से साधकसंविदात्मक तुरीयावस्था अवश्य प्राप्त कर लेता है—'संवित्
तुरीयां दशाम् अवश्यमेवाविशति ।।' परिणामस्वरूप वह उसके प्रत्यवमर्श के अभ्यास से
परम तत्त्व को प्राप्त कर लेता है—'संवित् तुरीयां दशाम् अवश्यमेवाविशति, तत्प्रत्यव-
मर्शाभ्यासात् परतत्त्वोपलब्धिः ॥' २
१. इयं तु मध्यमा नाड़ी दृढाभ्यासेन योगिनाम् ।
आसनप्राणायाममुद्राभिः सरला भवेत् ॥ (ह०यो०प्र०)
२. रामकण्ठाचार्य : 'स्पन्दकारिकाविवृति' ।