स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज
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Read in context२५४ स्पन्दकारिका
सुषुम्ना में प्राणसंचार एवं 'मनोन्मनी' का उदय—चित्त के अस्तित्व के दो
घटक हैं—(१) 'वासना' (२) 'प्राण' । इनमें से एक के भी नष्ट हो जाने पर दूसरा
स्वयमेव नष्ट हो जाता है—
'हेतुद्वयं तु चित्तस्य वासना च समीरणः ।
तयोर्विनष्ट एकस्मिंस्तौ द्वावपि विनश्यतः ॥ (हठयोगप्रदीपिका ४।२२)
'द्वे बीजे राम! चित्तस्य प्राणस्पन्दनवासने ।
एकस्मिंश्च तयोर्नष्टे क्षिप्रं द्वे अपि नश्यतः ॥' (योगवासिष्ठ)
'मध्यमार्गे सुषुम्नायां चरन् गच्छन् मारुतः प्राणवायुः यावत् यावत्कालपर्यन्तं न
प्रविशति प्रकर्षेण ब्रह्मरंध्रपर्यन्तं नं विशति ब्रह्मरंध्रं गतस्य स्थैर्यंति ब्रह्मरंध्रं गत्वा न स्थिरो
भवति ॥ सुषुम्नायामसंचरन् वायुरसिद्ध इत्युच्यते । ('ज्योत्स्ना' ह०प्र०)
योग-विधान के अनुसार नाड़ी चक्र का विशोधन करके प्राण-संयम करने से
सुषुम्णा के प्रवेशद्वार का भेदन करके प्राण उसके मुख में प्रवेश कर जाता है और
सुषुम्णा में प्राण के प्रवेश से मन में स्थिरता का उदय हो जाता है । मन का यही
सुस्थिरीभाव या सुस्थिरावस्था 'मनोन्मनी' (असंप्रज्ञात समाधि) कहलाती है—
(१) विधिवत्प्राणसंयामैर्नाडीचक्रविशोधिते ।
सुषुम्नावदनं भित्त्वा सुखाद्विशति मारुतः ॥ (२।४१)
(२) मारुते मध्यसंचारे मनःस्थैर्यं प्रजायते ।
यो मनः सुस्थिरीभावः सैवावस्था मनोन्मनी । (२।४२)
अभ्यस्त (प्राणायाम से नियंत्रित) वायु जठराग्नि के साथ कुण्डली-बोधन के साथ
सुषुम्णा में प्रवेश कर जाता है—
'वायुः परिचितो यस्मादग्निना सह कुण्डलीम् ।
बोधयित्वा सुषुम्नायां प्रविशेदनिरोधतः ॥ (हठयोग प्र०४।१९)
सुषुम्णा और कालभक्षण—जब प्राणवायु सुषुम्णा में प्रवाहित होने लगता है तब
मन, देश, काल एवं वस्तु के परिच्छेद से शून्य ब्रह्म में प्रविष्ट हो जाता है और तब
चित्तवृत्ति के निरोध का ज्ञाता योगी प्रारब्धसहित संपूर्ण कर्मों को निर्मूल कर देता है—
'सुषुम्नावाहिनि प्राणे शून्ये विशति मानसे
तदा सर्वाणि कर्माणि निर्मूलयति योगवित् ॥'
सुषुम्ना में प्राण-प्रवाह से 'अमरोली', 'वज्रोली' एवं 'सहजोली' भी उदित हो
उठती हैं— चित्ते समत्वमापन्ने वायौ व्रजति मध्यमे ।
तदाऽमरोली वज्रोली सहजोली प्रजायते ॥ (हठयोग प्र० ४।१४)
सोमसूर्य रात्रिदिवसात्मक काल के धारक हैं किन्तु सुषुम्णा काल की भोक्त्री है—
'सूर्याचन्द्रमसौ धत्तः कालं रात्रिंदिवात्मकम् ।
भोक्त्री सुषुम्ना कालस्य गुह्यमेतदुदाहृतम् ॥' (ह०प्र०)