स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज
Page 365 of 519
Read in context२६४ स्पन्दकारिका
‘विदिते तु परे तत्त्वे वर्णातीते ह्यविग्रहे ।
किंकरत्वं तु गच्छन्ति मन्त्रा मन्त्राधिपैः सह ॥’
यदि ऐसा नहीं है तो बड़े प्रयत्न से प्रयोग करने पर भी कठपुतली के समान
निष्फल चेष्ट ही रहते हैं क्योंकि सत्यसंकल्पचिच्छक्ति के बल का स्पर्श न होने के कारण
वे केवल वर्ण-मात्रा अर्थात् मात्र जड़ अक्षर ही बने रहते हैं—‘त्रिकसार' में यही कहा
गया है—
हंसपारमेश्वर नामक ग्रन्थ में कहा गया है कि—केवल वर्णरूप 'मन्त्र' पशुभाव
में स्थित है। सुषुम्नामार्ग से उच्चारण करने पर वे 'पशुपति' हो जाते हैं। वस्तुतः शाक्त
मार्ग में ही मन्त्रों की सफलता है।
‘पशुभावे स्थिता मन्त्राः केवला वर्णरूपिणः ।
सौषुम्णेऽध्वन्युच्चरिताः पतित्वं प्राप्नुवन्ति ते ॥’
वस्तुतः शाक्त मार्ग में ही मन्त्र साकल्य प्रदान करते हैं—‘ऐष शाक्तो मार्गोऽत्र च
मन्त्राणां साकल्यम्' ।
तत्त्वरक्षा-विधान में कहा गया है—आत्म संवित् अथवा परम पद में मन्त्र का
प्रयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि वह शक्ति और क्रिया से रहित है शक्ति के विषय में
ही मन्त्र का प्रयोग करना चाहिए। वही जप सफल होता है अन्य नहीं—
‘अशक्तत्वान्निष्क्रियत्वान्न पुंसि न परे पदे ।
शक्तौ नियोजयेन्मन्त्रं जपस्तु सफलो भवेत् ॥’
श्रीवैहायसी नामक ग्रन्थ में भी कहा गया है—
संधिस्थल में नादोर्ध्वध्वनि से बोधित 'जप' करना चाहिए यथा सूत्र में मणि
ग्रथित होते हैं। ठीक इसी प्रकार शक्ति के ताने-बाने से निर्मित मन्त्राक्षरों का ध्यान करना
चाहिए। वह शक्ति परम व्योम में रहती है और परमामृत से समृद्ध है। उक्त रीति से
'जप' करने पर 'मन्त्र' अपने स्वरूप को प्रकट कर देता है अपने को आच्छादित नहीं
रखता—
‘विषुवत्कं जपं कुर्यान्नादोर्ध्वध्वनिबोधितम् ।
मन्त्राक्षराणि मणिवच्छक्तौ प्रोतानि भावयेत् ॥
तामेव च परे व्योम्नि परमामृतबृंहिताम् ॥’
श्रीकालपरा नामक ग्रन्थ में भी कहा गया है—शब्द नादात्मक हैं अतः उसके
साथ प्रत्यय, संवित् संलग्न रहकर बढ़ाती रहती है। मन्त्र बोध के स्वरूप में स्थित
संवित् अभिन्न है अतः वह आत्मबोध भी करा देती है—
‘शब्दो नादात्मकस्तस्मात् प्रत्येनोपबृंहितः ।
मन्त्रबोधस्वरूपस्थमभिन्नो बोधयत्यपि ॥’
संकर्षणसूत्र में भी इसी भाव को इस प्रकार व्यक्त किया गया है—चिद्रूपता
स्वात्मैकनिष्ठ है। भाव और अभाव उसकी दशायें हैं—परिष्कार हैं। वह स्वसंवेदन