सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा
स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( १० ) सिंहासनबत्तीसी.
उसने चाहा कि उसपर रक्खें, इतनेमें ये पुतलियां खिलाखिला-
कर हँसीं ओर सबने यह देखा. राजा अपने मनमें जरा रुककर
'वेनिहायत शरमिंदा हो कुछ दहशत खाई. कुछ उसे अचंभा हुआ
कि ये बेजान पुतलियां जानदार क्योंकर हुईं ? गश खाकर
गजबमे आकर पाव उधरसे खैंचलिया, और पुतलियोंसे कहने
लगा कि, तुमने क्या देखी ? ओर क्यों हँसी ? ये सब बात
मुझसे बयान करो. क्या मैं बली गजाका बेटा यशस्वी नहीं ?
या क्षत्रियोंमें कायर हूं ? या नामर्द हूं ? या बेरहम हूं ? या ओर
राजा मेरे हुकममें नहीं ? या मैं पंडित नहीं ? या मेरे यहां
पद्मिनी नारी नहीं ? या मैं राजनीति नहीं जानता ? या मैं
किसीकी मजलिसमे नींच होकर बैठा ? फिर किस बातमें मैं
नालायक हूं ? मेरे दिलमें शंक पडा है सो मुझे तुम बताओ ! ये
बात राजाके मुखसे सुनकर उनमेंसे रत्नमंजरी नामक--
पहली पुतली
बोली:--हे राजा, दिल लगाकर मेरी बात सुनो और
यह किस्सा मैं तुमसे बयान करता हूं. तुम गुणग्राहक और
कदरदान हो ! जो तुमने बातें कहीं सो सब दुरुस्त है
सूर्यसेभी तुम्हारे तेजके आगकी ज्वाला अधिक है पर उतना
गर्व मत करो. पुरानी कथा सुनो इससंसारका अंत नहीं. भगवान्ने