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सर्वकोश
सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा

स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 160, कुल 190 में से

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पृष्ठ 160

( १६० ) सिंहासनबत्तीसी.
भयी और उन छहों रानियोंसे भोग किया. फिर वे छहों रानियों
बिदा हो अपने मंदिरको चली आईं. राजा यह चरित्र देख
अपने मनमें विचार करने लगा कि, इस सिद्धने क्या किया
कि अपना योग भ्रष्ट किया और उनका धर्म खोया. यह विचार
कर राजा सिद्धके सोहीं जाकर खड़ा रहा. सिद्ध मनमें कुछ
शंका लिये बोला कि, हे नृपती ! कहांसे आये हो अपने
मनका मुझसे भाव कहो. तब राजाने कहा मुझे आपके दर्शनकी
इच्छा थी. इस लिये मै यहां आया हूं. तब वह योगी बोला
कि राजा ! तू मुझसे जो कामना मांगे सो तेरी पूरी करूं फिर
राजाने कहा कि स्वामी ! एक देहकी छः दह किस तरहसे बनें
वह विद्या मै आपके पास मांगता हूं मुझे बताओ नहीं तो मैं तुझे
जानसे मार डालता हूं, इसका विचार कर, जबाब दो. इतनी बात
कह पुतली कहने लगी कि, सुन राजा भोज जब विक्रमने सिद्धसे
ये बातें कहीं तब उसने डरके वह विद्या दी. और राजाने वहां
परीक्षा करली. तिस पीछे योगीको तलवार मार उसके टुकडे टुकडे
कर डाल दिया. फिर वहांसे निकल महलमे आया और जहां छहों-
रानियां बैठीं थीं वहां आनकर राजाभी बैठ गया. तब राजाको
देखकर छहों उठकर खिदमतमे हाजिर हुई. किसीने पंखा हि-
लाया, किसीने हाथ मुंह धुलाया, किसीने पान बना खिलाया
इसी तरह सब अपनी २ बीती राजासे प्रकाश करने लगी. और