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सर्वकोश
सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा

स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 155, कुल 190 में से

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पृष्ठ 155

चौबीसवीं पुतली २४. ( १६६ )

लगाती है इस तरहसे अनेक रीतिसे चेष्टा कर रही है और वह भी
इसी तरह इशारे कर रहा है. उन दोनोंकी हालत देख राजाने
अपने जीमें विचारा कि इतना तमाशा देखा चाहिये कि, ये
क्या करते है. राजाने स्नान ध्यान अपनाभी सब किया. पर
उनकी ओरभी देखता रहा. इतनेमें वह स्त्री स्नान कर चद्दर
ओढ घूँघट कर अपने घरकू चली और साहुकार बच्चाभी
उसके पीछे चला. राजाने एक हलकारा उन दोनोंके पीछे
लगाया और उस हलकारेको कह दिया कि इन दोनोंका मकान
देख सबसे वाकिफ हो और हमे जल्दी खबर दे. जब वह
औरत अपने घरमें गई तब उसने फिरकर देखा और शिर
खोलकर दिखाया. फिर छातीपर हाथ धर अपने मंदिरमें गई
और सेठके बेटेनेभी अपनी छातीपर हाथ रख लिया. यह खबर
हलकारेने आ राजाको दी तब राजाभी अपनी सभामें आकर
बैठा और एक पंडितसे पूँछा कि कोई स्त्रीचरित्र हमें सुनाओ
कि हमारा जी सुनना चाहता है. तब पंडितने उत्तर दिया कि
महाराज ! मेरा तो क्या सामर्थ्य है जो मैं स्त्रियोंका चरित्र और
पुरुषका भाग कहूँ. ब्रह्माभी नहीं जानता, आदमीकी तो क्या
कुदरत है ! और यह देखतेही बन आवै जबानसे कहा नहीं
जाता. यह बात पंडितसे सुन राजा चुप हो रहा. और अपने
जीमें कहा यह चरित देखा चाहिये. इतनेमें शाम होगई राजा
उठ महालमें गया और कुछ खा तुरंत बाहर निकल आया और