सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा
स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( १६ ) सिंहासनबत्तीसी.
राजाने विक्रमादित्यको बुलाके कहा-हम तुम बैठकर एकजगह
खीरा खावें. वह राजा योगी था, और इस इल्मको जानता
था. उन लकीरोंसे बचकर सिंहासनके पास जाकर खडा रहा.
खीरा और छुरा उसके हाथमेंसे लेलो. दाहिने हाथमें छुरी रक्खी
और बाये हाथमे खीरा लिया. राजा शंख गाफील था फुरती करके
छतसे छुरी मारी और राजाका काम तमाम किया. यह बात रत्नमं-
जरीने जाहिर की और कहा कि-हे राजा ! तूं इस बातका सुन. खुदा
जो रहम करे तो तिनकेसे पहाड करे और गजब करे तो पहाड़से
जो तिनका किताबमें जो लिखा है, वह कभी झूठ नहीं होता. जब मांके
पेटमें इन्सान आता है चार बातें साथ लाता है नफा और नुकसान
दुःख और सुख. तीन लोक और चौदह भुवन फिरे लेकिन
किस्मतका लिखा नहीं मिटता. भाईको मारा, दिलमें खुश हुआ
उसके लोहूका माथेपर टीका लगा लिया. चलकर सिंहासनपर
बैठा और चंवर ढुलवाया. उस राजाकी रानी उसके साथ
सती हुई तब यह राजनीतिसे न्याय करने लगा. और जितने
राजा उसके राजमें ये सब सुनकर खुश हुए. मुजरेको आये
और दोनों वक्त दरबारमें हाजिर रहने लगे. इसी तरहसे
राजा राज करने लगा. कितनें एक दिनोंके बाद एक दिन
राजा शिकारको चला. तब कुत्ते, बाज, बहरी और जितने
शिकारी जानवर थे सो सब साथ लिये. और जितने अच्छे-