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सर्वकोश
सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा

स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 63, कुल 190 में से

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पृष्ठ 63

( ५८ ) सिंहासनबत्तीसी.

हुए थे, उस दरख्तपर एक बंदरिया बैठी थी. कभी नीचे उत-
रती है, और कभी ऊपर चढ़ती है. राजा यह कौतुक छिपाहुवा
देखता रहा ! इतनेमें निगाह राजकी ऊपर गई तो क्या देखता है
कि उस हवेलीपर एक बालाखाना है. जब दरख्तपर चढगया
तो देखा कि, वहां एक पलंग बिछा है और सब ऐशका असबाब
धरा है. तब मनमें कहा-अभी जाहीर होना अच्छा नहीं. पहिले
यह मालूम करूं कि, कौन यहां आता है और कौन जाता है.
जब ठीक दो पहर दिन हुआ तब एक सिद्ध वहां आया और
बाईंतरफ जो कुआ था उसमेंसे उसने एक तूंबा जल निकाला
जब वह बंदरिया निकल आई तब सिद्धने एक चुल्लू पानी
उसपर डाल दिया तो वह खूबसूरत स्त्री होगई और उस
रूपवती स्त्रीसे योगीने भोग किया. जब तीसरा पहर हुआ
तब योगीने दूसरे कुआसे पानी खींच उसपर छींटा मारा फिर वह
वैसीकी बंदरी बनगई. और दरख्तपर चढी और योगीभी
पहाड़की गुफामें जाकर बैठा और अपना योग करने लगा.
इतनेमें राजाने प्रकट हो चतुराई कर बाँए कुवेसे जल निकाल
उस बंदरीपर छींटा मारा फिर वह ऐसी सुंदरी नारी हुई कि
गोया इंद्रके अखाडेका अप्सरा है. और राजाको देख लाजसे
मुँह फेर लिया. कामके बाण राजाके आन लगे प्रेमकर उसको
अपने पास बिठाया. जब उसने आँखें प्यारकी देखी तब हंस