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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

Singhasan Battisi (Dvatrimshat Puttalika)

पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा

स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

तीसवीं पुतली ३०. ( १८४ )

तीसवीं पुतली ३०. ( १८४ )
आवाज सुनतेही राजा बाहर निकल आया और उसे कहा कि,
तू क्योंकर यहां आया है ? इस वक्त जो तेरी इच्छा होय सो
मुझसे मांग. यह बात राजाके मुंहसे सुन ब्राह्मणने कहा
कि, महाराज ! मैं तमाम पृथ्वी फिर आया हूं पर अपनी
इच्छाका स्थान नहीं पाया कि, जहां मैं बैठकर आराम करूं.
यह सुन राजा हँसकर बोला कि, यह ठांव तुम्हारे माफिक
हो तो लो. यह सुन ब्राह्मणने आशीष दी. और राजा उसे
उस जगहपर बिठा अपने घरको आया. इतनी बात कह पुतली
बोलि कि, सुन राजा भोज ! तू ऐसा धर्मात्मा नहीं इसवास्ते इस
सिंहासनपर मत बैठ. तू अपने मनमें यह विचारता तो
बिना समझे ऐसा इरादा न करता. जो उसकी बराबर हो
वह सिंहासनपर बैठेगा. वह रोजभी इस रीतिमें बीत गया.
राजा पछता पछता अपने मंदिरमें गया. रात तो ज्यों त्यों कटगई
सुबह स्नान पूजाकर फिर वहीं आकर मौजूद हुआ और सिंहासनपर
बैठनेको पांव बढ़ाया इतनेमें रूपवती नाम -
तीसवीं पुतली-
बोली-सुन राजा ! बावले अज्ञानी ऐसा पु
नूने कब किया ? जो सिंहासनपर बैठनेको तैयार होकर आ
अब एक दिनकी बात राजा वीर विक्रमादित्यका मैं तुझे कि

( १८४ ) सिंहासनबत्तीसी.

हूं सो निश्चिंत होके सुन. राजा अपने महलमें एक रातको
आरामसे सोता था. इतनेमें राजाके जीमें कुछ आया कि, एकबारगी
उठकर काछा बांध, ढाल तरवार ले शहरके कूचमें फिरने लगा
और आगे जाकर देखे तो चोर खडा हुए बाते कर रहे हैं.
अपने मतलबकी बातें कर रहे हैं कि, अब किधरको चोरी करने
हम चलें. तब उनमेंसे एक कहने लगा कि, अच्छी साअतमें
चलो तो कुछ माल हाथमें लगे. और साअत चलनेसे
दुःख पाकर खाली हाथ फिर आवेंगे. इस तरहसे सब बाते
उनकी राजाने सुनी और उन्होंनेभी राजाको देखा तब उन-
मैसे एक बोला कि, तू कौन है ? राजाने कहा कि, जो तुम
सोही मै हूं. यह सुनकर उन्होंने राजाकोभी अपने साथ
लगा लिया. और चोरी करनेको चले. आगे जो एक जगह
पहुंचकर एकसे एक पूछने लगा कि, जो अपना अपना मन कहो.
तब एक उनमेंसे बोला कि, मै ऐसा मुहूर्त्त जानता हूं कि
जिसमें यात्रा करनेसे कभी खाली फिर न आवै. दूसरा बोला
मैं सब जानवरोंकी बोलिया समझाताहूं. तीसरा बोला कि,
जिस मंदिरमें जाऊ वहां मुझे कोई न देखे और मैं अपना
कर फिर आऊं. चौथा बोला कि, मेरे पास एक ऐसी चीज
कोई बहुतेरा मुझमारे पर मैं न मरूं. उन चोरोंने ये बातें
जासे पूछा कि, तू क्या विद्या जानता है ? तब वह
कि, मैं यह विद्या जानताहूं कि जहां धन गड़ा है वह

जगह मैं बताऊं, तब उन चोरोंने राजासे कहा कि, चल तू आगे
हम तेरे पीछे हैं. जहां दौलत गड़ी होय सो हमें बता दे. इस
तरह बातें कर आगे राजा पीछे चोर चले हुए राजमह-
लके पीछे बगीचेमें आये. और जिस जगह दौलत राजाकी
गड़ी हुई थी सो उन चोरोंको राजाने बतादी. और उन्होंने
वहां खोदा तो एक तहखानेका दरवाजा निकला. उसे तोड़-
कर अंदर जो देखे तो करोडोंका जबाहिर और अशरफियां
रुपये भरे हैं. तब वह ले पोठे बांध शिरपर धर चले. इतनेमें
एक गदिड़ बोला तब उनमें जो जानवरोंकी भाषा जानता था
वह सुनकर समझ गया. और औरोंसे बोला कि, भाई ! यह
गदड़ बोलता है कि, इस धनके लेनमें कुछ कुशल नहीं. उनमेंसे
एक बोला कि, अपना शकुन तू रहने दे. पाई हुई लक्ष्मी तो हम
नहीं छोड़ते; छोड़ें तो हमारे धर्ममें बट्टा आवै. तब उनमेंसे
दूसरा बोला कि, उठो भाई, धन रत्न तो पाये पर वस्त्र नहीं
मिले इससे कहीं चलकर वहांसे वस्त्र लीजिये. तो फिर
चोरीका नामभी न लीजिये. फिर उनमेंसे एक बोला राजाका
धोबी यहां रहता है उसके घरमें चलकर सेंध दें तो वहां हथहां
तरहके अच्छे अच्छे कपड़े मिल जावेंगे. यह मनसुबा करि
धोबीके पिछवाड़े तो वे गठड़िया रखदीं और जाकर बक्रमा-
घरमें कुन्द लगा दी. इतनेमें उसका गधा देखकर बोल उठा बहुतसे
देखनेके