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सर्वकोश
सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा

स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 182, कुल 190 में से

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पृष्ठ 182

( १८४ ) सिंहासनबत्तीसी.

हूं सो निश्चिंत होके सुन. राजा अपने महलमें एक रातको
आरामसे सोता था. इतनेमें राजाके जीमें कुछ आया कि, एकबारगी
उठकर काछा बांध, ढाल तरवार ले शहरके कूचमें फिरने लगा
और आगे जाकर देखे तो चोर खडा हुए बाते कर रहे हैं.
अपने मतलबकी बातें कर रहे हैं कि, अब किधरको चोरी करने
हम चलें. तब उनमेंसे एक कहने लगा कि, अच्छी साअतमें
चलो तो कुछ माल हाथमें लगे. और साअत चलनेसे
दुःख पाकर खाली हाथ फिर आवेंगे. इस तरहसे सब बाते
उनकी राजाने सुनी और उन्होंनेभी राजाको देखा तब उन-
मैसे एक बोला कि, तू कौन है ? राजाने कहा कि, जो तुम
सोही मै हूं. यह सुनकर उन्होंने राजाकोभी अपने साथ
लगा लिया. और चोरी करनेको चले. आगे जो एक जगह
पहुंचकर एकसे एक पूछने लगा कि, जो अपना अपना मन कहो.
तब एक उनमेंसे बोला कि, मै ऐसा मुहूर्त्त जानता हूं कि
जिसमें यात्रा करनेसे कभी खाली फिर न आवै. दूसरा बोला
मैं सब जानवरोंकी बोलिया समझाताहूं. तीसरा बोला कि,
जिस मंदिरमें जाऊ वहां मुझे कोई न देखे और मैं अपना
कर फिर आऊं. चौथा बोला कि, मेरे पास एक ऐसी चीज
कोई बहुतेरा मुझमारे पर मैं न मरूं. उन चोरोंने ये बातें
जासे पूछा कि, तू क्या विद्या जानता है ? तब वह
कि, मैं यह विद्या जानताहूं कि जहां धन गड़ा है वह