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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

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DevanagariHindipublished526 pages

About this granth

The Shukraniti (शुक्रनीति), or Shukranitisara, is a Sanskrit treatise on kingship and government ascribed to Shukracharya, the preceptor of the asuras. It covers the duties of the king, the appointment of ministers and officials, the treasury and taxation, justice, forts, the army and the conduct of war, as well as social conduct, town planning and the making of images. Its date is disputed; because it describes firearms (nalika), many scholars regard its present form as relatively late.

This edition gives the Sanskrit verses with a Hindi commentary called Vidyotini. It was first published in Samvat 2025 (1968) by the Chowkhamba Sanskrit Series Office, Varanasi, as No. 185 of the Kashi Sanskrit Granthamala; the commentator is not named in the opening pages. The scan is of a copy from the Mumukshu Bhavan Veda-Vedanga library, Varanasi.

The text runs chapter by chapter; the second chapter, for example, lays down rules on the pay of royal servants, such as setting aside a sixth or a quarter of a servant's wage for him. The volume has 526 pages.

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द्वितीयोऽध्यायः ५६

कर करे। अन्यथा (उचित नियुक्ति न होने से) ये दोनों भयङ्कर रूप से नाशकारी होते हैं।

मुद्रां विनाऽखिलं राजकृत्यं कर्तुं क्षमं सदा ।
कल्पयेद्युवराजार्थमौरसं धर्मपत्निजम् ॥ १४ ॥
स्वक्रनिष्ठं पितृव्यं वाऽनुजं वाऽग्रजसंभवम् ।
पुत्रं पुत्रीकृतं दत्तं यौवराज्येऽभिषेचयेत् ॥ १५ ॥

युवराज के कार्य तथा अभिषेकार्थ युवराज के अधिकारियों का निर्देश—
जो राजा का मोहर लगाने के अतिरिक्त सभी राजकार्य को सदा करने के लिये समर्थ होता है, ऐसे युवराज-पद के लिये धर्मपत्नी में उत्पन्न औरस (साक्षात् अपना) पुत्र चुनना चाहिये अभाव में क्रम से अपना छोटा भाई, चाचा, छोटा भाई और बड़े भाई का पुत्र, पुत्रीकृत (जिसको पुत्र के समान मान लिया जाय) पुत्र अथवा दत्तक पुत्र को चुनकर युवराज नियुक्त करना चाहिये।

क्रमादभावे दौहित्रं स्वस्रीयं वा नियोजयेत् ।
स्वहितायापि मनसा नैतान्संकर्षयेत्क्वचित् ॥ १६ ॥

क्रम से पूर्वोक्त के अभाव में दौहित्र (लड़की का लड़का) या भानजा को युवराज बनाना चाहिये और अपने हित के लिये कभी मन से भी इन सबों को कष्ट न पहुँचाना चाहिये।

स्वधर्मनिरताञ्छूरान् भक्तान्नीतिमतः सदा ।
संरक्षयेद्राजपुत्रान् बालानपि सुयत्नतः ॥ १७ ॥
लोलुभ्यमानास्तेऽर्थेषु हन्युरेनमरक्षिताः ।
रक्ष्यमाणा यदिच्छिद्रं कथंचित्प्राप्नुवन्ति ते ॥ १८ ॥
सिंहशावा इव घ्नन्ति रक्षितारं द्विपं द्रुतम् ।
राजपुत्रा मदोद्भूता गजा इव निरंकुशाः ॥ १९ ॥
पितरं चापि निघ्नन्ति भ्रातरं स्वितरं न किम् ।
मूर्खो बालोऽपीच्छति स्म स्वाम्यं किं नु पुनर्युवा ॥ २० ॥

और स्वधर्म में निरत, शूर, राजभक्त, नीतिशास्त्रज्ञ राजपुत्रों की भलीभाँति सदा रक्षा (रखवाली) करे चाहे वे बालक हों तो भी उनकी विशेष यत्न से रक्षा (रखवाली) करे अर्थात् राजा इन से अपनी प्राणरक्षा करता रहे क्योंकि यद्यपि इनकी रक्षा भलीभाँति की जा रही है तो भी यदि ये किसी प्रकार का छिद्र (मौका) पा जाते हैं और उस समय उनके ऊपर किसी का पहरा नहीं रहता है तो राज्य के लोलुप होने से रक्षक राजा को मार डालते हैं जैसे सिंह के बच्चे रक्षक हाथी को भी शीघ्र मार डालते हैं। और मद से मतवाले निरंकुश हाथी के समान राजपुत्र जब पिता को या भाई को भी मार डालते

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६० | शुक्रनीतिः

हैं तब इतर को क्यों नहीं मारेंगे अर्थात् अवश्य मारेंगे। क्योंकि मूर्ख बालक भी यदि स्वामी (राजा) बनना चाहता है तो फिर युवा (जवान) के विषय में क्या कहना है अर्थात् वह तो अवश्य चाहेगा ही।

स्वात्यन्तसन्निकर्षेण राजपुत्रांस्तु रक्षयेत् ।
सद्भृत्यैश्चापि तत्स्वान्तं छलैर्ज्ञात्वा सदा स्वयम् ॥ २१ ॥

और राजा अपने अत्यन्त सन्निकट में राजपुत्रों को रखते हुये विश्वासी नौकरों के द्वारा, किसी ब्याज से या स्वयं उनके हार्दिक भावों को सदा जानकर तदनुसार उनकी रक्षा का प्रबन्ध करे।

सुनीतिशास्त्रकुशलान् धनुर्वेदविशारदान् ।
क्लेशसहांश्च वाग्दण्डपारुष्यानुभवान् सदा ॥ २२ ॥
शौर्येयुद्धरतान् सर्वकलाविद्याविदोऽजसा ।
सुविनीतान्प्रकुर्वीत ह्यमात्याद्यैर्नृपः सुतान् ॥ २३ ॥

**दुराचारी राजपुत्रों में आचार-स्थापना का निर्देश—**और राजा मन्त्री आदि के द्वारा अपने पुत्रों को सुन्दर नीतिशास्त्र में कुशल, धनुर्वेद विद्या में विशारद, सदा क्लेश सहन करने में समर्थ, वाग्दण्ड की कठोरता का अनुभव करनेवाला, वीरता के साथ युद्ध करने में निरत, वस्तुतः सम्पूर्ण कलाओं तथा विद्याओं का जाननेवाला, अत्यन्त शिक्षित अथवा विनम्र बनावे।

सुवस्त्राद्यैर्भूषयित्वा लालयित्वा सुक्रीडनैः ।
अर्हयित्वाऽऽसनाद्यैश्च पालयित्वा सुभोजनैः ॥ २४ ॥
कृत्वा तु यौवराज्यार्हान् यौवराज्येऽभिषेचयेत् ।
अविनीतकुमारं हि कुलमाशु विनश्यति ॥ २५ ॥

और उन्हें सुन्दर वस्त्रादिकों से अलंकृत, अच्छे खेलों से लालित, अच्छे आसनों पर बैठाने से सम्मानित करते हुये अच्छे २ भोजनों से उनका पालन-पोषण करके युवराज-पद के योग्य हो जाने पर उन्हें युवराज बनावे क्योंकि जिस राजवंश के युवराज अशिक्षित होते हैं वह शीघ्र नष्ट हो जाता है।

राजपुत्रः सुदुर्वृत्तः परित्यागं हि नार्हति ।
क्लिश्यमानः स पितरं परानाश्रित्य हन्ति हि ॥ २६ ॥

और अत्यन्त दुर्वृत्त (दुष्ट आचरणवाला) भी राजपुत्र परित्याग करने के योग्य नहीं होता है क्योंकि क्लेश पाने पर वह शत्रुओं का सहारा लेकर अपने पिता राजा को मार डालता है।

व्यसने सज्जमानं तं क्लेशयेद् व्यसनाश्रयैः ।
दुष्टं गजमिवोद्वृत्तं कुर्वीत सुखबन्धनम् ॥ २७ ॥

यदि कोई राजकुमार द्यूत आदि व्यसन में फंस जाय तो उस व्यसन के

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द्वितीयोऽध्यायः

६१

आश्रयदाताओं के द्वारा उसको क्लेश पहुंचाये पश्चात् किसी भांति समझा-बुझाकर ठीक रास्ते पर लाये, जैसे उच्छृङ्खल दुष्ट हाथी को क्लेश पहुँचाकर सुखपूर्वक बांधा जाता है।

सुदुर्वृत्तांस्तु दायादा हन्तव्यास्ते प्रयत्नतः ।
व्याघ्रादिभिः शत्रुभिर्वा छले राष्ट्रविवृद्धये ॥ २८ ॥
अतोऽन्यथा विनाशाय प्रजाया भूपतेश्च ते ।

जो राजा के दायादवर्गवाले (वंश के लोग) अत्यन्त दुष्ट आचरण करने-वाले हों उन्हें प्रयत्नपूर्वक व्याघ्रादि, शत्रु या छल के द्वारा राज्य की उन्नति के लिये मार डालना चाहिये। इससे अन्यथा करनेपर वे प्रजा तथा राजा के विनाश के कारण होते हैं।

तोषयेयुर्नृपं नित्यं दायादाः स्वगुणैः परः ॥ २९ ॥
भ्रष्टा भवन्त्यन्यथा ते स्वभागाज्जीवितादपि ।

अतः दायादवर्ग के लोग श्रेष्ठ अपने गुणों से राजा को सन्तुष्ट रखें अन्यथा वे अपने हिस्से तथा जीवन से विहीन हो जाते हैं।

स्वसापिण्ड्यविहीना ये ह्यन्योत्पन्ना नराः खलु ॥ ३० ॥
मनसापि न मन्तव्या दत्ताद्याः स्वसुता इति ।
तद्दत्तकत्वमिच्छन्ति दृष्ट्वा यं धनिकं नरम् ॥ ३१ ॥
स्वकुलोत्पन्नकन्यायाः पुत्रस्तेभ्यो वरो ह्यतः ।

जो अपने सापिण्ड्य से विहीन (अपने वंश का नहीं) होकर दूसरे वंश में उत्पन्न हुये मनुष्य दत्तादिपुत्र होते हैं उन्हें मन से नहीं समझना चाहिये कि ये मेरे पुत्र हैं। क्योंकि वे (दत्तादिकपुत्र) जिसको धनी पुरुष देखते हैं उसके दत्तक पुत्र बनने की इच्छा करते हैं अतः उनकी अपेक्षा अपने कुल में उत्पन्न कन्या का पुत्र (दौहित्र) अच्छा होता है।

अङ्गादङ्गात्सम्भवति पुत्रवद् दुहिता नृणाम् ॥ ३२ ॥
पिण्डदाने विशेषो न पुत्रदौहित्रयोस्ततः ।

क्योंकि पुत्र की भांति मनुष्यों के अङ्ग-अङ्ग से कन्या भी उत्पन्न होती है। अतः पिण्डदान में पुत्र और दौहित्र में कोई अन्तर नहीं है अर्थात् दोनों से तृप्ति होती है।

भूप्रजापालनार्थं हि भूपो दत्तं तु पालयेत् ॥ ३३ ॥
नृपः प्रजापालनार्थं सधनश्चेन्न चान्यथा ।

और राजा पृथ्वी तथा प्रजाओं के पालनार्थ दत्तकपुत्र का पालन करे। क्योंकि वह प्रजापालन तथा धन (राज्य) देने के लिये ही दत्तक पुत्र लेता है अन्यथा उसे कोई आवश्यकता नहीं है।

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६२ | शुक्रनीतिः

परोत्पन्ने स्वपुत्रत्वं मत्वा सर्वं ददाति तम् ॥ ३४ ॥
किमाश्चर्यमतो लोके न ददाति यजत्यपि ।

इससे बढ़कर संसार में आश्चर्य का विषय क्या है ? कि जिस धन को न किसी को देता है और न उससे यज्ञ ही करता है, फिर भी उसी धन को दूसरे कुल में उत्पन्न दत्तक पुत्र में अपने पुत्र की भावना करके उसके लिये सम्पूर्ण रूप से त्याग कर देता है ।

प्राप्यापि युवराजत्वं प्राप्नुयाद्विकृति न च ॥ ३५ ॥
स्वसंपत्तिमदान्नैव मातरं पितरं गुरुम् ।
भ्रातरं भगिनीं वापि ह्यान्यान्वा राजवल्लभान् ॥ ३६ ॥
महाजनांस्तथा राष्ट्रे नावमन्येत (पीडयेत् ।

और युवराज-पद को पाकर दत्तक राजकुमार को विकृति नहीं लानी चाहिये अर्थात् बदल नहीं जाना चाहिये । और अपनी सम्पत्ति के मद से माता, पिता, गुरु ( शिक्षक या गुरुजन ), भाई, बहिन या इनसे अन्य राजा के प्रिय ( मन्त्री आदि ) और राज्य में श्रेष्ठजन हैं इनका तिरस्कार न करे और न पीड़ा ही पहुंचावे ।

यदा तु कश्चिज्ज्ञातीनां बाह्यः प्रार्थयते कुलम् ॥ ३७ ॥
न मर्षयन्ति तत्सन्तो बाह्ये नाभिप्रदर्शनम् ।

जब कोई जातियों से बाहर का व्यक्ति कुल की प्रार्थना करता है तो उसके कुलीनता के प्रदर्शन को अच्छे लोग बर्दाश्त नहीं करते ।

प्राप्यापि महतीं वृद्धिं वर्तेत पितुराज्ञया ॥ ३८ ॥
पुत्रस्य पितुराज्ञापि परमं भूषणं स्मृतम् ।

बड़ी भारी तरक्की को पाकर भी पिता की आज्ञानुसार रहे क्योंकि पुत्र के लिये पिता की आज्ञा का पालन करना परम भूषण है ।

भार्गवेण हता माता राघवस्तु वनं गतः ॥ ३९ ॥
पितुस्तपोबलात्तौ तु मातरं राज्यमापतुः ।
शापानुग्रहयोः शक्तो यस्तस्याज्ञा गरीयसी ॥ ४० ॥

पिता की आज्ञा से परशुरामजी ने माता की हत्या की और रामजी वन को गये । किन्तु पिता के तपोबल से पुनः उन दोनों ने क्रम से परशुराम ने माता का पुनरुज्जीवन और राम ने पुनः राज्य-लाभ प्राप्त किया क्योंकि शाप देने और अनुग्रह करने में जो समर्थ हों उनकी आज्ञा सर्वोपरि मान्य होती है ।

सोदरेषु च सर्वेषु स्वस्याधिक्यं न दर्शयेत् ।
भागार्हभ्रातृणां नष्टो ह्यवमानात्सुयोधनः ॥ ४१ ॥

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द्वितीयोऽध्यायः
६३

अपने भाइयों के सामने अपनी महत्ता का प्रदर्शन न करे। क्योंकि दुर्योधन भाग (अंश-हिस्सा) पाने योग्य भाइयों के अपमान से नष्ट हो गया।

पितुराज्ञोल्लङ्घनेन प्राप्यापि पदमुत्तमम्।
तस्माद् भ्रष्टा भवन्तीह दासवद्राजपुत्रकाः ॥ ४२ ॥
ययातेश्च यथा पुत्रा विश्वामित्रसुता यथा।

राजपुत्रों की पिता के विषय में कर्त्तव्यता का निर्देश— राजपुत्र लोग दास की भांति इस लोक में पिता की आज्ञा का उल्लङ्घन करने से उत्तम पद को पाकर भी उससे भ्रष्ट (हीन) हो जाते हैं। जैसे ययाति राजा के पुत्र यदु आदि राज्यभ्रष्ट और विश्वामित्र के पुत्र गण पिता की आज्ञा का उल्लङ्घन करने से उनके शापवश कुत्ते का मांस-भोजन करनेवाले हो गये।

पितृसेवापरस्तिष्ठेत्कायवाङ्मानसैः सदा ॥ ४३ ॥
तत्कर्म नियतं कुर्याद्येन तुष्टो भवेत्पिता।
तन्न कुर्याद्येन पिता मनागपि विषीदति ॥ ४४ ॥

अतः पुत्र को सदा शरीर, वाणी और मनसे पिता की सेवा में तत्पर रहना चाहिये। और जिससे पिता प्रसन्न हों उस कर्म को नियत रूप से करना चाहिये। और उस कर्म को नहीं करना चाहिये जिससे पिता को थोड़ा भी खेद हो।

यस्मिन्पितुर्भवेत्प्रीतिः स्वयं तस्मिन्प्रियं चरेत्।
यस्मिन्द्वेषं पिता कुर्यात्स्वस्यापि द्वेष्य एव सः ॥ ४५ ॥
असंमतं विरुद्धं वा पितुर्नैव समाचरेत्।

जिसके ऊपर पिता का प्रेम है उसके साथ स्वयं भी प्रिय व्यवहार करे। और जिसके साथ पिता द्वेष करे उसके लिये स्वयं भी द्वेषी एवं जो पिता को असंमत या विरुद्ध प्रतीत हो उस व्यवहार को न करे।

चारसूचकदोषेण यदि स्यादन्यथा पिता ॥ ४६ ॥
प्रकृत्यनुमतं कृत्वा तमेकान्ते प्रबोधयेत्।
अन्यथा सूचकाद्भृत्यं महद्दण्डेन दण्डयेत् ॥ ४७ ॥

जासूस या सूचक (चुगुलखोर) के दोष से यदि पिता का भाव अन्यथा (उलट) हो जाय तो प्रकृति के अनुकूल करके एकान्त में उन्हें समझावे। और अन्यथा रीति से सूचना देनेवाले चुगुलखोर या जासूस को भारी दण्ड से दण्डित करे या पिता से सजा दिलावे।

प्रकृतीनां च कपटैः स्वान्तं विद्यात्सदैव हि।
प्रातर्नत्वा प्रतिदिनं पितरं मातरं गुरुम् ॥ ४८ ॥
राजानं स्वकृतं यद्यन्निवेद्यानुदिनं ततः।

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६४शुक्रनीतिः

एवं गृहाविरोधेन राजपुत्रो वसन् गृहे ॥ ४६ ॥

और सदैव प्रकृतियों ( मन्त्री आदि ) के चित्त के भाव को किसी व्याज से समझे। प्रातःकाल प्रतिदिन पिता-माता, गुरु को नमस्कार कर पूर्व जो कुछ प्रतिदिन का अपना किया हुआ कार्य हो उसे राजा से निवेदन करे। इस प्रकार से राजभवन के लोगों के साथ विरोध न रखते हुये राजभवन में राजपुत्र को रहना चाहिये।

विद्यया कर्मणा शीलैः प्रजाः संराजयन्मुदा ।
त्यागी च सत्त्वसम्पन्नः सर्वान्कुर्याद्वशे स्वके ॥ ५० ॥

अपनी विद्या, कर्म तथा शील से प्रसन्नता के साथ प्रजा का मनोरंजन करता हुआ, त्याग (दान) तथा सत्त्व गुण से संपन्न होकर सब लोगों को अपने वश में रक्खें।

शनैः शनैः प्रवर्धेत शुक्लपक्षमृगाङ्कवत् ।
एवंवृत्तो राजपुत्रो राज्यं प्राप्याप्यकंटकम् ॥ ५१ ॥
सहायवान्सहामात्यश्चिरं भुंक्ते वसुन्धराम् ।
समासतः कार्यमुक्तं युवराजस्य यद्धितम् ॥ ५२ ॥

शुक्ल पक्ष की चन्द्रमा की भांति धीरे २ वृद्धि को प्राप्त करे। इस प्रकार आचरण करनेवाला राजपुत्र आगे चलकर अकण्टक राज्य को पाकर सहायकों तथा मन्त्रियों के साथ रहकर चिरकाल तक पृथ्वी का उपभोग करता है इस प्रकार से युवराज के लिये जो हितकर व्यवहार है उसे संक्षेप से कहा गया है।

समासादुच्यते कृत्यममात्यादेश्च लक्षणम् ।
मृदुगुरुप्रमाणत्ववर्णशब्दादिभिः समम् ॥ ५३ ॥

अमात्यादि भृत्यों के विषय में विचार करने का निर्देश— अब मन्त्री की कैसी मृदुता, गम्भीरता, प्रामाणिकता, जाति और वचन इत्यादि है ? इसके साथ उसके लक्षण तथा कृत्य का संक्षेप से वर्णन करते हैं।

परीक्षकैर्द्वावयित्वा यथा स्वर्णं परीक्ष्यते ।
कर्मणा सहवासेन गुणैः शीलकुलादिभिः ॥ ५४ ॥
भृत्यं परीक्षयेन्नित्यं विश्वास्यं विश्वसेत्तदा ।
नैव जातिर्न च कुलं केवलं लक्षयेदपि ॥ ५५ ॥

स्वर्ण की परीक्षा करनेवाले जिस प्रकार गलाकर स्वर्ण की परीक्षा करते हैं उसी प्रकार कर्म, सहवास, चरित्र, कुल आदि गुणों से भृत्य (वेतन पानेवाले अमात्यादि) की सदा परीक्षा करे। उसके बाद यदि विश्वास योग्य हो तो विश्वास करे और केवल जाति या कुल से परीक्षा न करे।

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द्वितीयोऽध्यायः ६५

कर्मशीलगुणाः पूज्यास्तथा जातिकुलेन हि।
न जात्या न कुलेनैव श्रेष्ठत्वं प्रतिपद्यते ॥ ५६ ॥
विवाहे भोजने नित्यं कुलजातिविवेचनम्।

जैसा कर्म, शील तथा गुण से मनुष्य पूजनीय होता है वैसा जाति और कुल से नहीं क्योंकि श्रेष्ठता जाति या कुल से ही नहीं पाई जाती है और कुल तथा जाति का विचार तो केवल विवाह तथा भोजन में किया जाता है।

सत्यवान् गुणसम्पन्नस्तथाऽभिजनवान्धनी ॥ ५७ ॥
सुकुलश्च सुशीलश्च सुकर्मा च निरालसः।
यथा करोत्यात्मकार्यं स्वामिकार्यं ततोऽधिकम् ॥ ५८ ॥
चतुर्गुणेन यत्नेन कायवाङ्मानसेन च।
भृत्या च तुष्टो मृदुवाक्कार्यदक्षः शुचिर्दृढः ॥ ५९ ॥
परोपकरणे दक्षो ह्यपकारपराङ्मुखः।
स्वाम्यागस्कारिणं पुत्रं पितरं चापि दर्शकः ॥ ६० ॥
अन्यायगामिनि पतौ यतद्रूपः सुबोधकः।
नाचेष्टा तद्गिरं कांचिन्तन्न्यूनस्याप्रकाशकः ॥ ६१ ॥
अदीर्घसूत्रः सत्कार्ये ह्यसत्कार्ये चिरक्रियः।
न तद्भार्यापुत्रमित्रच्छिद्रदर्शी कदाचन ॥ ६२ ॥
तद्वद् बुद्धिस्तदीयेषु भार्यापुत्रादिबन्धुषु।
न श्लाघते स्पर्धते न नाभ्यसूयति निन्दति ॥ ६३ ॥
नेच्छत्यन्याधिकारं हि निःस्पृहो मोदते सदा।
तद्दत्तवस्त्रभूषादिधारकस्तत्पुरोऽनिशम् ॥ ६४ ॥
भृतितुल्यव्ययी दान्तो दयालुः शूर एव हि।
तत्कार्यस्य रहसि सूचको भृतको वरः ॥ ६५ ॥
विपरीतगुणैरेभिर्भृतको निन्य उच्यते।

श्रेष्ठ भृत्य के लक्षण— सत्य बोलनेवाला, गुणों से युक्त, उच्च वंश में उत्पन्न, धनी, निर्दोष कुलवाला, सुशील, उत्तम कर्म करनेवाला, आलस्यरहित, जिस भांति अपने कार्य में यत्न करता है उससे अधिक कायिक, वाचिक तथा मानसिक चौगुने यत्न के साथ स्वामी का कार्य करनेवाला, केवल वेतन मात्र से ही सन्तुष्ट रहनेवाला, मधुरभाषी, कार्य करने में चतुर, पवित्र चित्त-वाला, कार्य करने में स्थिर विचार रखनेवाला, परोपकार करने में निपुण, अपकार से विमुख रहनेवाला, स्वामी के साथ अपराध करने में प्रवृत्त उनके पुत्र तथा पिता के ऊपर भी निगाह रखनेवाला अर्थात् वे स्वामी का अपराध न कर सकें:

५ शु०

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६६ | शुक्रनीतिः

ऐसा यत्न करनेवाला, अन्याय-पथ पर चलनेवाले स्वामी को सत्पथ पर चलाने में यत्नशील, स्वामी के किसी बातों पर आक्षेप नहीं करनेवाला, और उनकी त्रुटियों को देखकर कभी किसी के सामने प्रकाशित न करनेवाला, अच्छे कार्यों में जल्दी और बुरे कार्यों में देर लगाकर कार्य करनेवाला, स्वामी के भार्या, पुत्र, मित्र के छिद्रों (दोषों) को कभी नहीं देखनेवाला (नहीं प्रकाश करनेवाला), और स्वामी के सम्बन्धियों के भार्या, पुत्र आदि बन्धुजनों के विषय में स्वामी जैसा आदर-सम्मान करते हों वैसा ही बुद्धि रखकर उन सबों के साथ व्यवहार करनेवाला, और स्वयं अपनी प्रशंसा नहीं करनेवाला एवं स्वामी या स्वामी के सम्बन्धी जनों के साथ स्पर्धा या उनके गुणों में दोषारोप या निन्दा नहीं करनेवाला, दूसरे के अधिकार पाने की लालसा नहीं रखनेवाला, निस्पृह होकर सदा प्रसन्न रहनेवाला, स्वामी के समक्ष उसके दिये हुये वस्त्र तथा भूषणादि को सदा धारण करनेवाला, वेतन के अनुसार अपना व्यय करनेवाला, इन्द्रियों का दमन करनेवाला, दयालु, शूर और स्वामी के अनुचित कार्य को एकान्त में उसके सामने सूचित करनेवाला भृत्य (मन्त्री आदि) श्रेष्ठ कहलाता है। और उपरलिखित गुणों से विपरीत गुणोंवाला भृत्य निन्द्य कहलाता है।

ये भृत्या हीनभृतिका ये दण्डेन प्रकर्षिताः ॥ ६६ ॥
शठाश्च कातरा लुब्धाः समक्षप्रियवादिनः ।
मत्ता व्यसनिनश्चार्ता उत्कोचेष्टाश्च देविनः ॥ ६७ ॥
नास्तिका दाम्भिकाश्चैवासत्यवाचोऽप्यसूयकाः ।
ये चापमानिता येऽसद्वाक्यैर्मर्मणि भेदिताः ॥ ६८ ॥
रिपोर्मित्राः सेवकाश्च पूर्ववैरानुबन्धिनः ।
चण्डाः साहसिका धर्महीना नैते सुसेवकाः ॥ ६९ ॥
संक्षेपतस्तु कथितं सदसद्भृत्यलक्षणम् ।

निन्द्यभृत्य के लक्षण— जो भृत्य स्वल्प वेतन पानेवाले, निरन्तर अपराध करने से दण्ड द्वारा अत्यन्त पीड़ित किये, शठ, कायर, लोभी, सामने प्रिय बोलनेवाले, मद्य पीकर मतवाले हुये, शिकार आदि के व्यसनी, रोगी, घूस लेनेवाले, जूआ खेलनेवाले, नास्तिक, दाम्भिक, झूठे, गुणों में दोषारोप करनेवाले, अपमानित, कठोर वाक्यों से मर्म में पीड़ा पहुँचाये गये, शत्रुओं के मित्र या सेवक, पूर्व वैर को मन में रखनेवाले, अत्यन्त क्रोधी, बिना विचारे सहसा कार्य करनेवाले या धर्म से हीन होते हैं वे सुन्दर सेवक नहीं होते हैं अर्थात् ये निन्द्य भृत्यों के लक्षण हैं। इस प्रकार से संक्षेप में अच्छे-बुरे सेवकों के लक्षण कहे गये।

समासतः पुरोधादिलक्षणं यत्तदुच्यते ॥ ७० ॥

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द्वितीयोऽध्यायः
६७

पुरोधाश्च प्रतिनिधिः प्रधानः सचिवस्तथा।
मन्त्री च प्राड्विवाकश्च पण्डितश्च सुमन्त्रकः॥ ७१ ॥
अमात्यो दूत इत्येता राज्ञः प्रकृतयो दश।
दशमाशाधिकाः पूर्वं दूतान्ताः क्रमशः स्मृताः॥ ७२ ॥

दस प्रकृतियों के नाम— अब पुरोहित आदि के जो लक्षण हैं उन्हें संक्षेप से कहते हैं। पुरोहित, प्रतिनिधि, प्रधान, सचिव, मन्त्री, प्राड्विवाक, पण्डित, सुमन्त्रक, अमात्य, दूत ये दस राजा के 'प्रकृति' (राज्य चलाने में प्रधान कारण) कहलाते हैं। और पुरोधा से लेकर दूतपर्य्यन्त इन दशों के वेतन पूर्व-पूर्व एक दूसरे की अपेक्षा दशमांश अधिक होते हैं। अर्थात् दूत से दश-मांश अधिक अमात्य का, उससे दशमांश अधिक सुमन्त्रक का, उससे दशमांश अधिक पण्डित का, उससे दशमांश अधिक प्राड्विवाक का, उससे दशमांश अधिक मन्त्री का, उससे दशमांश अधिक सचिव का, उससे दशमांश अधिक प्रधान का, उससे दशमांश अधिक प्रतिनिधि का, उससे दशमांश अधिक पुरोधा का वेतन होता है, जो सबसे अधिक होता है।

अष्टप्रकृतिभिर्युक्तो नृपः कैश्चित्स्मृतः सदा।
सुमन्त्रः पण्डितो मन्त्री प्रधानः सचिवस्तथा॥ ७३ ॥
अमात्यः प्राड्विवाकश्च तथा प्रतिनिधिः स्मृतः।
एता वृत्तिसमास्त्वष्टौ राज्ञः प्रकृतयः सदा॥ ७४ ॥

आठ प्रकृतियों के नाम— और किसी के मत से—राजा सदा ८ प्रकृतियों से युक्त होता है जो कि इस क्रम से हैं—सुमन्त्र, पण्डित, मन्त्री, प्रधान, सचिव, अमात्य, प्राड्विवाक, प्रतिनिधि। ये ८ राजा की प्रकृतियां सदा वेतन में परस्पर समान हैं अर्थात् इनके पूर्वमत की भांति भिन्न-भिन्न वेतन नहीं है।

इङ्गिताकारतत्त्वज्ञो दूरस्तदनुगः स्मृतः।

और इङ्गित (हृद्गतभाव) तथा आकार (शरीर की चेष्टायें) इन दोनों के तत्त्व को जाननेवाला एवं राजा या सुमन्त्र आदि ८ प्रकृतियों के आज्ञानुसार कार्य करनेवाला दूत साधारण नौकरमात्र है अतः इस मत में प्रकृति के अन्दर इसकी गणना नहीं की गई।

पुरोधाः प्रथमं श्रेष्ठः सर्वेभ्यो राजराष्ट्रभृत्॥ ७५ ॥
तदनु स्यात्प्रतिनिधिः प्रधानस्तदनन्तरम्।
सचिवस्तु ततः प्रोक्तो मन्त्री तदनु चोच्यते॥ ७६ ॥
प्राड्विवाकस्ततः प्रोक्तः पण्डितस्तदनन्तरम्।
सुमन्त्रस्तु ततः ख्यातो ह्यमात्यस्तु ततः परम्॥ ७७ ॥
दूतस्ततः क्रमादेते पूर्वश्रेष्ठा यथागुणाः।

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६८शुक्रनीतिः

पुरोहितादिकों के अधिकार— पूर्वमतानुसार प्रथम जो पुरोधा (पुरोहित) है वह अन्य प्रतिनिधि आदि प्रकृतियों की अपेक्षा अधिक श्रेष्ठ है क्योंकि शास्त्रोक्त पूजन अनुष्ठान के द्वारा विघ्ननाश करने से राजा तथा राज्य की रक्षा करनेवाला होता है। उससे कम प्रतिनिधि, प्रतिनिधि से कम प्रधान, प्रधान से कम सचिव, सचिव से कम मन्त्री, मन्त्री से कम प्राड्विवाक, प्राड्विवाक से कम पण्डित, पण्डित से कम सुमन्त्र, सुमन्त्र से कम अमात्य, अमात्य से कम दूत श्रेष्ठ है। ये सब क्रम से अपने-अपने गुणानुसार पूर्व-पूर्व श्रेष्ठ होते हैं।

मन्त्रानुष्ठानसम्पन्नस्त्रैविद्यः कर्मतत्परः ॥ ७८ ॥
जितेन्द्रियो जितक्रोधो लोभमोहविवर्जितः ।
षडङ्गवित्सांगधनुर्वेदवित्पार्थधर्मवित् ॥ ७९ ॥
यत्कोपभीत्या राजापि धर्मनीतिरतो भवेत् ।
नीतिशास्त्रास्त्रव्यूहादिकुशलस्तु पुरोहितः ॥ ८० ॥
सैवाचार्यः पुरोधा यः शापानुग्रहयोः क्षमः ।

पुरोहितादिकों के लक्षण— यथाविधि मन्त्रों के अनुष्ठान द्वारा कार्य को सिद्ध करनेवाला, तीनों (ऋग्, यजु, साम) वेदों का जाननेवाला, कार्य करने में शीघ्रता करनेवाला, जितेन्द्रिय, क्रोध को जीतनेवाला, लोभ तथा मोह से रहित, षडङ्ग (वेद के व्याकरण, शिक्षा, कल्प, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष इन छह अङ्गों) का जाननेवाला, साङ्गोपाङ्ग धनुर्वेद का ज्ञाता, अर्थ तथा धर्म को जाननेवाला एवं जिसके कोप के भय से राजा भी धर्म तथा नीति में रत रहता है ऐसा नीतिशास्त्र, शस्त्रास्त्र चलाने की कला एवं व्यूहरचना में कुशल पुरोहित को होना चाहिये और पुरोहित को ही आचार्य भी कहते हैं। यह शाप तथा अनुग्रह (वर) दोनों के देने में समर्थ भी होता है।

बिना प्रकृतिसन्मन्त्राद्राज्यनाशो भवेद्ध्रुवम् ॥ ८१ ॥
रोधनं न भवेत्तस्माद्राज्ञस्ते स्युः सुमन्त्रिणः ।

पूर्वोक्त पुरोहित आदि प्रकृतियों के साथ बिना अच्छी मन्त्रणा (सलाह) किये राजा यदि कोई कार्य करता है तो राज्य का नाश निश्चय हो जाता है। एवं राजा का रोधन (कुमार्ग से रोकना) नहीं हो सकता है। इसलिये उन सब पुरोहितादि प्रकृतियों को अच्छा सलाह देनेवाला होना उचित है।

न बिभेति नृपो येभ्यस्तैः स्यात् किं राज्यवर्धनम् ॥ ८२ ॥
यथालंकारवस्त्राद्यैः स्त्रियो भूष्यास्तथा हि ते ।

जिन पुरोहितादि प्रकृतियों से राजा न डरे उनसे क्या राज्य की वृद्धि हो सकती है ? कदापि नहीं। जैसे अलंकार-वस्त्र आदि से स्त्रियां केवल सुशोभित होती हैं वैसे ही अच्छी सलाह न देने वाले उन पुरोहितादि प्रकृतियों से राजा

द्वितीयोऽध्यायः ६९

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द्वितीयोऽध्यायः ६९

का केवल शोभामात्र ही है अतः वे पुरोहितादि केवल शोभादायक हैं उनसे राज्य को कोई लाभ नहीं है ।

राज्यं प्रजा बलं कोशः सुन्नृपत्वं न वर्धितम् ॥ ८३ ॥
यन्मन्त्रतोऽरिनिग्रस्तैर्मन्त्रिभिः किं प्रयोजनम् ।

जिनकी सलाह से राजा का राज्य, प्रजा, सेना, कोश और राजा के सुन्दर भावों की अभिवृद्धि न हो तो उन मन्त्री आदियों से क्या प्रयोजन । अर्थात् वे सब व्यर्थ हैं।

कार्याकार्यप्रविज्ञाता स्मृतः प्रतिनिधिस्तु सः ॥ ८४ ॥
सर्वदर्शी प्रधानस्तु सेनाबित्सचिवस्तथा ।

क्या करने योग्य है ? क्या नहीं करने योग्य है ? इसको भलीभांति जाननेवाला जो होता है वह ‘प्रतिनिधि’ कहलाता है और सब कार्यों का निरीक्षण करनेवाला ‘प्रधान’ एवं सैन्य-संचालन का भलीभांति जाननेवाला ‘सचिव’ कहलाता है।

मन्त्री तु नीतिकुशलः पण्डितो धर्मतत्त्ववित् ॥ ८५ ॥
लोकशास्त्रनयज्ञस्तु प्राड्विवाकः स्मृतः सदा ।

नीतिशास्त्र के जानने एवं तदनुसार कार्य करने में जो कुशल है वह ‘मन्त्री’ कहलाता है। और धर्म के तत्त्व को जाननेवाला ‘पण्डित’ एवं सदा लोक-व्यवहार तथा शास्त्रोक्त व्यवहार को जाननेवाला ‘प्राड्विवाक’ कहलाता है ।

देशकालप्रविज्ञाता ह्यमात्य इति कथ्यते ॥ ८६ ॥
आयव्ययप्रविज्ञाता सुमन्त्रः स च कीर्तितः ।

देश और काल के विषय को अच्छी तरह जो जाननेवाला है वह ‘अमात्य’ एवं आय (अर्थागम) और व्यय (अर्थ का खर्च) के कार्यों को सुचारु रूप से जो जाननेवाला है वह ‘सुमन्त्र’ कहलाता है।

इङ्गिताकारचेष्टज्ञः स्मृतिमान्देशकालवित् ॥ ८७ ॥
षाड्गुण्यमन्त्रविद्वाग्मी वीतभीर्दूंत इष्यते ।

हृद्गतभाव तथा चेष्टा को समझनेवाला, उत्तम स्मरणशक्तिवाला, देश-कालानुरूप कर्त्तव्य कर्म को जाननेवाला, सन्धि, विग्रह, यान (चढ़ाई करना), आसन (किले आदि में रहकर लड़ना), द्वैधीभाव (ऊपर से शत्रुओं से मिलकर भीतर-भीतर उनसे दुश्मनी रखना), समाश्रय (सबल का आश्रय लेना), इन सबों के विषय में उचित मन्त्र (विचार) का जाननेवाला, बोलने में चतुर, नहीं डरनेवाला ‘दूत’ कहलाता है।

अहितं चापि यत्कार्यं सद्यः कर्तुं यदोचितम् ॥ ८८ ॥

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७० | शुक्रनीतिः

अकर्तुं यद्धितमपि राज्ञ प्रतिनिधिः सदा ।
बोधयेत्कारयेत्कुर्यान्न कुर्यान्न प्रबोधयेत् ॥ ८९ ॥

प्रतिनिधि का कार्य— प्रतिनिधि का यह कर्तव्य है कि वह सदा जो कार्य अहितकर भी है किन्तु जिस समय उसी को शीघ्रता के साथ करना उचित हो उसे राजा से कहे और करावे तथा स्वयं करे एवं जो हितकर भी कार्य है किन्तु जिस समय उसका करना अनुचित है, उसे न राजा से करने के लिये कहे और न करावे एवं स्वयं भी न करे।

सत्यं वा यदि वाऽसत्यं कार्यजातं च यत्किल ।
सर्वेषां राजकृत्येषु प्रधानस्तद्विचिन्तयेत् ॥ ९० ॥

प्रधान का कृत्य— प्रधान का कृत्य यह है कि वह सभी राजकार्यों में कौन २ कार्य सत्य हैं और कौन २ असत्य हैं इसका विचार करे।

गजानां च तथाऽश्वानां रथानां पदगामिनाम् ।
सुहृदानां तथोष्ट्राणां वृषाणां सद्य एव हि ॥ ९१ ॥
वाद्यभाषासु संकेतव्यूहाभ्यसनशालिनाम् ।
प्राक्प्रत्यग्गामिनां राज्यचिह्नशस्त्रास्त्रधारिणाम् ॥ ९२ ॥
परिचारगणानां हीनमध्योत्तमकर्मणाम् ।
अस्त्राणामस्त्रजातीनां संघः स्वतुरगीगणः ॥ ९३ ॥
कार्यक्षमश्च प्राचीनः साद्यस्कः कति विद्यते ।
कार्यासमर्थः कत्यस्ति शस्त्रगोलाग्निचूर्णयुक् ॥ ९४ ॥
सांग्रामिकश्च कत्यस्ति संभारस्तान्विचिन्त्य च ।
सचिवश्चापि तत्कार्यं राज्ञे सम्यग् निवेदयेत् ॥ ९५ ॥

सचिव के कृत्य— 'सचिव' का कृत्य यह है कि—हाथी, घोड़े, रथ, पैदल सैनिक, सुहृद् ऊँट, विदेशी भाषाओं में संकेत और व्यूहरचना का सतत अभ्यास करनेवाले (अभिज्ञ), पूर्व तथा पश्चिम दिशा के देशों में जानेवाले, मध्यम तथा उत्तम श्रेणी के कार्य करनेवाले, राजचिह्न (झण्डा-निशान), शस्त्र तथा अस्त्र के धारण करनेवाले ऐसे परिचारकगण एवं अस्त्र तथा अस्त्रों के चलाने के नियमों को विचारकर उपर्युक्त इन सबों में तत्काल कितने हैं और उनकी क्या दशा है और कार्य में आने योग्य प्राचीन तथा नवीन घुड़सवार कितने हैं तथा कार्य में नहीं आने योग्य कितने हैं। शस्त्र, गोला, बारूद इन सबों से युक्त लड़ाई की सामग्री कितनी है ? इन सबों को विचार कर राजा से उक्त सभी कार्यों को यथार्थ रूप से लिखित निवेदन करे।

साम दानञ्च भेदश्च दण्डः केषु कदा कथम् ।
कर्तव्यः किं फलं तेभ्यो बहुमध्यं तथाऽल्पकम् ॥ ९६ ॥

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द्वितीयोऽध्यायः ७१

एतत्संचिन्त्य निश्चित्य मन्त्री सर्वं निवेदयेत् ।
मन्त्री के कार्य— मन्त्री का कर्तव्य यह है कि—वह किन विषयों में कब, किस प्रकार से सन्धि, दान, भेद और विग्रह करना चाहिये एवं उससे क्या फल होगा ? और वह अधिक, मध्यम या अल्प होगा, इन सबों का विचार कर राजा से निवेदन करे ।

साक्षिभिर्लिखितैर्भोगैश्छलैर्भूतैश्च मानुषान् ॥ ९७ ॥
स्वानुत्पादितसंप्राप्तव्यवहारान्विचिन्त्य च ।
दिव्य-संसाधनाद्वापि केषु किं साधनं परम् ॥ ९८ ॥
युक्तिप्रत्यक्षानुमानोपमानैर्लोकशास्त्रतः ।
बहुसम्मतसंसिद्धान्विनिश्चित्य सभास्थितः ॥ ९९ ॥
ससभ्यः प्राड्विवाकस्तु नृपं सम्बोधयेत्सदा ।

प्राड्विवाक के कार्य— ‘प्राड्विवाक’ का कर्तव्य यह है कि—वह (विचारपति) सभा में स्थित हो, सभ्यों (जूरियों) के साथ मिलकर साक्षी (गवाह) एवं लेखक के द्वारा सत्य या छल से युक्त मनुष्यों को एवं अपनी इच्छा से पैदा किये हुये या यथार्थ रूप से उपस्थित किये गये विवादों को विचार कर उनमें से किसी का साक्षी या लेखक के अभाव में दिव्यसाधनों (अग्निपरीक्षा आदि) से एवं किसी का बहुत लोगों की सम्मति से तथा किसी में कौन प्रमाण उचित होगा इसका प्रत्यक्ष, अनुमान, दृष्टान्त तथा लोकशास्त्र से विचार कर जो निर्णय हो उसे राजा से सदा निवेदन करे ।

वर्तमानाश्च प्राचीना धर्माः के लोकसंश्रिताः ॥ १०० ॥
शास्त्रेषु के समुद्दिष्टा विरुध्यन्ते च केऽधुना ।
लोकशास्त्रविरुद्धाः के पण्डितस्तान्विचिन्त्य च ॥ १०१ ॥
नृपं संबोधयेत्तैश्च परत्रेह सुखप्रदैः ।

पण्डित के कार्य— पण्डित का कर्तव्य यह है कि—वह प्रजागण इस समय प्राचीन या नवीन में से किस धर्म का पालन कर रहे हैं और किस धर्म का शास्त्र में निर्दिष्ट होने पर भी आदर नहीं कर रहे हैं और कौन से उनके प्रचलित धर्म शास्त्र-विरुद्ध पड़ रहे हैं, इन सबों को विचार कर जो इस लोक तथा पर लोक में सुखप्रद धर्म हैं उन्हें राजा से निवेदन करे ।

इयच्च संचितं द्रव्यं वत्सरेऽस्मिंस्तृणादिकम् ॥ १०२ ॥
व्ययीभूतमियच्चैव शेषं स्थावरजंगमम् ।
इयदस्तीति वै राज्ञे सुमन्त्रो विनिवेदयेत् ॥ १०३ ॥

सुमन्त्र के कार्य— सुमन्त्र का कर्तव्य यह है कि—वह इस वर्ष में तृणादिक स्थायी तथा अस्थायी द्रव्य का इतना संचय हुआ या और उसमें से

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७२ | शुक्रनीतिः

इतना व्यय हुआ और अब इतना बचा हुआ है। इसे राजा से निवेदन करे।

पुराणि च कति ग्रामा अरण्यानि च सन्ति हि ।
कर्षिता कति भूः केन प्राप्तो भागस्ततः कति ॥ १०४ ॥
भागशेषं स्थितं कस्मिन्कत्यकृष्टा च भूमिका ।
भागद्रव्यं वत्सरेऽस्मिञ्छुल्कदण्डादिजं कति ॥ १०५ ॥
अकृष्टपच्यं कति च कति चारण्यसंभवम् ।
कति चाकरसंजातं निधिप्राप्तं कतीति च ॥ १०६ ॥
अस्वामिकं कति प्राप्तं नाष्टिकं तस्कराहृतम् ।
संचितं तु विनिश्चित्यामात्यो राज्ञे निवेदयेत् ॥ १०७ ॥
समासाल्लक्षणं कृत्यं प्रधानदशकस्य च ।

अमात्य के कार्य— अमात्य का कर्त्तव्य यह है कि—वह—राज्य में कितने नगर, ग्राम या जंगल हैं ? किसने कितनी भूमि जोती है ? और उससे कितना उसने धान्य पाया ? किस क्षेत्र ( खेत ) में कितना भाग बचा है ? कितनी भूमि बिना जुती है ? और इस देश में प्रतिवर्ष शुल्क ( मालगुजारी ), और अपराधियों के दण्ड से ( जुर्माना ) आदि से प्राप्त भाग द्रव्य ( राजा के अंश का द्रव्य ) कितना है ? बिना जुती भूमि में होने वाला सस्यादि कितना है ? जंगल से मिलने वाला द्रव्य कितना है ? खान से निकलने वाला द्रव्य कितना है ? गली आदि में पड़ी हुई अतएव अज्ञात-स्वामी वाली वस्तु कितनी है ? बिना स्वामी ( लावारिस ) का द्रव्य कितना है, हरण किया हुआ द्रव्य कितना है ? और चोरों से दण्ड रूप में प्राप्त धन कितना है ? इन सबों की संख्या जोड़कर राजा से निवेदन करे। इस प्रकार से संक्षेप में पुरोहितादि प्रकृतियों का कृत्य कहा गया।

उक्तं तल्लिखितैः सर्वं विद्यात्तदनुदर्शिभिः ॥ १०८ ॥
परिवर्त्य नृपो ह्येतान्युञ्ज्यादन्योऽन्यकर्मणि ।

राजा के अन्योन्य के स्थान पर अन्योन्य की योजना का निर्देश— राजा पूर्वोक्त पुरोहितादिकों के लिये विहित कार्यों को जुबानी एवं उनके लेखों द्वारा जाने। और उन सबों को समय २ पर योग्यतानुसार एक दूसरे के पदों पर नियुक्त करता रहे। अर्थात् कभी सुमन्त्र को अमात्य पद पर एवं अमात्य को सुमन्त्र पद पर बदली करता रहे।

न कुर्यात्स्वाधिकबलान् कदापि ह्यधिकारिणः ॥ १०९ ॥
परस्परं समबलाः कार्याः प्रकृतयो दश ।

राज्य के उक्त अधिकारी पुरुषों को कभी अपने अधिकार से अधिक शक्ति

द्वितीयोऽध्यायः ७३

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द्वितीयोऽध्यायः ७३

-प्रवर्द्धान न करने दे । और पूर्वोक्त १० प्रकृतियों को परस्पर समबल वाला बनाये रखे, किसी को उभरने न दे ।

एकस्मिन्नधिकारे तु पुरुषाणां त्रयं सदा ॥ ११० ॥
नियुञ्जीत प्राज्ञतमं मुख्यमेकन्तु तेषु वै ।
द्वौ दर्शकौ तु तत्कार्ये हायनैस्तन्निवर्तनम् ॥ १११ ॥
त्रिभिर्वा पञ्चभिर्वापि सप्तभिर्दशभिश्च वा ।
दृष्ट्वा तत्कार्यकौशल्ये तथा तं परिवर्तयेत् ॥ ११२ ॥

**अधिकार की व्यवस्था का निर्देश—**राजा एक अधिकार (पद) पर तीन पुरुषों की नियुक्ति करे और उनमें से जो एक अत्यन्त बुद्धिमान हो उसे मुख्य और शेष दो को दर्शक (सहायक) बनाये । और ३, ५, ७, और १० वर्षों पर उन दोनों के कार्य तथा निपुणता को देखकर तदनुसार परिवर्तन करे ।

नाधिकारं चिरं दद्याद्यस्मै कस्मै सदा नृपः ।
अधिकारे क्षमं दृष्ट्वा ह्यधिकारे नियोजयेत् ॥ ११३ ॥

**अधिकार-योग्य को अधिकार देने का निर्देश—**राजा सदा चाहे जो हो उसे किसी अधिकार (पद) पर ज्यादा दिन तक न रहने दे अधिकार के लिये समर्थ देखकर उसे किसी अधिकार पर रखे ।

अधिकारमदं पीत्वा को न मुह्येत्पुनश्चिरम् ।

अधिकाररूपी मद पीकर कौन नहीं प्रमत्त हो जाता है। अतः चिरकाल तक एक ही अधिकार पर न रहने दे ।

अतः कार्यक्षमं दृष्ट्वा कार्येऽन्ये तं नियोजयेत् ॥ ११४ ॥

अतः उस कर्मचारी को कार्य करने में समर्थ देखकर एक कार्य से दूसरे कार्य पर नियुक्त कर दे ।

तत्कार्ये कुशलं चान्यं तत्पदानुगतं खलु ।
नियोजयेद्वर्तने तु तदभावे तथा परम् ॥ ११५ ॥
तद्गुणो यदि तत्पुत्रस्तत्कार्ये तं नियोजयेत् ।

**योग्य अधिकारी के अभाव में अन्य की योजना का निर्देश—**और कार्य चलने के लिये उस पद पर स्थित (असिष्टण्ट) अन्य जन को जो उस कार्य के करने में कुशल हो—नियुक्त करे । उसके अभाव में दूसरे को नियुक्त करे । यदि कर्मचारी का पुत्र पिता के तुल्य कार्य करने वाला हो तो उसके कार्य पर उसी की नियुक्ति करे ।

यथा यथा श्रेष्ठपदे ह्यधिकारी यदा भवेत् ॥ ११६ ॥
अनुक्रमेण संयोज्यो ह्यन्ते तं प्रकृतिं नयेत् ।

जब कोई नया कर्मचारी जैसे २ अपने से श्रेष्ठ पद के योग्य होता जाय

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७४ : शुक्रनीतिः

वैसे २ अनुक्रम से ( उत्तरोत्तर ) श्रेष्ठ पद पर उसे नियुक्त करे। अन्त में प्रधान पद पर नियुक्त करे।

अधिकारबलं दृष्ट्वा योजयेद्दर्शकान् बहून् ॥ ११७ ॥
अधिकारिणमेकं वा योजयेद्दर्शकैर्विना ।

अधिकार ( कार्य ) की गुरुता ( अधिकता ) समझ कर उसके अनुरूप बहुत से उस कार्य के देखने वाले नियुक्त करे। अथवा बिना दर्शकों के भी केवल एक ही अधिकारी की नियुक्ति करे।

ये चान्ये कर्मसचिवास्तान् सर्वान् विनियोजयेत् ॥ ११८ ॥
गजाश्वरथपादातपशूष्ट्रमृगपक्षिणाम् ।
सुवर्णरत्नरजतवस्त्राणामधिपान् पृथक् ॥ ११९ ॥
वित्तानामधिपं धान्याधिपं पाकाधिपं तथा ।
आरामाधिपतिं चैव सौधगेहाधिपं पृथक् ॥ १२० ॥
सम्भारपं देवतुष्टिपतिं दानपतिं सदा ।

अन्य कर्मों के सचिव की योजना का निर्देश— और जो उक्त दश प्रकृतियों ( प्रधानों ) से अन्य अधिकारी कार्य करने में समर्थ हों उन्हें योग्यतानुसार हाथी घोड़ा, रथ, पैदल सेना, पशु, ऊंट, मृग, पक्षी, सुवर्ण, रत्न, चांदी, वस्त्र इन सबों के पृथक् २ स्वामी ( अधिकारी ), एवं धनाध्यक्ष ( पाठान्तर वितानाद्यधिपम् = शामियाना आदि का स्वामी ), धान्याधिप, पाकशाला का अध्यक्ष, बगीचों का अध्यक्ष, राजोचित तथा साधारण गृहों का अध्यक्ष, देवसेवा ( मन्दिरादि ) का अध्यक्ष, सेनाध्यक्ष पद पर सदा नियुक्त करे।

साहसाधिपतिं चैव ग्रामनेतारमेव च ॥ १२१ ॥
भागहारं तृतीयं तु लेखकं च चतुर्थकम् ।
शुल्क्रमाहं पञ्चमं च प्रतिहारं तथैव च ॥ १२२ ॥
षट्कमेतन्नियोक्तव्यं ग्रामे ग्रामे पुरे पुरे ।

दण्डाधिपति आदि ६ की योजना का निर्देश— और साहसाध्यक्ष ( संग्राम आदि साहस कर्मों के अध्यक्ष ), ग्राम का अध्यक्ष, भागहार ( प्रजाओं से कर वसूल करने वाला ), लेखक, शुल्क ( व्यवसायादि पर लगे टैक्स ) को वसूल करने वाला, द्वारपाल इन ६ कर्मचारियों की प्रत्येक नगर और ग्राम में नियुक्ति करे।

तपस्विनो दानशीलाः श्रुतिस्मृतिविशारदाः ॥ १२३ ॥
पौराणिकाः शास्त्रविदो दैवज्ञा मान्त्रिकाश्च ये ।
आयुर्वेदविदः कर्मकाण्डज्ञास्तान्त्रिकाश्च ये ॥ १२४ ॥
ये चान्ये गुणिनः श्रेष्ठा बुद्धिमन्तो जितेन्द्रियाः ।

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द्वितीयोऽध्यायः ७५

तान सर्वान् पोषयेद् भृत्या दानैर्मानैः सुपूजितान् ॥ १२५ ॥
हीयते चान्यथा राजा ह्यकीर्त्तिं चापि बिन्दति ।

**राजा को तपस्वी आदियों की रक्षा करने का निर्देश—**जो राज्य में तपस्या करने वाले, दानशील, वेद तथा स्मृतियों के ज्ञाता (वैदिक और स्मार्त्त), पुराण के जानने वाले, शास्त्रज्ञ, ज्योतिषी, मन्त्र-तन्त्रवेत्ता, वैद्य, कर्मकाण्ड के ज्ञाता, शैवादि धर्म शास्त्र-ज्ञाता, तथा इन से अन्य विषयों के ज्ञाता, श्रेष्ठ गुणी, बुद्धिमान या जितेन्द्रिय हों, उन सबों का मासिक या वार्षिक वृत्ति, समय २ पर दान तथा सम्मान द्वारा पूजित करते हुये भरण-पोषण करे। यदि राजा ऐसा न करे तो राज्य से च्युत हो जाता है तथा उसकी अपकीर्त्ति भी होती है।

बहुसाध्यानि कार्याणि तेषामप्यधिपांस्तथा ॥ १२६ ॥
तत्तत्कार्येषु कुशलाञ्ज्ञात्वा तांस्तु नियोजयेत् ।

बहुत व्यक्तियों द्वारा संपन्न होने वाले कार्यों को जानकर या उन कार्यों के करने में कुशल जो हों उन्हीं व्यक्तियों को समझ कर यथायोग्य उक्त कार्यों का अधिकारी बनावे।

अमन्त्रमक्षरं नास्ति नास्ति मूलमनौषधम् ॥ १२७ ॥
अयोग्यः पुरुषो नास्ति योजकस्तत्र दुर्लभः ।

**योजनाकर्त्ता की दुर्लभता—**कोई भी अक्षर ऐसा नहीं है जो मन्त्र से शून्य हो, तरु-गुल्म आदि का कोई भी मूल (जड़ी-बूटी) ऐसा नहीं है जो औषध न हो एवं कोई भी ऐसा पुरुष नहीं है जो किसी कार्य के योग्य न हो किन्तु इन सबों को यथोचित रीति से कार्यों में लगाने वाला पुरुष ही दुर्लभ है।

प्रभद्रादिजातिभेदं गजानां च चिकित्सितम् ॥ १२८ ॥
शिक्षां व्याधिं पोषणं च तालुजिह्वानखैर्गुणान् ।
आरोहणं गतिं वेत्ति स योग्यो गजरक्षणे ॥ १२९ ॥
तथाविधाधोरणस्तु हस्तिहृदयहारकः ।

**गजाधिपति के एवं महावत के लक्षण—**जो पुरुष हाथियों के प्रभद्र आदि जाति-भेद को तथा उनकी चिकित्सा-विधि शिक्षा, व्याधि, पोषण करना तथा उनके तालु, जिह्वा और नख के द्वारा गुणों को एवं उन पर चढ़ने की तथा उनके चलाने की कला को जानने वाला हो उसे हाथियों की रक्षा करने में (गजाध्यक्ष) नियुक्त करे। क्योंकि उक्त गुणों से ही युक्त महावत हाथियों को वश में करने वाला होता है।

अश्वानां हृदयं वेत्ति जातिवर्णभ्रमैर्गुणान् ॥ १३० ॥

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७६ | शुक्रनीतिः

गतिं शिक्षां चिकित्सां च सत्त्वं सारं रुजं तथा ।
हिताहितं पोषणं च मानं यानं दन्तो वयः ॥ १३१ ॥
शूरश्च व्यूहवित्प्राज्ञः कार्योऽश्वाधिपतिश्च सः ।

अश्वाधिपति के लक्षण— जो पुरुष घोड़ों के हृद्गत भावों को एवं जाति, रंग, रोमों की भौंरी के द्वारा उनके गुणों को तथा उनकी चाल, शिक्षा, चिकित्सा, सत्त्व (बल), सार (क्षमता), रोग, हिताहित (शुभ या अशुभ) फल, पालन, मान (ऊंचाई आदि), उन पर गमन करना, दाँतों से अवस्था को जानने वाला, शूर, व्यूह-रचना का जानने वाला, अत्यन्त बुद्धिमान हो उसे घोड़ों का अध्यक्ष बनाना चाहिये ।

एभिर्गुणैश्च संयुक्तो धुर्यान्युग्यांश्च वेत्ति यः ॥ १३२ ॥
रथस्य सारं गमनं भ्रमणं परिवर्तनम् ।
समापतत्सु शस्त्रास्त्रलक्ष्यसंधाननाशकः ॥ १३३ ॥
रथगत्या स रथपो ह्यसंयोगगुप्तिवित् ।

सारथि के लक्षण— जो पुरुष उक्त गुणों से युक्त होते हुये भी भार-वहन करने में समर्थ रथ में जोते जाने वाले घोड़ों को एवं रथकी दृढता आदि, चलाना, घुमाना, बदलना जानता है, और रथ की विशेष गति से शत्रुओं के द्वारा चलाये हुये शस्त्रास्त्रों के लक्ष्य को विफल बनाने वाला, तथा शत्रुओं के घोड़ों के साथ मुठभेड़ होने पर अपने घोड़ों को बचाने की कला जानने वाला हो उसे रथाध्यक्ष या सारथि बनाना चाहिये ।

सादिनश्च तथा कार्याः शूरा व्यूहविशारदाः ॥ १३४ ॥
वाजिगतिविदः प्राज्ञाः शस्त्रास्त्रैर्युद्धकोविदाः ।

घुड़सवार के लक्षण— और जो शूर, व्यूह-रचना में पण्डित, घोड़ों की चालों को जानने वाले, बुद्धिमान तथा शस्त्र तथा अस्त्र द्वारा युद्ध करने में कुशल हों उन्हें घुड़सवार बनाना चाहिये ।

चकितं रेचितं वल्गितकं धौरितमाप्लुतम् ॥ १३५ ॥
तुरं मंदं च कुटिलं सर्पणं परिवर्तनम् ।
एकादशास्कन्दितं च गतीरश्वस्य वेत्ति यः ॥ १३६ ॥
यथाबलं यथार्थं च शिक्षयेत्स च शिक्षकः ।

अश्वशिक्षक के लक्षण— जो चकित (चक्राकार में घुमाना), रेचित (गति विशेष), वल्गितक (बहुत ऊँची वस्तु को लाँघना), धौरित (गतिभेद), आप्लुत (मेंढक की भांति कूदना), तुर (तेज दौड़ना), मन्द (धीरे १ चलना), कुटिल (वक्रगति), सर्पण (सर्प की भांति टेढ़े-मेढ़े दौड़ना), परिवर्तन (पलटना), आस्कन्दित (शत्रुओं पर आक्रमण करना), इन ११ प्रकार

द्वितीयोऽध्यायः ७७

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द्वितीयोऽध्यायः ७७

की घोड़ों की चालों को तथा घोड़े के सामर्थ्य के अनुसार उन्हें यथार्थ रूप से शिक्षा देना जानता है वह अश्वशिक्षक (घोड़ों को सिखानेवाला) के पद पर नियुक्त करने योग्य होता है।

वाजिसेवासु कुशलः पल्याणादिनियोगवित् ॥ १३७॥
दृढांगश्च तथा शूरः स कार्यो वाजिसेवकः।

**अश्वसेवक (साईस) के लक्षण—**जो घोड़ों की सेवा करने में कुशल, पल्याण (घोड़े की जीन) आदि लगाने की कला का जानने वाला, दृढ़ अङ्गों वाला तथा शूर होता है वह साईस बनाने योग्य है।

नीतिशास्त्रास्त्रव्यूहादिनतिविद्याविशारदाः ॥ १३८॥
अबाला मध्यवयसः शूरा दान्ता दृढांगकाः।
स्वधर्मनिरता नित्यं स्वामिभक्ता रिपुद्विषः ॥ १३९॥
शूद्रा वा क्षत्रिया वैश्या म्लेच्छाः संकरसम्भवाः।
सेनाधिपाः सैनिकाश्च कार्या राज्ञा जयार्थिना ॥ १४०॥

**सेनापति तथा सैनिकों के लक्षण—**जो नीति (कर्त्तव्य तथा अकर्त्तव्य जानने का) शास्त्र, शस्त्र तथा अस्त्र चलाना, व्यूह-रचना, नतिविद्या (शत्रुओं को नीचा दिखाना) इन सब विषयों में पण्डित, लड़कपन से रहित, तरुण, शूर, सैनिक-शिक्षा प्राप्त, दृढ़ अङ्गों वाले, अपने धर्म में निरत, नित्य स्वामी में भक्ति रखने वाले, एवं उनके शत्रुओं से द्वेष रखने वाले, शूद्र, क्षत्रिय, वैश्य, म्लेच्छ या सङ्कीर्ण जाति वाले हों उन्हें विजय चाहनेवाला राजा अपना सेनाध्यक्ष या सैनिक बनावे।

पञ्चानामथवा षण्णामधिपः पदगामिनाम्।
योग्यः स पत्तिपालः स्यात्त्रिंशतां गौल्मिकः स्मृतः ॥ १४१॥
शतानां तु शतानीकस्तथाऽनुशतिको वरः।
सेनानीर्लेखकश्चैते शतं प्रत्यधिपा इमे ॥ १४२॥
साहस्रिकस्तु संयोज्यस्तथा चायुतिको महान्।

**पत्ति (पैदल सेना) पाल आदिकों के अधिकार—**५ या ६ पैदल सिपाहियों का जो स्वामी होता है वह 'पत्तिपाल' ३० सिपाहियों का स्वामी 'गौल्मिक' १०० सिपाहियों का स्वामी 'शतानीक' कहलाता है, और श्रेष्ठ अनुशतक, सेनानी तथा लेखक ये सब सौ-सौ के ऊपर विशेष २ कार्यों के लिये अध्यक्ष बनाने चाहिए। और १००० सिपाहियों का स्वामी 'साहस्रिक' एवं १०००० सिपाहियों का स्वामी महान 'आयुतिक' बनाना चाहिये।

व्यूहाभ्यासं शिक्षयेद्यः सायंप्रातस्तु सैनिकान् ॥ १४३॥
जानाति स शतानीकः सुयोद्धुं युद्धभूमिकाम्।

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७८ | शुक्रनीतिः

शतानीकादिकों के लक्षण—सायं-प्रातः सैनिकों को व्यूह-रचना का अभ्यास (कवायत या परेड) कराना और भली भांति युद्ध करने के लिये रणसज्जा (युद्ध योग्य सामग्री-वेषभूषा से सुसज्जित करना) का ज्ञान रखना, यह शतानीक का कर्त्तव्य है।

तथाविधोऽनुशतिकः शतानीकस्य साधकः ॥ १४४ ॥
जानाति युद्धसम्भारं कार्ययोग्यं च सैनिकम् ।

और जो इन्हीं गुणों से युक्त, शतानीक की सहायता करने वाला युद्धोपयोगी सामग्रियों का तथा कार्य योग्य सैनिकों का जानने वाला होता है वह 'अनुशतिक' कहलाता है। अर्थात् उक्त कार्यों का भार उसके ऊपर रहता है।

निदेशयति कार्याणि सेनानीर्यामिकांश्च सः ॥ १४५ ॥
परिवृत्तिं यामिकानां करोति स च पत्तिपः ।

जो प्रहरी (पहरा देने वाले) लोगों के लिये कार्य बताता है अर्थात् जिसके निर्देशानुसार सिपाही कार्य करते हैं वह (सेनानी) कहलाता है। और प्रहरी गणों का जो पहरा बदलता है वह 'पत्तिप' या 'पत्तिपाल' कहलाता है।

सावधानं यामिकानां विजानीयाच्च गुल्मपः ॥ १४६ ॥

जो प्रहरियों को अपने २ कामों में सतर्कता का निरीक्षण करता है वह 'गुल्मप' या 'गौल्मिक' कहलाता है।

सैनिकाः कति सन्त्येतैः कति प्राप्तं तु वेतनम् ।
प्राचीनाः के कुत्र गताश्चैतान्वेत्ति स लेखकः ॥ १४७ ॥
गजाश्वानां विंशतेश्चाधिपो नायकसंज्ञकः ।

जो सेना में कितने सैनिक हैं? और उन्होंने कितना वेतन पाया है? पुराने असमर्थ सैनिक कितने हैं? और कौन कहां २ गये हैं, इन सबों को जान कर लिखता है, वह 'लेखक' कहलाता है। और २० हाथियों एवं २० घोडों का अध्यक्ष 'नायक' कहलाता है।

उक्तसंज्ञान्स्वस्वचिह्नैर्लाञ्छितांश्च नियोजयेत् ॥ १४८ ॥

उपर्युक्त अधिकारियों को अपने २ चिह्नों से युक्त रहने का निर्देश—ऊपर जिनके नामों का निर्देश किया गया है उन पत्तिपाल आदियों को उनके जो २ चिह्न हों उन से युक्त करके कार्य करने का आदेश देना चाहिये।

अजाविगोमहिष्येणमृगाणामधिपाश्च ये ।
तद्वृद्धिपुष्टिकुशलास्तद्घासल्यानिपीडिताः ॥ १४९ ॥
तथाविधा गजोष्ट्रादेर्योध्यास्तत्सेवका अपि ।

बकरा, मेढ़ा, गौ, भैंस, एण (मृग विशेष), मृग, इनके जो अध्यक्ष हों