Skip to content
SarvaKosh
शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 148 of 526

Read in context
Page 148

६२ | शुक्रनीतिः

परोत्पन्ने स्वपुत्रत्वं मत्वा सर्वं ददाति तम् ॥ ३४ ॥
किमाश्चर्यमतो लोके न ददाति यजत्यपि ।

इससे बढ़कर संसार में आश्चर्य का विषय क्या है ? कि जिस धन को न किसी को देता है और न उससे यज्ञ ही करता है, फिर भी उसी धन को दूसरे कुल में उत्पन्न दत्तक पुत्र में अपने पुत्र की भावना करके उसके लिये सम्पूर्ण रूप से त्याग कर देता है ।

प्राप्यापि युवराजत्वं प्राप्नुयाद्विकृति न च ॥ ३५ ॥
स्वसंपत्तिमदान्नैव मातरं पितरं गुरुम् ।
भ्रातरं भगिनीं वापि ह्यान्यान्वा राजवल्लभान् ॥ ३६ ॥
महाजनांस्तथा राष्ट्रे नावमन्येत (पीडयेत् ।

और युवराज-पद को पाकर दत्तक राजकुमार को विकृति नहीं लानी चाहिये अर्थात् बदल नहीं जाना चाहिये । और अपनी सम्पत्ति के मद से माता, पिता, गुरु ( शिक्षक या गुरुजन ), भाई, बहिन या इनसे अन्य राजा के प्रिय ( मन्त्री आदि ) और राज्य में श्रेष्ठजन हैं इनका तिरस्कार न करे और न पीड़ा ही पहुंचावे ।

यदा तु कश्चिज्ज्ञातीनां बाह्यः प्रार्थयते कुलम् ॥ ३७ ॥
न मर्षयन्ति तत्सन्तो बाह्ये नाभिप्रदर्शनम् ।

जब कोई जातियों से बाहर का व्यक्ति कुल की प्रार्थना करता है तो उसके कुलीनता के प्रदर्शन को अच्छे लोग बर्दाश्त नहीं करते ।

प्राप्यापि महतीं वृद्धिं वर्तेत पितुराज्ञया ॥ ३८ ॥
पुत्रस्य पितुराज्ञापि परमं भूषणं स्मृतम् ।

बड़ी भारी तरक्की को पाकर भी पिता की आज्ञानुसार रहे क्योंकि पुत्र के लिये पिता की आज्ञा का पालन करना परम भूषण है ।

भार्गवेण हता माता राघवस्तु वनं गतः ॥ ३९ ॥
पितुस्तपोबलात्तौ तु मातरं राज्यमापतुः ।
शापानुग्रहयोः शक्तो यस्तस्याज्ञा गरीयसी ॥ ४० ॥

पिता की आज्ञा से परशुरामजी ने माता की हत्या की और रामजी वन को गये । किन्तु पिता के तपोबल से पुनः उन दोनों ने क्रम से परशुराम ने माता का पुनरुज्जीवन और राम ने पुनः राज्य-लाभ प्राप्त किया क्योंकि शाप देने और अनुग्रह करने में जो समर्थ हों उनकी आज्ञा सर्वोपरि मान्य होती है ।

सोदरेषु च सर्वेषु स्वस्याधिक्यं न दर्शयेत् ।
भागार्हभ्रातृणां नष्टो ह्यवमानात्सुयोधनः ॥ ४१ ॥