शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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Read in contextद्वितीयोऽध्यायः ६९
का केवल शोभामात्र ही है अतः वे पुरोहितादि केवल शोभादायक हैं उनसे राज्य को कोई लाभ नहीं है ।
राज्यं प्रजा बलं कोशः सुन्नृपत्वं न वर्धितम् ॥ ८३ ॥
यन्मन्त्रतोऽरिनिग्रस्तैर्मन्त्रिभिः किं प्रयोजनम् ।
जिनकी सलाह से राजा का राज्य, प्रजा, सेना, कोश और राजा के सुन्दर भावों की अभिवृद्धि न हो तो उन मन्त्री आदियों से क्या प्रयोजन । अर्थात् वे सब व्यर्थ हैं।
कार्याकार्यप्रविज्ञाता स्मृतः प्रतिनिधिस्तु सः ॥ ८४ ॥
सर्वदर्शी प्रधानस्तु सेनाबित्सचिवस्तथा ।
क्या करने योग्य है ? क्या नहीं करने योग्य है ? इसको भलीभांति जाननेवाला जो होता है वह ‘प्रतिनिधि’ कहलाता है और सब कार्यों का निरीक्षण करनेवाला ‘प्रधान’ एवं सैन्य-संचालन का भलीभांति जाननेवाला ‘सचिव’ कहलाता है।
मन्त्री तु नीतिकुशलः पण्डितो धर्मतत्त्ववित् ॥ ८५ ॥
लोकशास्त्रनयज्ञस्तु प्राड्विवाकः स्मृतः सदा ।
नीतिशास्त्र के जानने एवं तदनुसार कार्य करने में जो कुशल है वह ‘मन्त्री’ कहलाता है। और धर्म के तत्त्व को जाननेवाला ‘पण्डित’ एवं सदा लोक-व्यवहार तथा शास्त्रोक्त व्यवहार को जाननेवाला ‘प्राड्विवाक’ कहलाता है ।
देशकालप्रविज्ञाता ह्यमात्य इति कथ्यते ॥ ८६ ॥
आयव्ययप्रविज्ञाता सुमन्त्रः स च कीर्तितः ।
देश और काल के विषय को अच्छी तरह जो जाननेवाला है वह ‘अमात्य’ एवं आय (अर्थागम) और व्यय (अर्थ का खर्च) के कार्यों को सुचारु रूप से जो जाननेवाला है वह ‘सुमन्त्र’ कहलाता है।
इङ्गिताकारचेष्टज्ञः स्मृतिमान्देशकालवित् ॥ ८७ ॥
षाड्गुण्यमन्त्रविद्वाग्मी वीतभीर्दूंत इष्यते ।
हृद्गतभाव तथा चेष्टा को समझनेवाला, उत्तम स्मरणशक्तिवाला, देश-कालानुरूप कर्त्तव्य कर्म को जाननेवाला, सन्धि, विग्रह, यान (चढ़ाई करना), आसन (किले आदि में रहकर लड़ना), द्वैधीभाव (ऊपर से शत्रुओं से मिलकर भीतर-भीतर उनसे दुश्मनी रखना), समाश्रय (सबल का आश्रय लेना), इन सबों के विषय में उचित मन्त्र (विचार) का जाननेवाला, बोलने में चतुर, नहीं डरनेवाला ‘दूत’ कहलाता है।
अहितं चापि यत्कार्यं सद्यः कर्तुं यदोचितम् ॥ ८८ ॥