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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

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DevanagariHindipublished526 pages

Page 149 of 526

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Page 149

द्वितीयोऽध्यायः
६३

अपने भाइयों के सामने अपनी महत्ता का प्रदर्शन न करे। क्योंकि दुर्योधन भाग (अंश-हिस्सा) पाने योग्य भाइयों के अपमान से नष्ट हो गया।

पितुराज्ञोल्लङ्घनेन प्राप्यापि पदमुत्तमम्।
तस्माद् भ्रष्टा भवन्तीह दासवद्राजपुत्रकाः ॥ ४२ ॥
ययातेश्च यथा पुत्रा विश्वामित्रसुता यथा।

राजपुत्रों की पिता के विषय में कर्त्तव्यता का निर्देश— राजपुत्र लोग दास की भांति इस लोक में पिता की आज्ञा का उल्लङ्घन करने से उत्तम पद को पाकर भी उससे भ्रष्ट (हीन) हो जाते हैं। जैसे ययाति राजा के पुत्र यदु आदि राज्यभ्रष्ट और विश्वामित्र के पुत्र गण पिता की आज्ञा का उल्लङ्घन करने से उनके शापवश कुत्ते का मांस-भोजन करनेवाले हो गये।

पितृसेवापरस्तिष्ठेत्कायवाङ्मानसैः सदा ॥ ४३ ॥
तत्कर्म नियतं कुर्याद्येन तुष्टो भवेत्पिता।
तन्न कुर्याद्येन पिता मनागपि विषीदति ॥ ४४ ॥

अतः पुत्र को सदा शरीर, वाणी और मनसे पिता की सेवा में तत्पर रहना चाहिये। और जिससे पिता प्रसन्न हों उस कर्म को नियत रूप से करना चाहिये। और उस कर्म को नहीं करना चाहिये जिससे पिता को थोड़ा भी खेद हो।

यस्मिन्पितुर्भवेत्प्रीतिः स्वयं तस्मिन्प्रियं चरेत्।
यस्मिन्द्वेषं पिता कुर्यात्स्वस्यापि द्वेष्य एव सः ॥ ४५ ॥
असंमतं विरुद्धं वा पितुर्नैव समाचरेत्।

जिसके ऊपर पिता का प्रेम है उसके साथ स्वयं भी प्रिय व्यवहार करे। और जिसके साथ पिता द्वेष करे उसके लिये स्वयं भी द्वेषी एवं जो पिता को असंमत या विरुद्ध प्रतीत हो उस व्यवहार को न करे।

चारसूचकदोषेण यदि स्यादन्यथा पिता ॥ ४६ ॥
प्रकृत्यनुमतं कृत्वा तमेकान्ते प्रबोधयेत्।
अन्यथा सूचकाद्भृत्यं महद्दण्डेन दण्डयेत् ॥ ४७ ॥

जासूस या सूचक (चुगुलखोर) के दोष से यदि पिता का भाव अन्यथा (उलट) हो जाय तो प्रकृति के अनुकूल करके एकान्त में उन्हें समझावे। और अन्यथा रीति से सूचना देनेवाले चुगुलखोर या जासूस को भारी दण्ड से दण्डित करे या पिता से सजा दिलावे।

प्रकृतीनां च कपटैः स्वान्तं विद्यात्सदैव हि।
प्रातर्नत्वा प्रतिदिनं पितरं मातरं गुरुम् ॥ ४८ ॥
राजानं स्वकृतं यद्यन्निवेद्यानुदिनं ततः।