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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

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DevanagariHindipublished526 pages

Page 157 of 526

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Page 157

द्वितीयोऽध्यायः ७१

एतत्संचिन्त्य निश्चित्य मन्त्री सर्वं निवेदयेत् ।
मन्त्री के कार्य— मन्त्री का कर्तव्य यह है कि—वह किन विषयों में कब, किस प्रकार से सन्धि, दान, भेद और विग्रह करना चाहिये एवं उससे क्या फल होगा ? और वह अधिक, मध्यम या अल्प होगा, इन सबों का विचार कर राजा से निवेदन करे ।

साक्षिभिर्लिखितैर्भोगैश्छलैर्भूतैश्च मानुषान् ॥ ९७ ॥
स्वानुत्पादितसंप्राप्तव्यवहारान्विचिन्त्य च ।
दिव्य-संसाधनाद्वापि केषु किं साधनं परम् ॥ ९८ ॥
युक्तिप्रत्यक्षानुमानोपमानैर्लोकशास्त्रतः ।
बहुसम्मतसंसिद्धान्विनिश्चित्य सभास्थितः ॥ ९९ ॥
ससभ्यः प्राड्विवाकस्तु नृपं सम्बोधयेत्सदा ।

प्राड्विवाक के कार्य— ‘प्राड्विवाक’ का कर्तव्य यह है कि—वह (विचारपति) सभा में स्थित हो, सभ्यों (जूरियों) के साथ मिलकर साक्षी (गवाह) एवं लेखक के द्वारा सत्य या छल से युक्त मनुष्यों को एवं अपनी इच्छा से पैदा किये हुये या यथार्थ रूप से उपस्थित किये गये विवादों को विचार कर उनमें से किसी का साक्षी या लेखक के अभाव में दिव्यसाधनों (अग्निपरीक्षा आदि) से एवं किसी का बहुत लोगों की सम्मति से तथा किसी में कौन प्रमाण उचित होगा इसका प्रत्यक्ष, अनुमान, दृष्टान्त तथा लोकशास्त्र से विचार कर जो निर्णय हो उसे राजा से सदा निवेदन करे ।

वर्तमानाश्च प्राचीना धर्माः के लोकसंश्रिताः ॥ १०० ॥
शास्त्रेषु के समुद्दिष्टा विरुध्यन्ते च केऽधुना ।
लोकशास्त्रविरुद्धाः के पण्डितस्तान्विचिन्त्य च ॥ १०१ ॥
नृपं संबोधयेत्तैश्च परत्रेह सुखप्रदैः ।

पण्डित के कार्य— पण्डित का कर्तव्य यह है कि—वह प्रजागण इस समय प्राचीन या नवीन में से किस धर्म का पालन कर रहे हैं और किस धर्म का शास्त्र में निर्दिष्ट होने पर भी आदर नहीं कर रहे हैं और कौन से उनके प्रचलित धर्म शास्त्र-विरुद्ध पड़ रहे हैं, इन सबों को विचार कर जो इस लोक तथा पर लोक में सुखप्रद धर्म हैं उन्हें राजा से निवेदन करे ।

इयच्च संचितं द्रव्यं वत्सरेऽस्मिंस्तृणादिकम् ॥ १०२ ॥
व्ययीभूतमियच्चैव शेषं स्थावरजंगमम् ।
इयदस्तीति वै राज्ञे सुमन्त्रो विनिवेदयेत् ॥ १०३ ॥

सुमन्त्र के कार्य— सुमन्त्र का कर्तव्य यह है कि—वह इस वर्ष में तृणादिक स्थायी तथा अस्थायी द्रव्य का इतना संचय हुआ या और उसमें से