शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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Read in context६० | शुक्रनीतिः
हैं तब इतर को क्यों नहीं मारेंगे अर्थात् अवश्य मारेंगे। क्योंकि मूर्ख बालक भी यदि स्वामी (राजा) बनना चाहता है तो फिर युवा (जवान) के विषय में क्या कहना है अर्थात् वह तो अवश्य चाहेगा ही।
स्वात्यन्तसन्निकर्षेण राजपुत्रांस्तु रक्षयेत् ।
सद्भृत्यैश्चापि तत्स्वान्तं छलैर्ज्ञात्वा सदा स्वयम् ॥ २१ ॥
और राजा अपने अत्यन्त सन्निकट में राजपुत्रों को रखते हुये विश्वासी नौकरों के द्वारा, किसी ब्याज से या स्वयं उनके हार्दिक भावों को सदा जानकर तदनुसार उनकी रक्षा का प्रबन्ध करे।
सुनीतिशास्त्रकुशलान् धनुर्वेदविशारदान् ।
क्लेशसहांश्च वाग्दण्डपारुष्यानुभवान् सदा ॥ २२ ॥
शौर्येयुद्धरतान् सर्वकलाविद्याविदोऽजसा ।
सुविनीतान्प्रकुर्वीत ह्यमात्याद्यैर्नृपः सुतान् ॥ २३ ॥
**दुराचारी राजपुत्रों में आचार-स्थापना का निर्देश—**और राजा मन्त्री आदि के द्वारा अपने पुत्रों को सुन्दर नीतिशास्त्र में कुशल, धनुर्वेद विद्या में विशारद, सदा क्लेश सहन करने में समर्थ, वाग्दण्ड की कठोरता का अनुभव करनेवाला, वीरता के साथ युद्ध करने में निरत, वस्तुतः सम्पूर्ण कलाओं तथा विद्याओं का जाननेवाला, अत्यन्त शिक्षित अथवा विनम्र बनावे।
सुवस्त्राद्यैर्भूषयित्वा लालयित्वा सुक्रीडनैः ।
अर्हयित्वाऽऽसनाद्यैश्च पालयित्वा सुभोजनैः ॥ २४ ॥
कृत्वा तु यौवराज्यार्हान् यौवराज्येऽभिषेचयेत् ।
अविनीतकुमारं हि कुलमाशु विनश्यति ॥ २५ ॥
और उन्हें सुन्दर वस्त्रादिकों से अलंकृत, अच्छे खेलों से लालित, अच्छे आसनों पर बैठाने से सम्मानित करते हुये अच्छे २ भोजनों से उनका पालन-पोषण करके युवराज-पद के योग्य हो जाने पर उन्हें युवराज बनावे क्योंकि जिस राजवंश के युवराज अशिक्षित होते हैं वह शीघ्र नष्ट हो जाता है।
राजपुत्रः सुदुर्वृत्तः परित्यागं हि नार्हति ।
क्लिश्यमानः स पितरं परानाश्रित्य हन्ति हि ॥ २६ ॥
और अत्यन्त दुर्वृत्त (दुष्ट आचरणवाला) भी राजपुत्र परित्याग करने के योग्य नहीं होता है क्योंकि क्लेश पाने पर वह शत्रुओं का सहारा लेकर अपने पिता राजा को मार डालता है।
व्यसने सज्जमानं तं क्लेशयेद् व्यसनाश्रयैः ।
दुष्टं गजमिवोद्वृत्तं कुर्वीत सुखबन्धनम् ॥ २७ ॥
यदि कोई राजकुमार द्यूत आदि व्यसन में फंस जाय तो उस व्यसन के