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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

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DevanagariHindipublished526 pages

Page 154 of 526

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Page 154
६८शुक्रनीतिः

पुरोहितादिकों के अधिकार— पूर्वमतानुसार प्रथम जो पुरोधा (पुरोहित) है वह अन्य प्रतिनिधि आदि प्रकृतियों की अपेक्षा अधिक श्रेष्ठ है क्योंकि शास्त्रोक्त पूजन अनुष्ठान के द्वारा विघ्ननाश करने से राजा तथा राज्य की रक्षा करनेवाला होता है। उससे कम प्रतिनिधि, प्रतिनिधि से कम प्रधान, प्रधान से कम सचिव, सचिव से कम मन्त्री, मन्त्री से कम प्राड्विवाक, प्राड्विवाक से कम पण्डित, पण्डित से कम सुमन्त्र, सुमन्त्र से कम अमात्य, अमात्य से कम दूत श्रेष्ठ है। ये सब क्रम से अपने-अपने गुणानुसार पूर्व-पूर्व श्रेष्ठ होते हैं।

मन्त्रानुष्ठानसम्पन्नस्त्रैविद्यः कर्मतत्परः ॥ ७८ ॥
जितेन्द्रियो जितक्रोधो लोभमोहविवर्जितः ।
षडङ्गवित्सांगधनुर्वेदवित्पार्थधर्मवित् ॥ ७९ ॥
यत्कोपभीत्या राजापि धर्मनीतिरतो भवेत् ।
नीतिशास्त्रास्त्रव्यूहादिकुशलस्तु पुरोहितः ॥ ८० ॥
सैवाचार्यः पुरोधा यः शापानुग्रहयोः क्षमः ।

पुरोहितादिकों के लक्षण— यथाविधि मन्त्रों के अनुष्ठान द्वारा कार्य को सिद्ध करनेवाला, तीनों (ऋग्, यजु, साम) वेदों का जाननेवाला, कार्य करने में शीघ्रता करनेवाला, जितेन्द्रिय, क्रोध को जीतनेवाला, लोभ तथा मोह से रहित, षडङ्ग (वेद के व्याकरण, शिक्षा, कल्प, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष इन छह अङ्गों) का जाननेवाला, साङ्गोपाङ्ग धनुर्वेद का ज्ञाता, अर्थ तथा धर्म को जाननेवाला एवं जिसके कोप के भय से राजा भी धर्म तथा नीति में रत रहता है ऐसा नीतिशास्त्र, शस्त्रास्त्र चलाने की कला एवं व्यूहरचना में कुशल पुरोहित को होना चाहिये और पुरोहित को ही आचार्य भी कहते हैं। यह शाप तथा अनुग्रह (वर) दोनों के देने में समर्थ भी होता है।

बिना प्रकृतिसन्मन्त्राद्राज्यनाशो भवेद्ध्रुवम् ॥ ८१ ॥
रोधनं न भवेत्तस्माद्राज्ञस्ते स्युः सुमन्त्रिणः ।

पूर्वोक्त पुरोहित आदि प्रकृतियों के साथ बिना अच्छी मन्त्रणा (सलाह) किये राजा यदि कोई कार्य करता है तो राज्य का नाश निश्चय हो जाता है। एवं राजा का रोधन (कुमार्ग से रोकना) नहीं हो सकता है। इसलिये उन सब पुरोहितादि प्रकृतियों को अच्छा सलाह देनेवाला होना उचित है।

न बिभेति नृपो येभ्यस्तैः स्यात् किं राज्यवर्धनम् ॥ ८२ ॥
यथालंकारवस्त्राद्यैः स्त्रियो भूष्यास्तथा हि ते ।

जिन पुरोहितादि प्रकृतियों से राजा न डरे उनसे क्या राज्य की वृद्धि हो सकती है ? कदापि नहीं। जैसे अलंकार-वस्त्र आदि से स्त्रियां केवल सुशोभित होती हैं वैसे ही अच्छी सलाह न देने वाले उन पुरोहितादि प्रकृतियों से राजा