Skip to content
SarvaKosh
शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 147 of 526

Read in context
Page 147

द्वितीयोऽध्यायः

६१

आश्रयदाताओं के द्वारा उसको क्लेश पहुंचाये पश्चात् किसी भांति समझा-बुझाकर ठीक रास्ते पर लाये, जैसे उच्छृङ्खल दुष्ट हाथी को क्लेश पहुँचाकर सुखपूर्वक बांधा जाता है।

सुदुर्वृत्तांस्तु दायादा हन्तव्यास्ते प्रयत्नतः ।
व्याघ्रादिभिः शत्रुभिर्वा छले राष्ट्रविवृद्धये ॥ २८ ॥
अतोऽन्यथा विनाशाय प्रजाया भूपतेश्च ते ।

जो राजा के दायादवर्गवाले (वंश के लोग) अत्यन्त दुष्ट आचरण करने-वाले हों उन्हें प्रयत्नपूर्वक व्याघ्रादि, शत्रु या छल के द्वारा राज्य की उन्नति के लिये मार डालना चाहिये। इससे अन्यथा करनेपर वे प्रजा तथा राजा के विनाश के कारण होते हैं।

तोषयेयुर्नृपं नित्यं दायादाः स्वगुणैः परः ॥ २९ ॥
भ्रष्टा भवन्त्यन्यथा ते स्वभागाज्जीवितादपि ।

अतः दायादवर्ग के लोग श्रेष्ठ अपने गुणों से राजा को सन्तुष्ट रखें अन्यथा वे अपने हिस्से तथा जीवन से विहीन हो जाते हैं।

स्वसापिण्ड्यविहीना ये ह्यन्योत्पन्ना नराः खलु ॥ ३० ॥
मनसापि न मन्तव्या दत्ताद्याः स्वसुता इति ।
तद्दत्तकत्वमिच्छन्ति दृष्ट्वा यं धनिकं नरम् ॥ ३१ ॥
स्वकुलोत्पन्नकन्यायाः पुत्रस्तेभ्यो वरो ह्यतः ।

जो अपने सापिण्ड्य से विहीन (अपने वंश का नहीं) होकर दूसरे वंश में उत्पन्न हुये मनुष्य दत्तादिपुत्र होते हैं उन्हें मन से नहीं समझना चाहिये कि ये मेरे पुत्र हैं। क्योंकि वे (दत्तादिकपुत्र) जिसको धनी पुरुष देखते हैं उसके दत्तक पुत्र बनने की इच्छा करते हैं अतः उनकी अपेक्षा अपने कुल में उत्पन्न कन्या का पुत्र (दौहित्र) अच्छा होता है।

अङ्गादङ्गात्सम्भवति पुत्रवद् दुहिता नृणाम् ॥ ३२ ॥
पिण्डदाने विशेषो न पुत्रदौहित्रयोस्ततः ।

क्योंकि पुत्र की भांति मनुष्यों के अङ्ग-अङ्ग से कन्या भी उत्पन्न होती है। अतः पिण्डदान में पुत्र और दौहित्र में कोई अन्तर नहीं है अर्थात् दोनों से तृप्ति होती है।

भूप्रजापालनार्थं हि भूपो दत्तं तु पालयेत् ॥ ३३ ॥
नृपः प्रजापालनार्थं सधनश्चेन्न चान्यथा ।

और राजा पृथ्वी तथा प्रजाओं के पालनार्थ दत्तकपुत्र का पालन करे। क्योंकि वह प्रजापालन तथा धन (राज्य) देने के लिये ही दत्तक पुत्र लेता है अन्यथा उसे कोई आवश्यकता नहीं है।