शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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Read in context| ६४ | शुक्रनीतिः |
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एवं गृहाविरोधेन राजपुत्रो वसन् गृहे ॥ ४६ ॥
और सदैव प्रकृतियों ( मन्त्री आदि ) के चित्त के भाव को किसी व्याज से समझे। प्रातःकाल प्रतिदिन पिता-माता, गुरु को नमस्कार कर पूर्व जो कुछ प्रतिदिन का अपना किया हुआ कार्य हो उसे राजा से निवेदन करे। इस प्रकार से राजभवन के लोगों के साथ विरोध न रखते हुये राजभवन में राजपुत्र को रहना चाहिये।
विद्यया कर्मणा शीलैः प्रजाः संराजयन्मुदा ।
त्यागी च सत्त्वसम्पन्नः सर्वान्कुर्याद्वशे स्वके ॥ ५० ॥
अपनी विद्या, कर्म तथा शील से प्रसन्नता के साथ प्रजा का मनोरंजन करता हुआ, त्याग (दान) तथा सत्त्व गुण से संपन्न होकर सब लोगों को अपने वश में रक्खें।
शनैः शनैः प्रवर्धेत शुक्लपक्षमृगाङ्कवत् ।
एवंवृत्तो राजपुत्रो राज्यं प्राप्याप्यकंटकम् ॥ ५१ ॥
सहायवान्सहामात्यश्चिरं भुंक्ते वसुन्धराम् ।
समासतः कार्यमुक्तं युवराजस्य यद्धितम् ॥ ५२ ॥
शुक्ल पक्ष की चन्द्रमा की भांति धीरे २ वृद्धि को प्राप्त करे। इस प्रकार आचरण करनेवाला राजपुत्र आगे चलकर अकण्टक राज्य को पाकर सहायकों तथा मन्त्रियों के साथ रहकर चिरकाल तक पृथ्वी का उपभोग करता है इस प्रकार से युवराज के लिये जो हितकर व्यवहार है उसे संक्षेप से कहा गया है।
समासादुच्यते कृत्यममात्यादेश्च लक्षणम् ।
मृदुगुरुप्रमाणत्ववर्णशब्दादिभिः समम् ॥ ५३ ॥
अमात्यादि भृत्यों के विषय में विचार करने का निर्देश— अब मन्त्री की कैसी मृदुता, गम्भीरता, प्रामाणिकता, जाति और वचन इत्यादि है ? इसके साथ उसके लक्षण तथा कृत्य का संक्षेप से वर्णन करते हैं।
परीक्षकैर्द्वावयित्वा यथा स्वर्णं परीक्ष्यते ।
कर्मणा सहवासेन गुणैः शीलकुलादिभिः ॥ ५४ ॥
भृत्यं परीक्षयेन्नित्यं विश्वास्यं विश्वसेत्तदा ।
नैव जातिर्न च कुलं केवलं लक्षयेदपि ॥ ५५ ॥
स्वर्ण की परीक्षा करनेवाले जिस प्रकार गलाकर स्वर्ण की परीक्षा करते हैं उसी प्रकार कर्म, सहवास, चरित्र, कुल आदि गुणों से भृत्य (वेतन पानेवाले अमात्यादि) की सदा परीक्षा करे। उसके बाद यदि विश्वास योग्य हो तो विश्वास करे और केवल जाति या कुल से परीक्षा न करे।