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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 151 of 526

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Page 151

द्वितीयोऽध्यायः ६५

कर्मशीलगुणाः पूज्यास्तथा जातिकुलेन हि।
न जात्या न कुलेनैव श्रेष्ठत्वं प्रतिपद्यते ॥ ५६ ॥
विवाहे भोजने नित्यं कुलजातिविवेचनम्।

जैसा कर्म, शील तथा गुण से मनुष्य पूजनीय होता है वैसा जाति और कुल से नहीं क्योंकि श्रेष्ठता जाति या कुल से ही नहीं पाई जाती है और कुल तथा जाति का विचार तो केवल विवाह तथा भोजन में किया जाता है।

सत्यवान् गुणसम्पन्नस्तथाऽभिजनवान्धनी ॥ ५७ ॥
सुकुलश्च सुशीलश्च सुकर्मा च निरालसः।
यथा करोत्यात्मकार्यं स्वामिकार्यं ततोऽधिकम् ॥ ५८ ॥
चतुर्गुणेन यत्नेन कायवाङ्मानसेन च।
भृत्या च तुष्टो मृदुवाक्कार्यदक्षः शुचिर्दृढः ॥ ५९ ॥
परोपकरणे दक्षो ह्यपकारपराङ्मुखः।
स्वाम्यागस्कारिणं पुत्रं पितरं चापि दर्शकः ॥ ६० ॥
अन्यायगामिनि पतौ यतद्रूपः सुबोधकः।
नाचेष्टा तद्गिरं कांचिन्तन्न्यूनस्याप्रकाशकः ॥ ६१ ॥
अदीर्घसूत्रः सत्कार्ये ह्यसत्कार्ये चिरक्रियः।
न तद्भार्यापुत्रमित्रच्छिद्रदर्शी कदाचन ॥ ६२ ॥
तद्वद् बुद्धिस्तदीयेषु भार्यापुत्रादिबन्धुषु।
न श्लाघते स्पर्धते न नाभ्यसूयति निन्दति ॥ ६३ ॥
नेच्छत्यन्याधिकारं हि निःस्पृहो मोदते सदा।
तद्दत्तवस्त्रभूषादिधारकस्तत्पुरोऽनिशम् ॥ ६४ ॥
भृतितुल्यव्ययी दान्तो दयालुः शूर एव हि।
तत्कार्यस्य रहसि सूचको भृतको वरः ॥ ६५ ॥
विपरीतगुणैरेभिर्भृतको निन्य उच्यते।

श्रेष्ठ भृत्य के लक्षण— सत्य बोलनेवाला, गुणों से युक्त, उच्च वंश में उत्पन्न, धनी, निर्दोष कुलवाला, सुशील, उत्तम कर्म करनेवाला, आलस्यरहित, जिस भांति अपने कार्य में यत्न करता है उससे अधिक कायिक, वाचिक तथा मानसिक चौगुने यत्न के साथ स्वामी का कार्य करनेवाला, केवल वेतन मात्र से ही सन्तुष्ट रहनेवाला, मधुरभाषी, कार्य करने में चतुर, पवित्र चित्त-वाला, कार्य करने में स्थिर विचार रखनेवाला, परोपकार करने में निपुण, अपकार से विमुख रहनेवाला, स्वामी के साथ अपराध करने में प्रवृत्त उनके पुत्र तथा पिता के ऊपर भी निगाह रखनेवाला अर्थात् वे स्वामी का अपराध न कर सकें:

५ शु०