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सर्वकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 129, कुल 356 में से

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पृष्ठ 129

द्वितीयोऽध्यायः ] क्वाथादिकल्पना 93


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### [बायाँ स्तम्भ]

परवल की पत्ती, लालचन्दन, मरोड़फली, कुटकी, पाठा तथा गिलोय का काढ़ा पित्तकफज्वर, कै, दाह, खुजली तथा विष को नष्ट करता है। इसका नाम 'पटोलादिगण' है।
**वक्तव्य**-विशेष देखें-सु० सू० अ० ३८।

#### कण्टकार्यादि क्वाथ
कण्टकारीद्वयं शुण्ठी धान्यकं सुरदारु च ॥ २७ ॥
एभिः शृतं पाचनं स्यात् सर्वज्वरविनाशनम्।
कण्टकारी, बनभंटा, सोंठ, धनियां तथा देवदारु का काढ़ा सभी ज्वरों को नष्ट करता है।

#### दशमूल क्वाथ
शालिपर्णीपृश्निपर्णीबृहतीद्वयगोक्षुरैः ॥ २८ ॥
बिल्वाग्निमन्थस्योनाककाश्मरीपाटलायुतैः ।
दशमूलमितिख्यातं क्वथितं तज्जलं पिबेत् ॥ २९ ॥
पिप्पलीचूर्णसंयुक्तं वातश्लेष्मज्वरापहम्।
सन्निपातज्वरहरं सूतिकादोषनाशनम् ॥ ३० ॥
शोषशैत्यभ्रमस्वेदकासश्वासविकारनुत् ।
हृत्कण्ठग्रहपार्श्वार्तितन्द्रामस्तकशूलहृत् ॥ ३१ ॥
शालपर्णी, पिठवन, कंटकारी, बनभण्टा, गोखरू, बेल का गूदी, अरणी की छाल, सोनापाठा की छाल, गम्भार की छाल तथा पाढल की छाल-ये सब द्रव्य 'दशमूल' नाम से प्रसिद्ध हैं। इनका काढ़ा पीपल का चूर्ण मिलाकर पीये। यह वातकफज्वर, सन्निपातज्वर, प्रसूति रोग, मुखशोष (मुख का सूखना), शोथशैत्य (हाथ-पाँव या सम्पूर्ण शरीर का ठण्डा होना), भ्रम (चक्कर आना), स्वेद (ज्वर रहने पर भी अधिक पसीना आना), कास, श्वास आदि विकारों को नष्ट करता है और हृदय तथा कण्ठ की रुकावट (हृदय की गति अथवा साँस जब रुकने लगती है) में यह काढ़ा देना चाहिये और यह पसली की पीड़ा, तन्द्रा (उँघाई) तथा सिर की पीड़ा को नष्ट करता है।
**वक्तव्य**-सन्निपातज्वर में उक्त लक्षणों को देखकर ही इस क्वाथ का प्रयोग करना चाहिये।

#### अभयादि क्वाथ
अभयामुस्तधान्याकरक्तचन्दनपद्मकैः ।
वासकेन्द्रयवोशीरगुडूचीकृतमालकैः ॥ ३२ ॥
पाठानागरतिक्ताभिः पिप्पलीचूर्णयुक्तशृतम्।
पिबेत् त्रिदोषज्वरजित् पिपासाकासदाहनुत् ॥ ३३ ॥
प्रलापश्वासतन्द्राघ्नं दीपनं पाचनं परम्।
विण्मूत्रानिलविष्टम्भवमिशोषारुचिं जयेत् ॥ ३४ ॥

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### [दायाँ स्तम्भ]

बड़ी हरड़ का छिलका, नागरमोथा, धनियां, लालचन्दन, पद्मकाठ, अडूसा की पत्ती, इन्द्रजौ, खस, गिलोय, अमलतास की गूदी, पाठा, सोंठ तथा कुटकी का काढ़ा, पीपल का चूर्ण मिलाकर पीये। यह सन्निपात ज्वर को जीतता है। प्यास, खाँसी और दाह को नष्ट करता है, प्रलाप (बड़बड़ाना), श्वास एवं तन्द्रा का नाशक है। अत्यन्त दीपन (अग्निवर्द्धक) तथा पाचन है और पुरीष, मूत्र तथा वायु की रुकावट को दूर करता है। कै, मुखशोष तथा अरुचि को जीतता है।
**वक्तव्य**-यह क्वाथ भी सन्निपातज्वर को शान्त करने के लिए उत्तम है।

#### पिप्पल्यादि क्वाथ
(पिप्पलीपिप्पलीमूलचव्यचित्रकनागरैः ।
वचासातिविषाजाजीपाठावत्सकरेणुकैः ॥ ३५ ॥
किराततिक्तकं मूर्वा सर्षपा मरिचानि च।
कटुकं पुष्करं भार्ङ्गी विडङ्गं कर्कटाह्वयम् ॥ ३६ ॥
अर्कमूलं बृहतिंही श्रेयसी सदुरालभा।
दीप्यकं चाजमोदा च शुकनासादिहिङ्गुभिः ॥ ३७ ॥
एतानि समभागानि गणोऽष्टविंशको मतः।
कषायमुपभुञ्जीत वातश्लेष्मज्वरापहम् ॥ ३८ ॥
हन्ति वातं तथा शीतं स्वेदजं प्रबलं कफम्।
प्रलापं चातिनिद्रां च रोमहर्षारुची तथा ॥ ३९ ॥
महावातेऽपतन्त्रे च सर्वगात्रे च शून्यताम्।
अयं सर्वज्वरान् हन्ति सन्निपातांस्त्रयोदश ॥ ४० ॥)
पीपल, पिप्पलामूल, चव्य, चीता, सोंठ, बच, अतीस, सफेद जीरा, पाठा, कुरैया की छाल, पित्तपापड़ा, चिरायता, मरोड़फली, सरसों, मरिच, कुटकी, पोहकरमूल, भारंगी, वायविडंग, काकड़ासिंगी, आक की जड़, बनभण्टा, गजपीपल, धमासा, अजवायन, अजमोद, सोनापाठा तथा हींग इन सब द्रव्यों को समान भाग में लें। इसका नाम 'अष्टाविंशक गण' है, इसमें अट्ठाईस द्रव्य हैं। इनका क्वाथ बनाकर सेवन करें। यह वात, कफ, ज्वर को नष्ट करता है, वायु को, स्वेद (पसीना) के अधिक निकल जाने से उत्पन्न हुये शीत को, बढ़े हुये कफ को, प्रलाप को, अतिनिद्रा को, रोमाञ्च तथा अरुचि को नष्ट करता है और अपतन्त्रक (हिस्टीरिया) नामक महावातव्याधि में तथा सम्पूर्ण शरीर की शून्यता (सुन्न हो जाने) में इसका प्रयोग करना चाहिये और यह काढ़ा सभी ज्वरों को तथा तेरह प्रकार के सन्निपातों को नष्ट करता है।