शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 131, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयोऽध्यायः] क्वाथादिकल्पना 95
[बायाँ स्तम्भ]
परवल की पत्ती, इन्द्रजौ, देवदारु, त्रिफला, नागरमोथा,
मुनक्का, मुलेठी, गिलोय तथा अडूसा की पत्ती का काढ़ा
शहद मिलाकर सन्तत (सात, दस अथवा बारह दिन तक
निरन्तर रहने वाले), सतत (आठ पहर में दो बार होने वाले),
द्वितीयक (दो दिन तक निरन्तर चढ़ा रहने वाला अर्थात्
चातुर्थक का विपर्यय), तृतीयक (तिजारी) तथा ऐकाहिक
(प्रतिदिन आने वाले) ज्वर में और दाहपूर्वक आने वाले
विषमज्वर तथा नवज्वर में पीना चाहिये।
पटोलादि क्वाथ
पटोलत्रिफलानिम्बद्राक्षाशम्याकवासकैः ॥ ५५॥
क्वाथः सितामधुयुतो जयेदैकाहिकं ज्वरम्।
परवल की पत्ती, त्रिफला, नीम की छाल, मुनक्का,
अमलतास तथा अडूसा की पत्ती का काढ़ा खाँड और मधु
मिलाकर पीने से 'ऐकाहिक' (अन्येद्यु) ज्वर को जीतता है।
गुडूच्यादि क्वाथ
गुडूचीधान्यमुस्ताभिश्चन्दनोशीरनागरैः ॥ ५६॥
कृतं क्वाथं पिबेत् क्षौद्रसितायुक्तं ज्वरातुरः।
तृतीयज्वरनाशाय तृष्णादाहनिवारणम्॥ ५७॥
गिलोय, धनियां, नागरमोथा, लालचन्दन, खस और सोंठ
के काढ़े को मधु तथा मिश्री मिलाकर ज्वर रोगी, तृतीयक
ज्वर को नष्ट करने के लिए पीये। यह काढ़ा प्यास और दाह
का निवारण करता है।
देवदार्वादि क्वाथ
देवदारुशिवावासाशालिपर्णीमहौषधैः ।
धात्रीयुतं शतं शीतं दद्यान्मधुसितायुतम्॥ ५८॥
चातुर्थिकज्वरे श्वासे कासे मन्दानले तथा।
देवदारु, बड़ी हरड़, अडूसा का पत्ती, शालपर्णी, सोंठ
तथा आँवला का काढ़ा ठंडा किया हुआ, मिश्री तथा शहद
मिलाकर चातुर्थक (चौथैया) ज्वर, श्वास, कास और मन्दाग्नि
में पीना चाहिये।
बृहद्गुडूच्यादि क्वाथ
गुडूचीधान्यकोशीरशुण्ठीबालकपर्पटैः ॥ ५९॥
बिल्वप्रतिविषापाठारक्तचन्दनवत्सकैः ।
किरातमुस्तेन्द्रयवैः क्वथितं शिशिरं पिबेत्॥ ६०॥
सक्षौद्रं रक्तपित्तघ्नं ज्वरातीसारनाशनम्।
गिलोय, धनियां, खस, सोंठ, नेत्रबाला, पित्तपापड़ा, बेल
की गुद्दी, अतीस, पाठा, लालचन्दन, कुरैया की छाल, चिरायता,
[दायाँ स्तम्भ]
नागरमोथा तथा इन्द्रजौ का काढ़ा ठंडा करके तथा मधु मिलाकर
पीना चाहिये। यह काढ़ा रक्तपित्त तथा ज्वरातीसार को नष्ट
करता है।
नागरादि क्वाथ
नागरं कुटजो मुस्तममृतातिविषा तथा॥ ६१॥
एभिः कृतं पिबेत् क्वाथं ज्वरातीसारनाशनम्।
सोंठ, कुरैया की छाल, नागरमोथा, गिलोय और अतीस
का काढ़ा पीने से यह ज्वरातीसार को नष्ट करता है।
वक्तव्य- ज्वरातिसार ज्वर तथा अतिसार का सम्मिलित
रूप है। इसमें ज्वर के साथ अतिसार की प्रवृत्ति होती है। यही
इस नाम की चरितार्थता है।
धान्यपञ्चक क्वाथ
धान्यबालकबिल्वाब्दनागरैः साधितं जलम्॥ ६२॥
आमशूलहरं ग्राहि दीपनं पाचनं परम्।
धनियां, नेत्रबाला, बेल की गुद्दी, नागरमोथा तथा सोंठ
का यथाविधि बनाया हुआ क्वाथ आमशूल (पेचिस) को
हरता है, मल को रोकता है। यह अत्यन्त दीपन तथा पाचन है।
धान्यनागर क्वाथ
धान्यनागरजः क्वाथः पाचनो दीपनस्तथा॥ ६३॥
एरण्डमूलयुक्तश्च जयेदामानिलव्यथाम्।
धनियां और सोंठ का काढ़ा पाचन तथा दीपन है और
एरण्ड की जड़ से युक्त उक्त क्वाथ आमवात (गठिया) की
पीड़ा को जीतता है।
वत्सकादि क्वाथ
वत्सकातिविषाबिल्वमुस्तबालकजः शृतः॥ ६४॥
अतीसारं जयेत् सामं चिरजं रक्तशूलजित्।
कुरैया की छाल, अतीस, बेल की गुद्दी, नागरमोथा तथा
नेत्रबाला का बनाया हुआ काढ़ा आँव से युक्त पुराने अतिसार
को जीतता है और रक्तातिसार तथा शूल को नष्ट करता है।
वक्तव्य- 'न तु सङ्ग्रहणं देयं पूर्वमामातिसारिणे' (च०
चि० अ० 19)। अर्थात् आमातिसार में पहले ही रोकने वाली
औषध का प्रयोग नहीं करना चाहिये। इस अवस्था में दीपन-
पाचन औषधियाँ देनी चाहिये। भुनी सौंफ का चूर्ण तथा
इसबगोल के बीज या उसकी भूसी बहुत लाभदायक होती है।
कुटजाष्टक क्वाथ
कुटजातिविषापाठाधातकीलोध्रमुस्तकैः ॥ ६५॥
ह्रीबेरदाड़िमयुतैः कृतः क्वाथः समाक्षिकः।