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शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 126, कुल 356 में से

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पृष्ठ 126

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द्वितीयोऽध्यायः
क्वाथादिकल्पना


[बायाँ स्तम्भ (Left Column)]

क्वाथ बनाने की विधि
पानीयं षोडशगुणं क्षुण्णे द्रव्यपले क्षिपेत्।
मृत्पात्रे क्वाथयेद् ग्राह्यमष्टमांशावशेषितम् ॥१॥
तज्जलं पाययेद्धीमान् कोष्णं मृद्वग्निसधितम्।
श्रुतः क्वाथः कषायश्च निर्यूहः स निगद्यते ॥२॥
जौकुट किये (कुछ-कुछ कुटे या दर्दरा चूर्ण किये) हुये
एक पल (4 तोला) द्रव्य (औषधि) में सोलह गुना पानी
डालकर मन्द-मन्द अग्नि से काढ़ा करें, आठवाँ भाग अवशिष्ट
(शेष) रहने पर उतार लें, तत्पश्चात् बुद्धिमान् चिकित्सक इसे
छानकर कुछ-कुछ उष्ण क्वाथ को पिलाये। इस परिपक्व
जल का नाम श्रुत, क्वाथ, कषाय एवं निर्यूह है।
वक्तव्य—'धीमान्' शब्द का प्रयोग करके आचार्य
शार्ङ्गधर ने सूचित किया है कि औषध एवं जल के परिमाण
की व्यवस्था विद्वान् चिकित्सक स्वयं करे। क्वाथ्य द्रव्य
जितने जल में भली प्रकार कोमल या मृदु हो सकें उतना जल
देना चाहिये। क्वाथ करने से औषधियों के घुलनशील अंश
जल में घुल जाते हैं, जिससे काढ़ा कुछ गाढ़ा हो जाता है और
क्वाथ को छानते समय भली प्रकार मलकर छान लेना चाहिये,
जिससे उसका सार भाग पूर्ण रूप से जल में घुलकर आ
सके।

क्वाथ-पान की विधि
आहाररसपाके च सञ्जाते द्विपलोन्मितम्।
वृद्धवैद्योपदेशेन पिबेत् क्वाथं सुपाचितम् ॥३॥
आहार के रस का भली प्रकार पाक हो जाने पर अनुभवी
वैद्य की सम्मति के अनुसार यथाविधि पकाया हुआ दो पल
(8 तोला) क्वाथ पीना चाहिये।
**वक्तव्य—**यहाँ भी 'वृद्धवैद्य' को ही उत्तरदायी ठहराया
गया है, अर्थात् कब और कितना क्वाथ किसको पिलाना
उचित है, इसका तात्कालिक निर्णय वैद्य स्वयं करें।


[दायाँ स्तम्भ (Right Column)]

क्वाथ में मधु आदि का परिमाण
क्वाथे क्षिपेत् सितामंशैश्चतुर्थाष्टमषोडशैः।
वातपित्तकफातङ्के विपरीतं मधुस्मृतम् ॥४॥
काढ़े में शर्करा (खाँड़) वातरोग में चौथाई भाग, पित्तरोग
में आठवाँ भाग तथा कफरोग में सोलहवाँ भाग डालना चाहिये
और मधु (शहद) इसके विपरीत अर्थात् वातरोग में सोलहवाँ
भाग, पित्त में आठवाँ भाग और कफ में चौथाई भाग डालना
चाहिये।

क्वाथ में जीरा आदि का परिमाण
जीरकं गुग्गुलं क्षारं लवणं च शिलाजतु।
हिङ्गु त्रिकटुकं चैव क्वाथे शाणोन्मितं क्षिपेत् ॥५॥
काढ़े में जीरा, गुगुल, क्षार, नमक, शिलाजीत, हींग एवं
त्रिकटु (सोंठ, मरिच, पीपल) एक-एक शाण (4-4 आना
भर) डालना चाहिये।
**वक्तव्य—**जीरा और हींग को थोड़े घी में भूनकर तथा
चूर्ण बनाकर, गुगुल तथा शिलाजीत को शुद्ध कर एवं क्षार,
नमक तथा त्रिकटु (सोंठ, मरिच, पीपल) को चूर्ण बनाकर
क्वाथ पीते समय डालना चाहिये।

क्वाथ में दूध आदि का परिमाण
क्षीरं घृतं गुडं तैलं मूत्रं चान्यद् द्रवं तथा।
कल्कं चूर्णादिकं क्वाथे निक्षिपेत् कर्षसम्मितम् ॥६॥
क्वाथ में दूध, घी, गुड़, तैल, मूत्र (गोमूत्र आदि) अन्यान्य
द्रव (नीबू आदि का रस), कल्क तथा चूर्ण आदि एक कर्ष
(तोला) डालना चाहिये।

क्वाथ पकाने को विधि
(अविधानमुखे पात्रे जलं दुर्जरतां व्रजेत्।
तस्मादावरणं त्यक्त्वा क्वाथादींश्च विपाचयेत् ॥७॥)
पात्र का मुँह ढँक देने से क्वाथ दुर्जर (दुःख से पचने...