Skip to content
SarvaKosh
Back to the archive

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages
Page 80Permalink

४० सौंदर्य लहरी
है। अर्थ स्वरूपा देवी आदि काम से उदय होकर संकल्प रूप
धारण करके सृष्टि, स्थिति और प्रलय की कल्पना करती है
और ब्रह्मा के दिन में स्थिति करके कल्प का निर्माण करती है ।
संकल्प, कल्पना और कल्प तीनों शब्दों की व्युत्पत्ति क्लृप् (सामर्थ्ये)
धातु से होती है अर्थात् भगवती के सामर्थ्य का विकास अथवा
प्रदर्शन स्वरूप आद्योपान्त सारा कल्प है इसलिये उसका रूप
क्लृप् धातु से क्लीं बनता है। ब्रह्मा का दिन जिसको कल्प कहते
हैं और जिसकी अवधि १००० चतुर्युगी का समय १२०००
दिव्य वर्ष अथवा १२००० × ३६० = ४३२००० मानुषी वर्ष हैं,
भगवती के क्लीं बीज के सामर्थ्य से कल्पित हैं, जो महेश्वर की
काम अथवा संकल्प शक्ति का स्वरूप हैं। इसी अभिप्राय से
भगवती को कामेश्वरी भी कहते हैं। और सौंदर्य लहरी में सर्वत्र
भगवती के स्वरूप को कामदेव से भी उपमित किया गया है।
यहां यह भी स्मरण रहे कि कामदेव की उपास्य विद्या मूल कादि
विद्या ही है और क्लीं को काम बीज भी कहते हैं।
उपरोक्त शिव, शक्ति, सदाशिव, महेश्वर और शुद्ध विद्या को
शुद्ध तत्व कहते हैं। प्रथम दो शांतातीता और अन्तिम तीन
शान्तिकला के तत्व माने जाते हैं।
फिर तीसरा माया कला का स्तर शुद्धाशुद्ध विद्या का स्तर
माना जाता है जिसे गीता में भगवान ने परा प्रकृति कहा है। माया
का प्रस्तार देश (कला) और काल में होता है और जो नियति अर्थात
प्राकृतिक नियमों के सूत्र में बंधा हुवा है जिनके अविद्या स्वरूप
ज्ञान का जानकार होकर शिव स्वयं राग के पाश में बंध जाता है

Page 81Permalink

सौंदर्य लहरी ४१
और जीव कहलाने लग जाता है, इसलिये माया के सात तत्व शुद्धा-
शुद्ध तत्व कहलाते हैं उनके नाम यह हैं-माया, काल, कला, नियति,
अविद्या, राग और पुरुष । इस स्तर को विद्या कला कहते हैं । कला
पांच हैं-शान्त्यातीता, शांति, विद्या, प्रतिष्ठा और निवृत्ति । काल से
राग तक पांच तत्व पांच कंचुक कहलाते हैं जो माया के पांच
आवरण या पांच केंचुलियां हैं, और जो शिवकी चितिशक्तिको काल
से, क्रिया शक्ति को कला से, ज्ञान शक्ति को विद्या से, इच्छाशक्ति
को राग से और आनंद कों नियति से आवृत करके उसे जीव बना
देते हैं । अशुद्ध तत्व २४ हैं जिनके नाम नीचे दिये जाते हैं:—
(१) अव्यक्त प्रकृति (२) महत् (३) अहंकार (४) मन
(५-९) पांच ज्ञानेन्द्रियां (१०-१४) पांच कर्मेन्द्रियां
(१५-१९) पांच तन्मात्राएं (२०-२४) पांच महाभूत । प्रथम
२३ तत्व प्रतिष्ठा कला के अन्तर्गत हैं और अन्तिम पृथिवी तत्व
निवृत्ति कला कहलाता है । सब तत्वों का योग ३६ है और
कलाएं पांच हैं।
ह्रीं का उदय आकाश से होता है, इसकी पीठ बिशुद्ध चक्र में
है और उसका आयतन सहस्रार तक है । श्रीं का
बीज मंत्र द्वारा उदय स्थान भी आकाश है, इसलिये उसकी
ब्रह्मोपासना पीठ विशुद्ध है और आयतन आज्ञाचक्र तक है ।
ऐं का उदय अग्नि से है, इसलिये उसकी पीठ मणिपुर है और
आयतन वाक शक्ति का स्थान विशुद्ध चक्र है और विकास स्थान
जिव्हाग्र भाग है । इन तीनों में अग्नि ही प्रमुख है । क्लीं में लकार

Page 82Permalink

४२ सौंदर्य लहरी
से पृथिवी तत्व की प्रधानता लिये हुए वायु तत्व है । कं से जल भी
लिया जाता है । इसकी पीठ मूलाधार है और आयतन काम, संकल्प
और कामना तीनों में होने के कारण स्वाधिष्ठान और अनाहत् एवं
आज्ञा चक्र तक है । वाक्शक्ति का संबंध संकल्पों से है, इसलिये
ऐं का साथ क्लीं से है और शक्ति का प्रकाश कांति में होता है,
इसलिये हीं का साथ श्रीं से है । ऐं क्लीं बाला मंत्र के अंग हैं,
जो सब कामनाओं का देने वाला है, उसका दो प्रकार से प्रयोग
किया जाता है । ह्रीं श्रीं कों प्रथम रख कर अथवा उसे गर्भ में
लेकर-इसलिये ह्रीं श्रीं ऐं क्लीं और ऐं न्हीं श्रीं क्लीं दो रूप बन जाते
हैं । यहां यह स्मरण रहे कि प्रत्येक मंत्र का आदि अक्षर अथवा
बीजमंत्र सारे मंत्र का प्रमुख होकर उस मंत्र का संचालन करता
है । मंत्र विज्ञान एक स्वतंत्र विज्ञान है जो पुस्तकों के आधार पर
नहीं जाना जा सकता । जो लोग केवल पुस्तकों को पढकर किसी
मंत्र का अनुष्ठान करते हैं, वे उस खिलाडी के सदृश हानि उठा
सकते हैं जो तलवार चलाना न जानने के कारण अपना ही अंग
काट लेता है । सिद्धि प्राप्त करने के इच्छुकों को प्रत्येक मंत्र के
उपदेश की दीक्षा किसी जानकार देशक (दीक्षा देने वाले) से
मन्त्र रहस्य समझ कर लेनी चाहिये । क्योंकि मंत्रों का अनुष्ठान
अग्नि के साथ खेल खेलने के सदृश है । यहां पर केवल मंत्र बीजों
की भावना करने की विधि पर प्रकाश डाला गया है जिससे साधक
विज्ञान को समझ कर तद्रूप भावना सहित अभ्यास बढावें क्योंकि
कहा है कि विज्ञान को समझ कर अनुष्ठान करने से विद्या वीर्यवती
होती है । यथा “ यदेव विद्यया करोति श्रद्धयोपनिषदा तदेव वीर्य-
वत्तरं भवति ।” (छा. १, १, १०)

Page 83Permalink

सौंदर्य लहरी ४३
क्लीं बीज (मकार युक्त ककार) से बनता है। ककार से
काम, जल, और प्राण एवं सुख का अर्थ लिया जाता है। कं
जल को कहते हैं और प्राण को भी। कं का अर्थ सुख भी होता
है। जल के बेध से प्राण का विकास होता है, और प्राण का
स्थूल रूप वायु है। वायु का कारण आकाश है। और आकाश
का कारण सूक्ष्म प्राण है, प्राण स्वयं ब्रह्म का तेज है। इसलिये
कहा है कि—"प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्मेति। यद्वाव कं तदेव खं
तदेव कमिति प्राणं च हास्मै तदाकाशं चोचुः।" (छा. ४,१०,५)
अर्थात—प्राण ब्रह्म है, कं ब्रह्म है, खं ब्रह्म है, अथवा जो कं है
वह ही खं है, जो खं है वह ही कं है और वह ही प्राण है।
खं का अर्थ आकाश भी होता है, इसलिये कं, खं, और प्राण
तीनों ब्रह्म वाचक है। ऐसा भी कहा है कि—"अन्नमयं हि
सौम्य मनः अपोमयः प्राणस्तेजो मयी वाक्।" (छा. ६,७,६)
क्लीं में ककार के साथ लकार भी है, जो पृथिवी का अक्षर
है। पृथिवी के बेध से अन्न होता है, और अन्न से मन। मूलाधार
क्लीं बीज की पीठ है, जहां पर पृथिवी और जल दोनो का बेध
होकर मन और प्राण के विकास में सहायता मिलती है। मन का
बेध आज्ञाचक्र में होता है। मन आनन्द का स्थान है और आनन्द
ब्रह्म है। इस प्रकार क्लीं की सहायता से प्राण और मन दोनों के
द्वारा ब्रह्म की प्राप्ति होती है। इसी प्रकार ऐं अग्नि बीज है। अग्नि
से वाक् और वाक् से ज्ञान की प्राप्ति होती है, और ज्ञान स्वयं
ब्रह्म है। सूर्य भी अग्नि ही हैं। सूर्य से दृष्टि का उदय होता है
और दृष्टि सत्य की पीठ है। सत्य स्वयं ब्रह्म है। स्थूल प्राण का

Page 84Permalink

४४ सौंदर्य लहरी
स्थान हृदय है और प्राण सबको प्रिय होते हैं। इसलिये प्राण प्रेम
भक्ति की पीठ है। अर्थात हृदय में प्रेम भक्ति का उदय होता है,
और प्रेम का भाव स्वयं ब्रह्म है। प्राण की सूक्ष्म गतिद्वारा वायु का
वेध होकर आकाश का वेध होता है। आकाश से श्रवणेन्द्रिय की
उत्पत्ति है जो अनंत की पीठ है। अनंत स्वयं ब्रह्म है। हृदय से
अहं भाव की भी स्फुरणा होती है। और अहं मे सत् की पीठ हैं
और सत् स्वयं ब्रह्म है। इस प्रकार ऐं और क्लीं दोनो से सब चक्रों
का वेध होकर ब्रह्म की प्राप्ति की जाती है। यह विज्ञान बृहदारण्यक
उपनिषत् के चतुर्थ अध्यायोक्त याज्ञवल्क्य—जनक संवाद के आधार
पर बताया गया है, देखें प्रथम ब्राह्मण। इसी प्रकार वाग्भव कूट को
समझना चाहिये। वाग्भव कामकला और शक्ति कूट जो ह्रीं
युक्त हैं और लक्ष्मी बीज जिसकी सोलहवीं कला है, पूरा
मंत्रराज बनता है।
श्लोक की प्रथम पंक्ति में कहा गया है कि शिव शक्ति से
स्पन्द ही शक्ति है युक्त होकर प्रभव करता है। —“नहि तया बिना
परमेश्वरस्य सृष्टृत्वं सिध्यति” (शंकर भास्य ब्र.सू.
१-४-३) उसके बिना परमेश्वर का सृष्टृत्व सिद्ध नहीं होता।
दूसरी पंक्ति में कहा है कि शिव शक्ति से युक्त न हो तो वह
स्पंदित भी नहीं हो सकता। इसका अर्थ यह है कि शक्ति से
युक्त ब्रह्म स्पंदित होता है। “तदेजति तन्नैजति” (ईश ५) वह
स्पंदित होता है और वह स्पन्द नहीं होता, ऐसा श्रुति कहती है।
अब यह बात विचारणीय है कि स्पन्द शक्ति का धर्म है या शिव
का अथवा दोनों का। स्वभाव से निष्क्रिय, शांत और निरंजन पद

Page 85Permalink

The uploaded image is completely blank (contains no text or content). Please provide an image with visible text to transcribe.

Page 86Permalink

४६ सौंदर्य लहरी
यदा पंचावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह ।
बुद्धिश्च न विचेष्टति, तमाहुः परमांगतिम् ॥
ताँ योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रिय धारणाम् ।
अप्रमत्तस्तदा भवति योगो हि प्रभवाप्ययौ ॥
(क. ६, १०, ११)
अर्थः—जब पांचों ज्ञानेन्द्रियां मन सहित स्थिर हो जाती हैं
और बुद्धि चेष्टा नहीं करती, उस अवस्था को परमगति कहते हैं,
तब मनुष्य अप्रमत्त हो जाता है, अर्थात शांति प्राप्त करता है ।
इसलिये प्रभव और अप्यय ही योग है ।
इंद्रियां और मन प्रकृति रूपा शक्ति के विकार हैं, और बुद्धि
महत तत्व रूपी सिन्धु की एक तरंग है । महत् तत्व समष्टि हैरण्यगर्भ
बुद्धि ही है । इसलिये बुद्धि को तीनों गुणों की विषमता होने पर
शक्ति की अभिव्यक्ति की एक तरंग कहा जा सकता है । कहा
भी है:—
या देवि सर्व भूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै ३ नमोनमः ॥ (दुर्गा सप्त)
अहंवृत्ति का कारण आत्मा है और इदं का रूप बुद्धि है !
दोनों का इतरेतर अध्यास बन्धन का कारण हैं । एक का दूसरे के
गुणों का आरोप अपने उपर कर लेने को अध्यास कहते हैं । अर्थात
आत्मा अपने उपर बुद्धि के विकारों का आरोप करके स्वयं को

Page 87Permalink

सौन्दर्य लहरी ५७
विकारी मानने लगता है, और बुद्धि अपने को आत्मतत्व समझने
लगती है । अनात्मनि आत्मख्याति रुपी यह अविद्या है । परन्तु
शिवतत्व में अविद्या का अभाव होने से अध्यास नहीं होता । आत्मा
में अहं इदं का कभी उदय होना कभी अस्त होना यह प्रकट करता
है कि नित्य निर्विकार शुद्ध स्वरूप आत्मा दोनों से पृथक है । इदं
सत्य है अथवा असत्य ! सत्यवत दिखता है, परन्तु अहं के आधार पर
उसका उदय अस्त होने से उसकी असत्यता सिद्ध होती है । इसलिये
इसको शंकर भगवत्पाद ने अनिर्वचनीय-ख्याति कहा है । अर्थात
यह नहीं कहा जा सकता कि शक्ति की शक्तिमान से अभिन्न सत्ता
रहते हुवे भी वह विपरीत धर्मा कैसे उदय-अस्त हुआ करती है ।
इसी अभिन्नता को लेकर श्रुति कहती है-“तदेजति तन्नैजति” (ईश)
प्राणतत्व और अध्यात्म तथा आधिभूत भाव
यदिदं जगत्सर्व प्राण एजति निः सृतम् ।
महद्भयं वज्रमुद्यतं य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥
( कठ २,६,२ )
अर्थः—यह जो समस्त जगत है वह प्राण के स्पन्दित होने
पर निकलता है । वह प्राण वज्र के सदृश्य बडा भय वाला है,
अर्थात उसके भय से अग्नि तपता है और सूर्य उदय अस्त होता है ।
जो उसको जान लेते हैं, वे अमर हो जाते हैं ।
भयादस्याग्निस्तपति भयात्तपति सूर्यः । ( क. २.६,३ )
प्राण यहां ब्रह्म वाचक है और वही जीवन शक्ति है ! कहा
है वह प्राण का भी प्राण है । उपरोक्त श्रुति में कहा गया है कि

Page 88Permalink

८ सौंदर्य लहरी
ारा जगत प्राण के स्पन्द से बना है । जिस प्राण मे स्पन्द कहा
या है उसे आत्मा की रश्मिवत् समझना चाहिये, जैसे चुम्बक से
सकी किरणें निकला करती है । स्पन्द चुम्बक में नहीं होता, वरन
सकी किरणों में होता है । वह समष्टि प्राण सृष्टि का आदि कारण
और शक्ति का ही रूप है । नीचे के स्तरों पर यह प्राणशक्ति
ो रूप धारण कर लेती हैं । एक अध्यात्म और दूसरा अधिभूत ।
अधिभूता शक्ति का परिणाम सारा जगत है, जो अध्यात्म रूपके
ाकाश से सर्वत्र प्रतिभासित हो रहा है। इस विषय का भगवान
ं गीता में इस प्रकार वर्णन किया है:—
अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते ।
भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः ॥
( गीता ८, ३ )
अर्थ:— ब्रह्म अक्षर है, उसमें दो भावों का उदय होता है एक
अध्यात्म और दूसरा अधिभूत । अध्यात्म भाव ब्रह्म का स्वभाव है
अर्थात उसका अपना ही भाव होने के कारण वह अहं चेतन भाव है
और दूसरा अधिभूत भाव उद्भव करने वाला है यह भी ब्रह्म का ही
भाव है । इस दूसरे भाव का कर्म सारा जगत है । यह अधिभूत
भाव क्षर अथवा नाशवान है ।
सच्चिदानन्द ब्रह्म अक्षर है अर्थात उसकी सत्ता ज्ञान स्वरूप
है और आनन्दमयी है, परन्तु अहं और इदं दोनों भाव से अतीत
होने के कारण परम भाव कहलाता है । उससे अहम् और इदम्

Page 89Permalink

सौंदर्य लहरी ४९
दोनों भावों का उदय होने पर एक को अध्यात्म और दूसरे को
अधिभूत भाव कहते हैं। अध्यात्म भाव उसी का स्वभाव वाला
अर्थात सच्चिदानन्द स्वरूप है और अविनाशी और अपरिणामी भी
हे। अधिभूत भाव क्षर और परिणामी है जिसके परिणाम से सारा
जगत बनता बिगडता है। अक्षर निस्पन्द परम शिव है और
अध्यात्म में अहंता होने के कारण सस्पन्द शिव ईश्वरभाव और
जीवभाव का समावेश है। अधिभूत भाव को उद्भव करने वाले
भाव को ही आदि शक्ति कहा है जो ब्रह्म का ही एक भाव है।
परमभाव को प्राप्त करने के लिये सब स्पन्दों का निरोध करके
अहं भाव में स्थिति करनी पडती है। कहा है—“आत्मसंस्थं मनः
कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत् ” (गी. ६-२५) अर्थात–आत्मभाव में
मन को स्थिर करके इदम् जगत का कुछ भी चिन्तन नहीं करना
चाहिये। यह योग का सब से उत्कृष्ट साधन है। यही अहंग्रह उपासना
का अन्तिम स्वरूप है और इसी को निदिध्यासन भी कहते हैं।
समष्टि प्राण को ही हिरण्यगर्भ कहते हैं जिसको सांख्य
हिरण्यगर्भ महत्तत्व कहता है और वह ही प्राणिमात्र की
बुद्धियों का आदि कारण स्वरूप समष्टि बुद्धि है।
प्राणतत्व और हिरण्यगर्भ
दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः सबाह्याभ्यन्तरोह्यजः ।
अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्षरात्परतः परः ॥२॥
एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणिच ।
खं वायु र्ज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी ॥३॥ (मु.२,१)

Page 90Permalink

५० सौँदर्य लहरी
अर्थः—वह ब्रह्म पुरुष दिव्य और अमूर्त है, अजन्मा बाह
अभ्यन्तर सर्वत्र व्यापक है, वह प्राण और मन रहित-शुभ्र है और
अक्षर (प्रकृति, अव्यक्त) से अति सूक्ष्म है। उससे प्राण उत्प
होता है, और फिर मन, सब इन्द्रियां, आकाश, वायु, तेज, आ
और विश्व को धारण करने वाली पृथिवी उत्पन्न होते हैं ।
यहां पर महत् के स्थान पर प्राण की उत्पत्ति कही गई है
इसलिये समष्टि प्राण जिसको हिरण्यगर्भ भी कहते हैं, महत् तत्
से भिन्न कोई अन्य तत्व नहीं है। शंकर भगवत्पाद ने ब्रह्म सू
(२, ४, १३) 'अणुश्च' के भाष्य में समष्टि व्यष्ट्यात्मक विश
प्राणों को अधिदैविक हैरण्यगर्भ प्राण कहा है। और ब्रह्म सू
(१, ४, २) के भाष्य में महत् को हैरण्यगर्भी बुद्धि बताया है। शु
ब्रह्म की तेजोमयी रश्मियां ही जीवन शक्ति रूपी प्राण की किर
हैं और इस प्रथमज विभु प्राण को ही हिरण्यगर्भ कहते हैं, जैसा f
नीचे दिये मंत्र से भी विदित होता है ।
हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् ।
सद्धार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥
हिरण्यगर्भ की बुद्धि और चित्त दोनों महत् तत्व के ही रू
हैं। महत् से अहंकार की उत्पत्ति होती है। चित्तस्वरूप महत् वासुदे
भगवान विष्णु है, बुद्धि स्वरूप महत् ब्रह्मा और अहंकार रुद्र शि
अथवा हर है। इसलिये आदि शक्ति तीनों की जननी सह
आराध्या है।

Page 91Permalink

सौंदर्य लहरी ५१
श्लोक की तीसरी पंक्ति में देवी को हरिहर और ब्रह्मा की
[अकृत पुण्य भजन] आराध्य देवता कहा गया है। क्योंकि सृष्टि की
[नहीं कर सकते] उत्पत्ति, पालन और संहार असद्विद्या में ही होते
हैं। शुद्ध विद्या इनकी भी आराध्या है फिर
अकृत पुण्य पापी जीवों की तो वहां गति ही कैसे हो सकती है, वे
तो स्तुति और प्रणाम भी नहीं कर सकते। भगवान ने भी गीता
में कहा है:—
न मां दुष्कृतिनो मूढाःप्रपद्यन्ते नराधमाः ।
माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः ॥ (७-१)
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् ।
ते द्वंद्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः ॥ (७-२८)
महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः ।
भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् (९-१३)
हरि भी रजोगुण की शक्ति लक्ष्मी के बिना पालन नही कर
सकते, हर भी सत्व गुण की शक्ति उमा की सहायता से संहार
करते हैं, तमोगुण के वशीभूत होकर बिना सोचे समझे संहार करना
तो विश्व के कल्याणार्थ नहीं हो सकता, उनकी संहार शक्ति इसलिये
सात्विक ज्ञानमयी है । और ब्रह्मा की सृष्टृत्व शक्ति, तामसी मोहा-
सक्ति के बिना उनके ज्ञान वैराग्य पर आवरण डाले, सृष्टि
कार्य में उन्हें कैसे प्रवत कर सकती थी । इसलिये ब्रह्मा तमोगुण
की शक्ति से युक्त होकर सृष्टि करते हैं । प्रथम मानसिक सृष्टि के
सनकादि पुत्रों में ज्ञान वैराग्य देखकर तो उन्हें मैथुनिक सृष्टि क

Page 92Permalink

५२ सौंदर्य लहरी
आश्रय लेना पडा । इसी लिये श्लोक में कहा गया है कि हे मां !
तू ही तीनों की आराध्या है ।
गुरु को शिव स्वरूप कहते हैं। जब गुरु शक्ति से युक्त
दीक्षा का शक्ति होता है तब ही वह दीक्षा देकर शिष्य की
से सम्बन्ध । प्रसुप्त शक्ति कुण्डलिनी को जागृत कर सकता है
अन्यथा नहीं । जब तक शक्तिसंपन्न गुरु का
अनुग्रह नहीं होता, तब तक शिष्य चाहे कितना भी विद्वान क्यों
न हो, पुस्तकों से पढे हुवे मन्त्र से सिद्धि प्राप्त नहीं कर सकता ।
भगवान राम और कृष्ण को भी गुरु करना पडा था, फिर अन्य
साधारण मनुष्यों की तो बात ही क्या है । अकृतपुण्य पापी जन तो
गुरु की शरण में जा ही नहीं सकते, जब अनेक जन्मों के पुण्यों का
उदय होता है तब ही सद्गुरु का समागम मिलता है । शक्ति के
बिना जैसे शिव स्पन्दितुमपि न कुशलः तद्वत शक्ति के बिना
शिव स्वरुप गुरु भी शिष्य में शक्ति जागरण करने की कुशलता
नहीं रखता और शिष्य में भी मंत्र चैतन्य का प्रकाश नहीं होता ।
मंत्र चैतन्य के बिना मंत्र सिद्धि की बात करना तो बालू से तेल
निकालने के बराबर है ।
शिष्य में भी उसका अन्तरात्मा शिव है, परन्तु वह शिव उसको
माया की भ्रांति में डालता रहता है ।
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥ (गी.१८-६१)

Page 93Permalink

सौंदर्य लहरी ५३
उसकी शरण में अकृत पुण्य नहीं जा सकते। पुण्य प्रभाव से
जब सद्गुरू की प्राप्ति होती है, तब गुरू शिष्य की शक्ति का
जागरण करके उसे शक्ति से युक्त कर देता है और शक्ति से युक्त
होकर शिष्य का अन्तरात्मा स्पंदित होता है और मोक्ष का पथ-
प्रदर्शन कराता है। इसलिये जब तक शक्ति का जागरण नहीं होता,
शिष्य भी गुरु का अनुगृहीत नहीं होता अर्थात् शिष्यस्थ शिव
स्पंदित नही होता।
श्री विद्या आदि ब्रह्म विद्या है उसके कादि और हादि मन्त्रों
श्री विद्या के अनुसार दो अंग होते हैं जिनके दो प्रथम अक्षर
शिव और शक्ति के द्योतक हैं और उन्हीं के
आधार पर पूर्ण विद्याएं सिद्ध होती हैं। अर्थात् शक्ति के योग के
बिना शिव का अक्षर अकेला मन्त्र नहीं बना सकता। तीसरा अक्षर
सदाख्य तत्व, चौथा महेश्वर और पांचवा शुद्ध विद्या के द्योतक हैं।
दोनों अक्षरों के पश्चात् तीसरा काम का द्योतक है। चौथा फिर
शिव वाचक है जिसके काम अर्थात ईक्षण ( इच्छा ) से पृथ्वी तक
व्याप्त है। पांचवा अक्षर पृथ्वी का अक्षर है। इस प्रकार ईश्वर,
जीव और विश्व का भेद दिखाने वाला दूसरा कूट विद्या कला का
संकेत कराता है। तीसरा कूट शक्ति कूट है जो प्रतिष्ठा और
निवृत्ति का संकेत कराता है। इस प्रकार कादि विद्या प्रभव मन्त्र
है। इसलिये इस श्लोक में यह पद कि शक्ति के योग से ही शिव
प्रभव करता है श्री विद्या का प्रतिपादन करने वाले इस ग्रंथ के
प्रथम श्लोक में मंगलाचरणार्थ लिखा गया है।

Page 94Permalink

५८ सौंदर्य लहरी
जब तक किसी विद्या के आधार वेद नहीं सिद्ध होते, तब
श्री विद्या का \t तक वह विद्या ऋषियों को मान्य नहीं होती,
आधार वेद- \t परन्तु श्री विद्या तांत्रिक है और वह श्री गौड-
वेदांत \t पादाचार्य शंकराचार्य प्रभृति की इष्ट थी, इसलिये
उसे श्रुतियों का आधार है यह बात निश्चित ही
है। परन्तु हम यहां विशेष रूप से इस विषय पर विचार करने का
यत्न करते हैं। वेदों के मत से ईश्वर ही सृष्टि का कारण है। यह
बात 'जन्माद्यस्ययतः' (ब्र. १, १, २) में कही गई है। क्योंकि सब
शास्त्र ऐसा ही सिद्ध करते हैं और जहां कहीं उनके सृष्टि क्रम में
भिन्नता दिखाई देती है, उन सब का समन्वय किया जा सकता है यह
बात, 'शास्त्रयोनित्वात्' (ब्र. १, १, ३) और 'तत्तुसमन्वयात्' (ब्र.
१, १, ४) इन दो सूत्रों में सिद्ध की गई है। जो लोग सृष्टि की उत्पत्ति
ब्रह्म से स्वतंत्र किसी अन्य प्रकृति तत्व से सिद्ध करते हैं, उनके
वादों का खण्डन ग्रंथ के उत्तर भाग में किया गया है। कोई-कोई
वाद ईश्वर को मानकर भी प्रकृति की सत्ता स्वतंत्र अथवा अंग-
अंगी भाव से बताकर ईश्वर को केवल निमित्त कारण ही मानते हैं,
वे वाद भी श्रौत नहीं हैं, जैसा कि श्रुतियों के पढने से स्पष्ट प्रतीत
होता है। क्योंकि कहीं तो सृष्टिका उदय ईश्वर के ईक्षण या कामनासे
वर्णित है, कहीं एजृत्व अर्थात स्पन्दनसे वर्णित है, कहीं मायासे, कहीं
शक्ति से, कहीं प्रकृति से। उस परमात्म शक्ति कोही कही आकाश,
कहीं अग्नि, कहीं माया, कहीं प्राण, कहीं वायु, कहीं प्रकृति प्रभृति
शब्दों से व्यक्त किया गया है। इसका कारण यह है कि उस आदि
शक्ति का स्वरूप किसी की समझ में नहीं आ सकता, इसलिये

Page 95Permalink

श्रुतियों में उसे समझाने के लिये अनेक प्रकार से चेष्टा की गई है।
परन्तु सब श्रुतियों का अभिप्राय एक ही है। वह ईश्वर में उसके
आधीन अव्यक्त अथवा व्यक्त दशामें सदा रहती है। शंकर भगवत्पाद
‘तदधीनत्वादर्थवत्’ (ब्र. १, ४, ३) और ‘ज्योतिरूपक्रमा तु
तथा ह्यधीयत एके’, (ब्र. १, ४, ९) के भाष्य में इस बात को स्पष्ट
करते हैं और उस शक्ति को दैवी शक्ति कहते हैं।
“यथा प्रकरणातु सैव दैवी शक्तिरव्याकृतनामरूपा
नामरूपयोः प्रागवस्थानेनापि मंत्रेणाम्नायत”,
अर्थः—प्रकरण के अनुसार तो वह ही दैवी शक्ति
जो नाम रूप से विकृत नही है, नाम रूपों की पूर्व अवस्था के रूप में
वेदोक्त मंत्र में कही गई है।
माया की अभिव्यक्ति, ईश्वर का ईक्षण अथवा संकल्प, ईश्वर
का एजृत्व (एजृ कंपने) अर्थात स्पन्द सब सृष्टि के पूर्व में शक्ति के
आन्दोलन के सूचकअर्थ पद हैं। यह कहना कठिन है कि पहिले इच्छा
अर्थात ईक्षण हुवा अथवा पहिले संकल्प हुवा, अथवा पहिले स्पन्द
हुआ। जिसने जैसा समझा वैसा ही वर्णन भिन्न-भिन्न प्रकार से
उसने किया है। उपरोक्त नासदासीय सूक्त में पहिले तम (माया)
फिर काम (संकल्प) फिर रेतस् (स्पंद) का क्रम मिलता है। परन्तु
सर्वत्र यह ही क्रम नहीं दिखता। परन्तु इस बात में सब श्रुतियों
का एक मत है कि चाहे वह माया हो, चाहे इच्छा, चाहे स्पन्द
सब हैं एक ब्रह्म सम्बन्धी व्यापार ही। ब्रह्म की उस अवस्था को कहीं

Page 96Permalink

५६ सौन्दर्य लहरी
ईश्वर कहा है, कहीं उसकी शक्ति, केवल नाम की भिन्नता
है। शक्तिवादी उसको ईश्वर की दैवी शक्ति कह कर उपासना
करते हैं, अन्य लोग उसे ईश्वर ही कहते हैं। वेदों में दोनों प्रकार
का उपासना क्रम मिलता है कहा है—
'त्वमेव माता च पिता त्वमेव इत्यादि, त्वमेव सर्वं मम देव देव' ॥
मन्त्र शास्त्र के विद्वानों ने सृष्टि की उत्पत्ति शब्द से ही मानी
है, और वे शब्द को अनादि शब्द ब्रह्म कहते हैं शब्द भी स्पन्द
का ही रूप है। प्रथम शब्द ॐ है जो अ, उ, म के योग से बनता
है। अकार सारी वैखरी वाणी की भूमि है। जिस पर अन्य वर्णों
के नाम रूप रचे जाते हैं। ॐ भी अकार का ध्वन्यात्मसानुनासिक
शब्द है। ऐतरेय अरण्यक में कहा है कि अकार ही समस्त वाणी है।
अकारो वै सर्वा वाक् सैषा स्पर्शान्तस्थोष्माभिव्यज्यमाना
वह्वी नानारूपा भवति । (ऐ. आ. २.३ ७ १३)
अर्थात् अकार ही सारी वाणी है। वह ही स्पर्शों, अन्तस्थ और
उष्मा से युक्त होकर व्यक्त होती है और नाना रूपों वाली
हो जाती है।
ऊपर हम बता आये हैं कि ऐं. ह्रीं, श्रीं, क्लीं भी ॐ के ही
रूप हैं, और शक्ति प्रणव कहलाते हैं। उनका शक्ति और स्पन्द
तथा संकल्प से सम्बन्ध भी वहां दिखाया जा चुका है। परन्तु
सृष्टि के पूर्व चारों में से पहिले कौनसा उदय हुवा और पीछे
कौनसा यह कहना असंभव है। जिस ऋषि ने जो क्रम समझा

Page 97Permalink

सौन्दर्य लहरी ५७
उसने अपनी उपासना उसी क्रम से की, और अपना मंत्र भी उसी
क्रम से बनाया । इसलिये प्रत्येक मंत्र का ऋषि देवता और
विनियोग जानना आवश्यक है । इसी प्रकार श्री विद्या के अवान्तर
भेदों को समझना चाहिये । सबके मूल में दो ही विद्या हैं जो
कादि और हादि के नाम से प्रसिद्ध हैं, कादि विद्या में सृष्टि का
उदय काम (संकल्प) से माना गया है और हादि में आकाशवत्
अव्यक्त शिव की माया शक्ति से । दोनों के प्रथम कूट में ही अन्तर है
और वह भी प्रथम तीन अक्षरों में, कादि में काम से शक्ति, शक्ति में
तुरियावस्था और उससे पृथ्वीतक सारी सृष्टि कही गई है जो
मायाशक्ति का ही रूप है; हादि में अव्यक्त आकाशरूपी ब्रह्म से
स्पन्दशक्ति, उससे कामपूर्वक पृथ्वीतक सारी सृष्टि का उदय
दिखाया गया है । दूसरे काम कला कूट में ईश्वर से शक्ति की
जीव रूपी पराप्रकृति का उदय बताकर फिर संकल्पपूर्वक पृथ्वी
तक की शारीरिक सृष्टि दिखाई गई है जिसमें ईश्वर की व्यापकता
का ओतप्रोत रहना भी स्पष्ट है, कहा है—
'स एतमेव सीमानं विदार्यैतया द्वारा प्रापद्यत'
ऐतरेयोपनिषत् (१,३,१२)
अर्थात् वह ईश्वर उस (शरीर) में ही सीमा (कपाल के ऊपर के
जोड) को विदार कर उस (छिद्र) के द्वारा प्रवेश कर गया अर्थात
जीव बन गया ।
तीसरे कूट का भाव स्पष्ट है कि समस्त कलाओं सहित सब
कुछ माया शक्ति का ही दिखावा है । तीनों कूटों के अंतिम माया

Page 98Permalink

५८ सौन्दर्य लहरी
बीज से यही बात झलकती है कि तीनों स्तर शक्ति अथवा माया
के ही रूप हैं, जो ईश्वर के आश्रय से उदय अस्त होती रहती है ।
आदि शक्ति को वेदों में श्री संज्ञा दी गई है। इसलिए इस विद्या का
नाम श्री विद्या अर्थात ब्रह्म की श्री की विद्या प्रसिद्ध है जो
ब्रह्म विद्या ही है। देखे श्री सूक्त के १५ मंत्र । पंच-दशी में भी
१५ ही अक्षर हैं। कहा है:—
श्रीश्चते लक्ष्मीश्च पत्न्याऽहोरात्रे पार्श्वे नक्षत्राणि
रूपमश्विनौव्यात्तम्,....इत्यादि (यजुर्वेद)
अर्थात:—हे ईश्वर यह तेरी श्री लक्ष्मी तेरी पत्नि
है, जिसके दिन रात्रि पार्श्व हैं, नक्षत्र रूप हैं, जिससे सब व्याप्त है ।
श्री विद्या का एक रूप षोडशी विद्या भी प्रसिद्ध है, उसके भी
कामादि षोडशी, रमादि षोडशी, मायादि षोडशी, वागादि षोडशी,
तारादि षोडशी अवान्तर भेद हैं । ये भेद उस ही दृष्टि से समझे
जाने चाहिये । जिसने काम से सृष्टि मानी, उसने कामादि की
उपासना की । जिसने श्रीसे सृष्टि मानी उसने रमादि की, जिसने
माया से सृष्टि मानी उसने मायादि की और जिसने शब्द से सृष्टि
मानी उसने वागादि की उपासना की । तदनुसार उनके मंत्रों में
बीजों का क्रम भी भिन्न-भिन्न होता गया । ये सब मंत्र लोम-विलोम
क्रम से प्रभव और अप्यय उभयपर हैं।
श्री विद्या की उपासना अति प्राचीन है। शंकर भगवत्पाद
भी श्री विद्या के उपासक थे यह बात असंदिग्ध है ।

Page 99Permalink

सौन्दर्य लहरी ५९
हकार से शिव और सकार से शक्ति का ग्रहण किया जाता
है, जो महावाक्यों का मंत्रात्म स्वरूप है । सः जीव शक्ति है, और
अहं का स्फुरण ब्रह्म की तेजोमयी अध्यात्म किरण है । हं शिव
वाचक है, उसके पूर्व निषेधात्मक अकार लगा देने से उसकी जीव
संज्ञा हो जाती है । 'इसलिये सःहं, अथवा सोहं का अर्थ इस प्रकार
करना चाहिए कि सःजीव शक्ति, हं शिव स्वरूप है । ह, स, अथवा
हंसः का अर्थ इसी प्रकार यह होता है कि शिव ही जीव बन गया है ।
इस प्रकार शिव तत्व का अहं वृत्ति के आधार पर तत्वानुसंधान
करते-करते निषेधात्मक अकार का त्याग करके ब्रह्मलीनता प्राप्त करने
के इस साधन क्रम को, अहंग्रह उपासना कहते हैं ।
श्री विद्या गायत्री का भी तांत्रिक रूप समझा जाता है । वह
निर्गुण ब्रह्म जगत का आदिकारण सविता अर्थात प्रसूता, जन्मदाता
वरण करने के योग्य है, यह बात गायत्री के प्रथम पाद में कही
गई है । वह ध्यान का विषय न होने के कारण वरेण्यम् है, ध्येयं
नहीं, इसलिये उसकी तेजोमयी सत्ता 'भर्गस' का ही ध्यान संभव है ।
यह बात दूसरे पाद में कही गई है । बुद्धि ध्यान का यंत्र है, वह
ध्यान द्वारा ब्रह्म में तल्लीनता होने को प्रवृत्त होनी चाहिये ।
इसलिये प्राणस्वरूप रुद्र की सहायता से उस पद की उपलब्धि
की जिज्ञासा तीसरे पद में दिखाई गई है । गायत्री मंत्र का श्री
विद्या से सम्बन्ध इसी विचार धारा से सिद्ध होता है । देखें
त्रिपुरातापिन्युपनिषद् ।
ब्रह्मा, विष्णु और शिवजी ने भी श्री विद्या की उपासना
की थी और उनके उपास्य मंत्र क्रमशः ब्राह्मी, वैष्णवी और शांकरी
विद्याओं के नाम से प्रसिद्ध है ।