सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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Read in context४० सौंदर्य लहरी
है। अर्थ स्वरूपा देवी आदि काम से उदय होकर संकल्प रूप
धारण करके सृष्टि, स्थिति और प्रलय की कल्पना करती है
और ब्रह्मा के दिन में स्थिति करके कल्प का निर्माण करती है ।
संकल्प, कल्पना और कल्प तीनों शब्दों की व्युत्पत्ति क्लृप् (सामर्थ्ये)
धातु से होती है अर्थात् भगवती के सामर्थ्य का विकास अथवा
प्रदर्शन स्वरूप आद्योपान्त सारा कल्प है इसलिये उसका रूप
क्लृप् धातु से क्लीं बनता है। ब्रह्मा का दिन जिसको कल्प कहते
हैं और जिसकी अवधि १००० चतुर्युगी का समय १२०००
दिव्य वर्ष अथवा १२००० × ३६० = ४३२००० मानुषी वर्ष हैं,
भगवती के क्लीं बीज के सामर्थ्य से कल्पित हैं, जो महेश्वर की
काम अथवा संकल्प शक्ति का स्वरूप हैं। इसी अभिप्राय से
भगवती को कामेश्वरी भी कहते हैं। और सौंदर्य लहरी में सर्वत्र
भगवती के स्वरूप को कामदेव से भी उपमित किया गया है।
यहां यह भी स्मरण रहे कि कामदेव की उपास्य विद्या मूल कादि
विद्या ही है और क्लीं को काम बीज भी कहते हैं।
उपरोक्त शिव, शक्ति, सदाशिव, महेश्वर और शुद्ध विद्या को
शुद्ध तत्व कहते हैं। प्रथम दो शांतातीता और अन्तिम तीन
शान्तिकला के तत्व माने जाते हैं।
फिर तीसरा माया कला का स्तर शुद्धाशुद्ध विद्या का स्तर
माना जाता है जिसे गीता में भगवान ने परा प्रकृति कहा है। माया
का प्रस्तार देश (कला) और काल में होता है और जो नियति अर्थात
प्राकृतिक नियमों के सूत्र में बंधा हुवा है जिनके अविद्या स्वरूप
ज्ञान का जानकार होकर शिव स्वयं राग के पाश में बंध जाता है