सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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और जीव कहलाने लग जाता है, इसलिये माया के सात तत्व शुद्धा-
शुद्ध तत्व कहलाते हैं उनके नाम यह हैं-माया, काल, कला, नियति,
अविद्या, राग और पुरुष । इस स्तर को विद्या कला कहते हैं । कला
पांच हैं-शान्त्यातीता, शांति, विद्या, प्रतिष्ठा और निवृत्ति । काल से
राग तक पांच तत्व पांच कंचुक कहलाते हैं जो माया के पांच
आवरण या पांच केंचुलियां हैं, और जो शिवकी चितिशक्तिको काल
से, क्रिया शक्ति को कला से, ज्ञान शक्ति को विद्या से, इच्छाशक्ति
को राग से और आनंद कों नियति से आवृत करके उसे जीव बना
देते हैं । अशुद्ध तत्व २४ हैं जिनके नाम नीचे दिये जाते हैं:—
(१) अव्यक्त प्रकृति (२) महत् (३) अहंकार (४) मन
(५-९) पांच ज्ञानेन्द्रियां (१०-१४) पांच कर्मेन्द्रियां
(१५-१९) पांच तन्मात्राएं (२०-२४) पांच महाभूत । प्रथम
२३ तत्व प्रतिष्ठा कला के अन्तर्गत हैं और अन्तिम पृथिवी तत्व
निवृत्ति कला कहलाता है । सब तत्वों का योग ३६ है और
कलाएं पांच हैं।
ह्रीं का उदय आकाश से होता है, इसकी पीठ बिशुद्ध चक्र में
है और उसका आयतन सहस्रार तक है । श्रीं का
बीज मंत्र द्वारा उदय स्थान भी आकाश है, इसलिये उसकी
ब्रह्मोपासना पीठ विशुद्ध है और आयतन आज्ञाचक्र तक है ।
ऐं का उदय अग्नि से है, इसलिये उसकी पीठ मणिपुर है और
आयतन वाक शक्ति का स्थान विशुद्ध चक्र है और विकास स्थान
जिव्हाग्र भाग है । इन तीनों में अग्नि ही प्रमुख है । क्लीं में लकार