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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

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Page 97

सौन्दर्य लहरी ५७
उसने अपनी उपासना उसी क्रम से की, और अपना मंत्र भी उसी
क्रम से बनाया । इसलिये प्रत्येक मंत्र का ऋषि देवता और
विनियोग जानना आवश्यक है । इसी प्रकार श्री विद्या के अवान्तर
भेदों को समझना चाहिये । सबके मूल में दो ही विद्या हैं जो
कादि और हादि के नाम से प्रसिद्ध हैं, कादि विद्या में सृष्टि का
उदय काम (संकल्प) से माना गया है और हादि में आकाशवत्
अव्यक्त शिव की माया शक्ति से । दोनों के प्रथम कूट में ही अन्तर है
और वह भी प्रथम तीन अक्षरों में, कादि में काम से शक्ति, शक्ति में
तुरियावस्था और उससे पृथ्वीतक सारी सृष्टि कही गई है जो
मायाशक्ति का ही रूप है; हादि में अव्यक्त आकाशरूपी ब्रह्म से
स्पन्दशक्ति, उससे कामपूर्वक पृथ्वीतक सारी सृष्टि का उदय
दिखाया गया है । दूसरे काम कला कूट में ईश्वर से शक्ति की
जीव रूपी पराप्रकृति का उदय बताकर फिर संकल्पपूर्वक पृथ्वी
तक की शारीरिक सृष्टि दिखाई गई है जिसमें ईश्वर की व्यापकता
का ओतप्रोत रहना भी स्पष्ट है, कहा है—
'स एतमेव सीमानं विदार्यैतया द्वारा प्रापद्यत'
ऐतरेयोपनिषत् (१,३,१२)
अर्थात् वह ईश्वर उस (शरीर) में ही सीमा (कपाल के ऊपर के
जोड) को विदार कर उस (छिद्र) के द्वारा प्रवेश कर गया अर्थात
जीव बन गया ।
तीसरे कूट का भाव स्पष्ट है कि समस्त कलाओं सहित सब
कुछ माया शक्ति का ही दिखावा है । तीनों कूटों के अंतिम माया