सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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विकारी मानने लगता है, और बुद्धि अपने को आत्मतत्व समझने
लगती है । अनात्मनि आत्मख्याति रुपी यह अविद्या है । परन्तु
शिवतत्व में अविद्या का अभाव होने से अध्यास नहीं होता । आत्मा
में अहं इदं का कभी उदय होना कभी अस्त होना यह प्रकट करता
है कि नित्य निर्विकार शुद्ध स्वरूप आत्मा दोनों से पृथक है । इदं
सत्य है अथवा असत्य ! सत्यवत दिखता है, परन्तु अहं के आधार पर
उसका उदय अस्त होने से उसकी असत्यता सिद्ध होती है । इसलिये
इसको शंकर भगवत्पाद ने अनिर्वचनीय-ख्याति कहा है । अर्थात
यह नहीं कहा जा सकता कि शक्ति की शक्तिमान से अभिन्न सत्ता
रहते हुवे भी वह विपरीत धर्मा कैसे उदय-अस्त हुआ करती है ।
इसी अभिन्नता को लेकर श्रुति कहती है-“तदेजति तन्नैजति” (ईश)
प्राणतत्व और अध्यात्म तथा आधिभूत भाव
यदिदं जगत्सर्व प्राण एजति निः सृतम् ।
महद्भयं वज्रमुद्यतं य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥
( कठ २,६,२ )
अर्थः—यह जो समस्त जगत है वह प्राण के स्पन्दित होने
पर निकलता है । वह प्राण वज्र के सदृश्य बडा भय वाला है,
अर्थात उसके भय से अग्नि तपता है और सूर्य उदय अस्त होता है ।
जो उसको जान लेते हैं, वे अमर हो जाते हैं ।
भयादस्याग्निस्तपति भयात्तपति सूर्यः । ( क. २.६,३ )
प्राण यहां ब्रह्म वाचक है और वही जीवन शक्ति है ! कहा
है वह प्राण का भी प्राण है । उपरोक्त श्रुति में कहा गया है कि