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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

Page 88 of 415

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Page 88

८ सौंदर्य लहरी
ारा जगत प्राण के स्पन्द से बना है । जिस प्राण मे स्पन्द कहा
या है उसे आत्मा की रश्मिवत् समझना चाहिये, जैसे चुम्बक से
सकी किरणें निकला करती है । स्पन्द चुम्बक में नहीं होता, वरन
सकी किरणों में होता है । वह समष्टि प्राण सृष्टि का आदि कारण
और शक्ति का ही रूप है । नीचे के स्तरों पर यह प्राणशक्ति
ो रूप धारण कर लेती हैं । एक अध्यात्म और दूसरा अधिभूत ।
अधिभूता शक्ति का परिणाम सारा जगत है, जो अध्यात्म रूपके
ाकाश से सर्वत्र प्रतिभासित हो रहा है। इस विषय का भगवान
ं गीता में इस प्रकार वर्णन किया है:—
अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते ।
भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः ॥
( गीता ८, ३ )
अर्थ:— ब्रह्म अक्षर है, उसमें दो भावों का उदय होता है एक
अध्यात्म और दूसरा अधिभूत । अध्यात्म भाव ब्रह्म का स्वभाव है
अर्थात उसका अपना ही भाव होने के कारण वह अहं चेतन भाव है
और दूसरा अधिभूत भाव उद्भव करने वाला है यह भी ब्रह्म का ही
भाव है । इस दूसरे भाव का कर्म सारा जगत है । यह अधिभूत
भाव क्षर अथवा नाशवान है ।
सच्चिदानन्द ब्रह्म अक्षर है अर्थात उसकी सत्ता ज्ञान स्वरूप
है और आनन्दमयी है, परन्तु अहं और इदं दोनों भाव से अतीत
होने के कारण परम भाव कहलाता है । उससे अहम् और इदम्