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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

Page 86 of 415

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Page 86

४६ सौंदर्य लहरी
यदा पंचावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह ।
बुद्धिश्च न विचेष्टति, तमाहुः परमांगतिम् ॥
ताँ योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रिय धारणाम् ।
अप्रमत्तस्तदा भवति योगो हि प्रभवाप्ययौ ॥
(क. ६, १०, ११)
अर्थः—जब पांचों ज्ञानेन्द्रियां मन सहित स्थिर हो जाती हैं
और बुद्धि चेष्टा नहीं करती, उस अवस्था को परमगति कहते हैं,
तब मनुष्य अप्रमत्त हो जाता है, अर्थात शांति प्राप्त करता है ।
इसलिये प्रभव और अप्यय ही योग है ।
इंद्रियां और मन प्रकृति रूपा शक्ति के विकार हैं, और बुद्धि
महत तत्व रूपी सिन्धु की एक तरंग है । महत् तत्व समष्टि हैरण्यगर्भ
बुद्धि ही है । इसलिये बुद्धि को तीनों गुणों की विषमता होने पर
शक्ति की अभिव्यक्ति की एक तरंग कहा जा सकता है । कहा
भी है:—
या देवि सर्व भूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै ३ नमोनमः ॥ (दुर्गा सप्त)
अहंवृत्ति का कारण आत्मा है और इदं का रूप बुद्धि है !
दोनों का इतरेतर अध्यास बन्धन का कारण हैं । एक का दूसरे के
गुणों का आरोप अपने उपर कर लेने को अध्यास कहते हैं । अर्थात
आत्मा अपने उपर बुद्धि के विकारों का आरोप करके स्वयं को