सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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Read in contextसौंदर्य लहरी ४३
क्लीं बीज (मकार युक्त ककार) से बनता है। ककार से
काम, जल, और प्राण एवं सुख का अर्थ लिया जाता है। कं
जल को कहते हैं और प्राण को भी। कं का अर्थ सुख भी होता
है। जल के बेध से प्राण का विकास होता है, और प्राण का
स्थूल रूप वायु है। वायु का कारण आकाश है। और आकाश
का कारण सूक्ष्म प्राण है, प्राण स्वयं ब्रह्म का तेज है। इसलिये
कहा है कि—"प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्मेति। यद्वाव कं तदेव खं
तदेव कमिति प्राणं च हास्मै तदाकाशं चोचुः।" (छा. ४,१०,५)
अर्थात—प्राण ब्रह्म है, कं ब्रह्म है, खं ब्रह्म है, अथवा जो कं है
वह ही खं है, जो खं है वह ही कं है और वह ही प्राण है।
खं का अर्थ आकाश भी होता है, इसलिये कं, खं, और प्राण
तीनों ब्रह्म वाचक है। ऐसा भी कहा है कि—"अन्नमयं हि
सौम्य मनः अपोमयः प्राणस्तेजो मयी वाक्।" (छा. ६,७,६)
क्लीं में ककार के साथ लकार भी है, जो पृथिवी का अक्षर
है। पृथिवी के बेध से अन्न होता है, और अन्न से मन। मूलाधार
क्लीं बीज की पीठ है, जहां पर पृथिवी और जल दोनो का बेध
होकर मन और प्राण के विकास में सहायता मिलती है। मन का
बेध आज्ञाचक्र में होता है। मन आनन्द का स्थान है और आनन्द
ब्रह्म है। इस प्रकार क्लीं की सहायता से प्राण और मन दोनों के
द्वारा ब्रह्म की प्राप्ति होती है। इसी प्रकार ऐं अग्नि बीज है। अग्नि
से वाक् और वाक् से ज्ञान की प्राप्ति होती है, और ज्ञान स्वयं
ब्रह्म है। सूर्य भी अग्नि ही हैं। सूर्य से दृष्टि का उदय होता है
और दृष्टि सत्य की पीठ है। सत्य स्वयं ब्रह्म है। स्थूल प्राण का