सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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अर्थः—वह ब्रह्म पुरुष दिव्य और अमूर्त है, अजन्मा बाह
अभ्यन्तर सर्वत्र व्यापक है, वह प्राण और मन रहित-शुभ्र है और
अक्षर (प्रकृति, अव्यक्त) से अति सूक्ष्म है। उससे प्राण उत्प
होता है, और फिर मन, सब इन्द्रियां, आकाश, वायु, तेज, आ
और विश्व को धारण करने वाली पृथिवी उत्पन्न होते हैं ।
यहां पर महत् के स्थान पर प्राण की उत्पत्ति कही गई है
इसलिये समष्टि प्राण जिसको हिरण्यगर्भ भी कहते हैं, महत् तत्
से भिन्न कोई अन्य तत्व नहीं है। शंकर भगवत्पाद ने ब्रह्म सू
(२, ४, १३) 'अणुश्च' के भाष्य में समष्टि व्यष्ट्यात्मक विश
प्राणों को अधिदैविक हैरण्यगर्भ प्राण कहा है। और ब्रह्म सू
(१, ४, २) के भाष्य में महत् को हैरण्यगर्भी बुद्धि बताया है। शु
ब्रह्म की तेजोमयी रश्मियां ही जीवन शक्ति रूपी प्राण की किर
हैं और इस प्रथमज विभु प्राण को ही हिरण्यगर्भ कहते हैं, जैसा f
नीचे दिये मंत्र से भी विदित होता है ।
हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् ।
सद्धार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥
हिरण्यगर्भ की बुद्धि और चित्त दोनों महत् तत्व के ही रू
हैं। महत् से अहंकार की उत्पत्ति होती है। चित्तस्वरूप महत् वासुदे
भगवान विष्णु है, बुद्धि स्वरूप महत् ब्रह्मा और अहंकार रुद्र शि
अथवा हर है। इसलिये आदि शक्ति तीनों की जननी सह
आराध्या है।