सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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Read in contextसौंदर्य लहरी ५१
श्लोक की तीसरी पंक्ति में देवी को हरिहर और ब्रह्मा की
[अकृत पुण्य भजन] आराध्य देवता कहा गया है। क्योंकि सृष्टि की
[नहीं कर सकते] उत्पत्ति, पालन और संहार असद्विद्या में ही होते
हैं। शुद्ध विद्या इनकी भी आराध्या है फिर
अकृत पुण्य पापी जीवों की तो वहां गति ही कैसे हो सकती है, वे
तो स्तुति और प्रणाम भी नहीं कर सकते। भगवान ने भी गीता
में कहा है:—
न मां दुष्कृतिनो मूढाःप्रपद्यन्ते नराधमाः ।
माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः ॥ (७-१)
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् ।
ते द्वंद्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः ॥ (७-२८)
महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः ।
भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् (९-१३)
हरि भी रजोगुण की शक्ति लक्ष्मी के बिना पालन नही कर
सकते, हर भी सत्व गुण की शक्ति उमा की सहायता से संहार
करते हैं, तमोगुण के वशीभूत होकर बिना सोचे समझे संहार करना
तो विश्व के कल्याणार्थ नहीं हो सकता, उनकी संहार शक्ति इसलिये
सात्विक ज्ञानमयी है । और ब्रह्मा की सृष्टृत्व शक्ति, तामसी मोहा-
सक्ति के बिना उनके ज्ञान वैराग्य पर आवरण डाले, सृष्टि
कार्य में उन्हें कैसे प्रवत कर सकती थी । इसलिये ब्रह्मा तमोगुण
की शक्ति से युक्त होकर सृष्टि करते हैं । प्रथम मानसिक सृष्टि के
सनकादि पुत्रों में ज्ञान वैराग्य देखकर तो उन्हें मैथुनिक सृष्टि क