सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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Read in contextसौन्दर्य लहरी ५९
हकार से शिव और सकार से शक्ति का ग्रहण किया जाता
है, जो महावाक्यों का मंत्रात्म स्वरूप है । सः जीव शक्ति है, और
अहं का स्फुरण ब्रह्म की तेजोमयी अध्यात्म किरण है । हं शिव
वाचक है, उसके पूर्व निषेधात्मक अकार लगा देने से उसकी जीव
संज्ञा हो जाती है । 'इसलिये सःहं, अथवा सोहं का अर्थ इस प्रकार
करना चाहिए कि सःजीव शक्ति, हं शिव स्वरूप है । ह, स, अथवा
हंसः का अर्थ इसी प्रकार यह होता है कि शिव ही जीव बन गया है ।
इस प्रकार शिव तत्व का अहं वृत्ति के आधार पर तत्वानुसंधान
करते-करते निषेधात्मक अकार का त्याग करके ब्रह्मलीनता प्राप्त करने
के इस साधन क्रम को, अहंग्रह उपासना कहते हैं ।
श्री विद्या गायत्री का भी तांत्रिक रूप समझा जाता है । वह
निर्गुण ब्रह्म जगत का आदिकारण सविता अर्थात प्रसूता, जन्मदाता
वरण करने के योग्य है, यह बात गायत्री के प्रथम पाद में कही
गई है । वह ध्यान का विषय न होने के कारण वरेण्यम् है, ध्येयं
नहीं, इसलिये उसकी तेजोमयी सत्ता 'भर्गस' का ही ध्यान संभव है ।
यह बात दूसरे पाद में कही गई है । बुद्धि ध्यान का यंत्र है, वह
ध्यान द्वारा ब्रह्म में तल्लीनता होने को प्रवृत्त होनी चाहिये ।
इसलिये प्राणस्वरूप रुद्र की सहायता से उस पद की उपलब्धि
की जिज्ञासा तीसरे पद में दिखाई गई है । गायत्री मंत्र का श्री
विद्या से सम्बन्ध इसी विचार धारा से सिद्ध होता है । देखें
त्रिपुरातापिन्युपनिषद् ।
ब्रह्मा, विष्णु और शिवजी ने भी श्री विद्या की उपासना
की थी और उनके उपास्य मंत्र क्रमशः ब्राह्मी, वैष्णवी और शांकरी
विद्याओं के नाम से प्रसिद्ध है ।