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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

Page 92 of 415

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Page 92

५२ सौंदर्य लहरी
आश्रय लेना पडा । इसी लिये श्लोक में कहा गया है कि हे मां !
तू ही तीनों की आराध्या है ।
गुरु को शिव स्वरूप कहते हैं। जब गुरु शक्ति से युक्त
दीक्षा का शक्ति होता है तब ही वह दीक्षा देकर शिष्य की
से सम्बन्ध । प्रसुप्त शक्ति कुण्डलिनी को जागृत कर सकता है
अन्यथा नहीं । जब तक शक्तिसंपन्न गुरु का
अनुग्रह नहीं होता, तब तक शिष्य चाहे कितना भी विद्वान क्यों
न हो, पुस्तकों से पढे हुवे मन्त्र से सिद्धि प्राप्त नहीं कर सकता ।
भगवान राम और कृष्ण को भी गुरु करना पडा था, फिर अन्य
साधारण मनुष्यों की तो बात ही क्या है । अकृतपुण्य पापी जन तो
गुरु की शरण में जा ही नहीं सकते, जब अनेक जन्मों के पुण्यों का
उदय होता है तब ही सद्गुरु का समागम मिलता है । शक्ति के
बिना जैसे शिव स्पन्दितुमपि न कुशलः तद्वत शक्ति के बिना
शिव स्वरुप गुरु भी शिष्य में शक्ति जागरण करने की कुशलता
नहीं रखता और शिष्य में भी मंत्र चैतन्य का प्रकाश नहीं होता ।
मंत्र चैतन्य के बिना मंत्र सिद्धि की बात करना तो बालू से तेल
निकालने के बराबर है ।
शिष्य में भी उसका अन्तरात्मा शिव है, परन्तु वह शिव उसको
माया की भ्रांति में डालता रहता है ।
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥ (गी.१८-६१)