सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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Read in contextसौंदर्य लहरी ४९
दोनों भावों का उदय होने पर एक को अध्यात्म और दूसरे को
अधिभूत भाव कहते हैं। अध्यात्म भाव उसी का स्वभाव वाला
अर्थात सच्चिदानन्द स्वरूप है और अविनाशी और अपरिणामी भी
हे। अधिभूत भाव क्षर और परिणामी है जिसके परिणाम से सारा
जगत बनता बिगडता है। अक्षर निस्पन्द परम शिव है और
अध्यात्म में अहंता होने के कारण सस्पन्द शिव ईश्वरभाव और
जीवभाव का समावेश है। अधिभूत भाव को उद्भव करने वाले
भाव को ही आदि शक्ति कहा है जो ब्रह्म का ही एक भाव है।
परमभाव को प्राप्त करने के लिये सब स्पन्दों का निरोध करके
अहं भाव में स्थिति करनी पडती है। कहा है—“आत्मसंस्थं मनः
कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत् ” (गी. ६-२५) अर्थात–आत्मभाव में
मन को स्थिर करके इदम् जगत का कुछ भी चिन्तन नहीं करना
चाहिये। यह योग का सब से उत्कृष्ट साधन है। यही अहंग्रह उपासना
का अन्तिम स्वरूप है और इसी को निदिध्यासन भी कहते हैं।
समष्टि प्राण को ही हिरण्यगर्भ कहते हैं जिसको सांख्य
हिरण्यगर्भ महत्तत्व कहता है और वह ही प्राणिमात्र की
बुद्धियों का आदि कारण स्वरूप समष्टि बुद्धि है।
प्राणतत्व और हिरण्यगर्भ
दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः सबाह्याभ्यन्तरोह्यजः ।
अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्षरात्परतः परः ॥२॥
एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणिच ।
खं वायु र्ज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी ॥३॥ (मु.२,१)